सुप्रीम कोर्ट ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 का पालन न करने वाले थोक कचरा उत्पादकों (बीडब्ल्यूजी) के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत के निर्देशों के तहत नियमों की अनदेखी करने वाली ऐसी व्यावसायिक या आवासीय इकाइयों के बिजली और पानी के कनेक्शन तब तक के लिए अस्थायी रूप से काटे जा सकते हैं, जब तक वे औपचारिक अनुपालन प्रमाण पत्र प्रस्तुत नहीं कर देतीं।
जस्टिस एस वी एन भट्टी और जस्टिस एन वी एन अंजारिया की पीठ ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित निगरानी समिति को निर्देश दिया है कि वह सभी जिला कलेक्टरों को अपने-अपने अधिकार क्षेत्रों में स्थानीय निकायों के सहयोग से छह सप्ताह के भीतर ऐसे सभी थोक कचरा उत्पादकों की पहचान करने का आदेश दे।
अदालत के अनुसार, स्थानीय निकायों के अध्यक्ष, आयुक्त या सचिव अपने संबंधित जिला कलेक्टर के निर्देशों का पालन करते हुए थोक कचरा उत्पादकों को लिखित नोटिस जारी करेंगे। इस नोटिस में कचरे के पृथक्करण, सुरक्षित भंडारण और हस्तांतरण से जुड़ी अनिवार्य शर्तों के साथ-साथ उल्लंघन की स्थिति में जिला कलेक्टर के विशेष सेल द्वारा बिजली व पानी की आपूर्ति रोके जाने की चेतावनी भी दी जाएगी।
ऑनलाइन निगरानी और बुनियादी ढांचे की स्थापना
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस लिखित संचार का मुख्य उद्देश्य थोक कचरा उत्पादकों को कचरा प्रसंस्करण के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा स्थापित करने का अवसर देना है। इसके माध्यम से वे स्थानीय निकायों को अपनी अनुपालन रिपोर्ट ऑनलाइन सौंप सकेंगे, जिसका निरीक्षण करने के बाद रिपोर्ट जिला कलेक्टर को भेजी जाएगी।
कचरा प्रबंधन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए पीठ ने अधिकारियों को मासिक कचरा संचयन और अनुपालन ट्रैकिंग के लिए पहले से मौजूद ऑनलाइन पोर्टल में जियो-टैग्ड तस्वीरों को अनिवार्य रूप से शामिल करने पर विचार करने का सुझाव दिया है।
नदियों में कचरा बहने से रोकने पर जोर
व्यक्तिगत निकायों की जवाबदेही तय करने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने नदियों के संरक्षण पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है। अदालत ने निगरानी समिति को निर्देश दिया है कि वह नगरपालिकाओं के ठोस कचरे के कारण नदियों में होने वाले जल प्रदूषण के आंकड़ों को प्राथमिकता के आधार पर एकत्र करे और आगे की कार्रवाई के लिए इन आंकड़ों को पीठ के सामने प्रस्तुत करे।
छात्रों को बनाया जाएगा घरेलू पर्यवेक्षक
नियमों को जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा के माध्यम से सामाजिक बदलाव का फॉर्मूला सामने रखा है। अदालत ने स्कूल एवं उच्च शिक्षा विभाग को तुरंत प्रभाव से पाठ्यक्रम में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के सैद्धांतिक और व्यावहारिक प्रशिक्षण को शामिल करने का निर्देश दिया है।
इस योजना के तहत शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा, जबकि प्रशिक्षित छात्र अपने परिवारों को कचरा प्रबंधन के प्रति जागरूक करने के लिए ‘घरेलू स्तर के पर्यवेक्षक’ के रूप में काम करेंगे। पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि एक शिक्षित बच्चा ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को लागू करने के लिए अपने माता-पिता या रिश्तेदारों को जागरूक करने का सबसे प्रभावी और सहज माध्यम साबित होता है। इस पहल की प्रभावशीलता बनाए रखने के लिए जिला शिक्षा विभागों को समय-समय पर ऑडिट करने और उसकी रिपोर्ट जिला कलेक्टर को सौंपने का निर्देश दिया गया है।
निगरानी समिति की संरचना और वैधानिक ढांचा
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों के पालन में केंद्र सरकार ने 25 मार्च को एक उच्चस्तरीय निगरानी समिति का गठन किया था। इस समिति में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव के अलावा आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, जल शक्ति मंत्रालय के पेयजल एवं स्वच्छता विभाग तथा ग्रामीण विकास मंत्रालय के सचिव शामिल हैं।
मंगलवार को सुनवाई के दौरान समिति ने पीठ को अवगत कराया कि ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 को पूरे देश में सख्ती से लागू करने के लिए संबंधित वैधानिक समितियों को अधिसूचित और सक्रिय कर दिया गया है।

