वैवाहिक विवादों में 14 दिन की जांच के बिना गिरफ्तारी पर रोक, कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला

कर्नाटक हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों में पुलिस द्वारा की जाने वाली मनमानी और बिना सोच-विचार की जाने वाली गिरफ्तारियों पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि पति या उसके परिजनों के खिलाफ दहेज उत्पीड़न (आईपीसी धारा 498-ए / भारतीय न्याय संहिता धारा 85) या 7 साल तक की सजा वाले मामलों की शिकायत मिलने पर गिरफ्तारी से पहले 14 दिनों की प्राथमिक जांच करना अनिवार्य होगा।

जस्टिस सूरज गोविंदराज की पीठ ने 4 अगस्त के अपने आदेश में स्पष्ट किया कि वैवाहिक विवादों में आपराधिक प्रक्रिया का इस्तेमाल किसी भी पक्ष से पैसे या संपत्ति की मांग पूरी कराने अथवा जबरन समझौता कराने के हथियार के रूप में नहीं होना चाहिए।

बेकसूरों को मुआवजा और पुलिस को प्रशिक्षण का निर्देश

विद्यारण्यपुरा पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर द्वारा वर्ष 2014 में की गई गैर-कानूनी गिरफ्तारी और प्रताड़ना के मामले में हाईकोर्ट ने पीड़ित नवीन कुमार (31 वर्ष) को 5 लाख रुपये और उनके पिता पी. जावरा शेट्टी (68 वर्ष) को 4 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश बेंगलुरु पुलिस कमिश्नर को दिया है। यह राशि तीन सप्ताह के भीतर जारी करनी होगी।

इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को निर्देश दिया है कि वे पुलिस अधिकारियों के लिए संवेदीकरण और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करें, ताकि वैवाहिक शिकायतों से जुड़ी गिरफ्तारियों में कानूनी Safeguards और प्रक्रियाओं का कड़ाई से पालन सुनिश्चित हो सके।

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एयरपोर्ट पर गैर-कानूनी गिरफ्तारी और हिरासत

यह मामला यूके में कंसल्टेंट के तौर पर कार्यरत नवीन कुमार और उनके पिता जावरा शेट्टी द्वारा दायर याचिका पर सामने आया। मार्च 2014 में नवीन कुमार की पत्नी ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी, जिसके बाद पुलिस ने लुकआउट सर्कुलर (एलओसी) जारी करवा दिया। जब नवीन कुमार ब्रिटेन से भारत पहुंचे, तो उन्हें हवाई अड्डे पर ही हिरासत में ले लिया गया।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि नवीन कुमार को 10 जून 2014 को ही कोर्ट से अग्रिम जमानत मिल चुकी थी। इसके बावजूद, पुलिस इंस्पेक्टर ने बिना गैर-जमानती वारंट के उन्हें गिरफ्तार कर लिया। वहीं, उनके 68 वर्षीय पिता जावरा शेट्टी को चार्जशीट में आरोपी भी नहीं बनाया गया था, फिर भी पुलिस ने उन्हें कस्टडी में रखा और उनके साथ मारपीट की गई।

जमानत के बावजूद पुलिस की मनमानी पर तल्ख टिप्पणी

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अदालत ने पाया कि जब आरोपी को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया, तो मजिस्ट्रेट ने अग्रिम जमानत आदेश प्रभावी होने के बावजूद गिरफ्तारी किए जाने पर संबंधित थाना प्रभारी को कारण बताओ नोटिस जारी किया था।

हाईकोर्ट ने अपने निष्कर्ष में कहा कि लुकआउट सर्कुलर जारी करना, नवीन कुमार की गिरफ्तारी और उनका पासपोर्ट जब्त करना पूरी तरह अवैध था। यह कार्रवाई आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी), पासपोर्ट अधिनियम 1967 और लागू कार्यकारी दिशा-निर्देशों के विपरीत थी। कोर्ट ने माना कि पुलिस अधिकारी ने शिकायतकर्ता पक्ष के साथ साठगांठ कर शक्तियों का दुरुपयोग किया और अग्रिम जमानत के आदेश (धारा 438(3)) की अनदेखी की।

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सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का कड़ाई से पालन

जस्टिस गोविंदराज ने रेखांकित किया कि केवल एफआईआर दर्ज हो जाना या प्रथम दृष्टया मामला बनना ही किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने का पर्याप्त आधार नहीं है। जांच अधिकारी को खुद से यह सवाल पूछना होगा कि गिरफ्तारी क्यों जरूरी है और इससे क्या मकसद हासिल होगा।

हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि पुलिस को ‘अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014)’ मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई शर्तों का कड़ाई से पालन करना होगा। साथ ही, किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने से पहले जांच अधिकारी को यह अनिवार्य रूप से जांचना होगा कि आरोपी ने किसी सक्षम अदालत से पूर्व-गिरफ्तारी राहत (अग्रिम जमानत) प्राप्त की है या नहीं।

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