मद्रास हाईकोर्ट ने 16 साल से अलग रह रहे दंपती को दी तलाक की मंजूरी, फैमिली कोर्ट का फैसला पलटा

मद्रास हाईकोर्ट ने 16 साल से अलग रह रहे एक दंपती के विवाह को समाप्त करते हुए तलाक को मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें यह माना गया था कि नौकरी के सिलसिले में पति का दूर रहना पत्नी के कथित विवाहेतर संबंधों का कारण बना।

जस्टिस जी आर स्वामीनाथन और जस्टिस एम डी सुमति की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि दोनों पक्षों के बीच वैवाहिक रिश्ता इस हद तक टूट चुका है कि अब सुलह की कोई गुंजाइश नहीं बची है। अदालत ने 67 वर्षीय पति को निर्देश दिया कि वह अपनी अलग रह रही पत्नी को स्थायी गुजारा भत्ते के रूप में सात लाख रुपये का भुगतान करे। तलाक की डिक्री इस रकम के अदालत में जमा होने के बाद ही प्रभावी मानी जाएगी। यह फैसला 19 अगस्त को सुनाया गया था, जबकि इसका विस्तृत आदेश 31 अगस्त को सार्वजनिक किया गया।

फैमिली कोर्ट के रुख पर हाईकोर्ट की आपत्ति

मामले की शुरुआत साल 2014 में हुई थी, जब पति ने पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाते हुए फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल की थी। हालांकि, फैमिली कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी थी। निचली अदालत का तर्क था कि पति काम के सिलसिले में अपनी पत्नी को छोड़कर मुंबई चला गया, इसलिए वह अपनी ही गलती का लाभ नहीं उठा सकता। फैमिली कोर्ट का यह भी मानना था कि हर पति का यह कर्तव्य है कि वह जहां भी जाए, अपनी पत्नी को साथ रखे ताकि शारीरिक जरूरतों को नियंत्रित किया जा सके और किसी भी तरह के विवाहेतर संबंधों की संभावना न बने।

निचली अदालत के इस दृष्टिकोण को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि रोजगार के अवसरों के लिए दूसरे शहर जाना वैवाहिक कर्तव्यों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। हालांकि हिंदू विवाह अधिनियम यह प्रावधान करता है कि कोई भी पक्ष अपने गंभीर कदाचार का लाभ उठाकर तलाक हासिल नहीं कर सकता, लेकिन अदालत ने कहा कि रोजगार के लिए बाहर जाने को ऐसा गंभीर दोष नहीं ठहराया जा सकता।

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पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि आधुनिक जीवन में हमेशा एक साथ रहना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं होता। अदालत ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई पति सेना में पदस्थ है, तो सैन्य बैरकों में वैवाहिक आवास बनाना संभव नहीं होता, या फिर पत्नी खुद भी कहीं नौकरी कर रही हो सकती है। निचली अदालत के इस विचार को नकारते हुए कि पत्नी को हर जगह पति के पीछे जाना चाहिए, खंडपीठ ने वोडाफोन के प्रसिद्ध विज्ञापन का संदर्भ दिया और टिप्पणी की कि पत्नी से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह उस विज्ञापन में दिखने वाले पग कुत्ते की तरह हर जगह पति के पीछे चले।

रिश्ते में सुलह की गुंजाइश खत्म

इस दंपती का विवाह 10 सितंबर 1992 को हिंदू रीति-रिवाजों से संपन्न हुआ था और उनके चार बच्चे हैं।

अदालत ने दोनों पक्षों के बीच संबंध विच्छेद की स्थिति का मूल्यांकन करते हुए रेखांकित किया कि पिछले 16 वर्षों के दौरान पत्नी की ओर से वैवाहिक रिश्ते को बचाने या आगे बढ़ाने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया। पीठ ने टिप्पणी की कि इस लंबे अंतराल में पत्नी की तरफ से कोई औपचारिक पत्र या कानूनी नोटिस तक नहीं भेजा गया। हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों से व्यक्तिगत बातचीत करके आपसी समझौते का प्रयास भी किया, लेकिन गंभीर आरोपों और आपसी कड़वाहट के चलते सुलह की सभी कोशिशें नाकाम रहीं।

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अदालती उपमा पर कानूनी प्रतिक्रिया

इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता चारू माथुर ने हाईकोर्ट के उस दृष्टिकोण का स्वागत किया, जिसमें पत्नी के पति के पीछे चलने की अनिवार्यता को खारिज किया गया है। हालांकि, उन्होंने फैसले में इस्तेमाल की गई उपमा पर चिंता जताई।

अधिवक्ता माथुर का कहना था कि एक पत्नी की तुलना वोडाफोन के पग कुत्ते से करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि वैवाहिक रिश्ते में पत्नी एक स्वायत्त और समान अधिकार वाली भागीदार होती है, न कि कोई अनुयायी या पालतू जीव। उन्होंने आगाह किया कि अदालती टिप्पणियों और उदाहरणों का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है, और ऐसी उपमाएं अनजाने में उन्हीं रूढ़िवादी लैंगिक धारणाओं को बढ़ावा दे सकती हैं जिनसे कानून को दूर रहने की जरूरत है।

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