ग्वालियर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पुलिस महकमे में रिश्वतखोरी के एक मामले में सहायक उप-निरीक्षक (एएसआई) को दी गई विभागीय सजा को निरस्त कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि एक ही घटना या संयुक्त जांच में शामिल होने मात्र से दो कर्मियों को एक जैसा दंड नहीं दिया जा सकता। हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि मुख्य आरोपों से बरी हो चुके और केवल सूचना न देने के दोषी पाए गए कर्मी को घूसखोरी के मुख्य आरोपी जितनी कड़ी सजा देना पूरी तरह अनुचित है।
जस्टिस आनंद सिंह बहरावत की एकल पीठ ने 1 सितंबर के अपने आदेश में अनुशासनात्मक प्राधिकारी को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता एएसआई को सुनवाई का समुचित अवसर देकर नए सिरे से तर्कसंगत आदेश पारित करे। साथ ही अदालत ने यह भी तय करने को कहा कि याचिकाकर्ता को मिलने वाली कोई भी नई सजा सह-आरोपी सब-इंस्पेक्टर (एसआई) की तुलना में अनिवार्य रूप से कम होनी चाहिए।
दोष के अनुपात में सजा का अभाव
मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस बहरावत ने कहा कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने दोनों कर्मियों का संचयी प्रभाव से एक वार्षिक वेतन वृद्धि रोकने का समान दंड निर्धारित किया था। जबकि जांच में यह स्पष्ट था कि याचिकाकर्ता पर रिश्वतखोरी या गंभीर कदाचार का दोष साबित नहीं हुआ था; उस पर केवल अपने वरिष्ठ अधिकारियों को मामले की जानकारी न देने का सीमित आरोप सही पाया गया था।
अदालत ने अपने आदेश में टिप्पणी की कि सिर्फ इसलिए कि दो कर्मचारी एक ही घटना से जुड़े थे या उनके खिलाफ एक ही विभागीय जांच चलाई गई, उन्हें समान दंड दिया जाना सही नहीं ठहराया जा सकता। प्रत्येक कर्मी की व्यक्तिगत भूमिका, जिम्मेदारी और कदाचार की गंभीरता का अलग-अलग मूल्यांकन किया जाना आवश्यक है।
घटनाक्रम और पूर्व विभागीय कार्रवाई
याचिकाकर्ता, जो वर्तमान में पुलिस लाइन्स ग्वालियर में एएसआई के पद पर पदस्थ हैं, ने अदालत को बताया कि एक शिकायत के आधार पर 22 अक्टूबर 2018 को उन्हें और दो अन्य पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया था। उन पर आरोप था कि उन्होंने अवैध गतिविधि में सब-इंस्पेक्टर का सहयोग किया और अपने उच्चाधिकारियों को सूचित नहीं किया। हालांकि, जांच अधिकारी ने 12 दिसंबर 2018 को उनका निलंबन समाप्त कर दिया था।
जांच प्रक्रिया पूरी होने पर विभागीय अनुशासन प्राधिकारी ने दोनों पुलिसकर्मियों को संचयी प्रभाव से एक वेतन वृद्धि रोकने का एक समान दंड सुना दिया। इस निर्णय से व्यथित होकर एएसआई ने विभागीय अपील दायर की, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद लगाई गई दया याचिका भी जून 2021 में निरस्त कर दी गई। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अदालत में दोनों पक्षों के तर्क
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता राघवेंद्र दीक्षित ने दलील दी कि विभागीय जांच अधिकारी ने उनके मुवक्किल पर रिश्वतखोरी के मुख्य आरोपों को सिद्ध नहीं पाया था। जांच में केवल यही सामने आया कि वह उच्चाधिकारियों को घटना की जानकारी देने में विफल रहे। अधिवक्ता ने तर्क दिया कि भ्रष्टाचार और कदाचार के गंभीर आरोप केवल सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ साबित हुए थे, इसलिए एएसआई पर थोपी गई यह सजा भूमिका के लिहाज से अत्यधिक और असंगत है।
दूसरी ओर, राज्य सरकार का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता बी. एम. पटेल ने कहा कि विभागीय जांच तय नियमों और प्रक्रिया के तहत पूरी निष्पक्षता से की गई थी। याचिकाकर्ता को अपनी बात रखने का पूरा मौका दिया गया था, जिसके बाद ही प्राधिकारी ने नियमानुसार एक वेतन वृद्धि रोकने का निर्णय लिया था।
अपीलीय अधिकारियों के रवैये पर अदालत की सख्ती
हाईकोर्ट ने अपीलीय और पुनरीक्षण अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि इन निकायों ने बिना अपना विवेक लगाए यांत्रिक तरीके से निचली सजा को बरकरार रखा। वे अपने आदेशों में यह ठोस कारण बताने में पूरी तरह विफल रहे कि जिस व्यक्ति पर रिश्वत का संगीन आरोप साबित हुआ है, उसे और केवल सूचना देने से चूके कर्मी को एक ही तराजू में क्यों तौला जाना चाहिए।
अदालत ने कहा कि सह-आरोपी और याचिकाकर्ता की भूमिका में अंतर एक बेहद महत्वपूर्ण पहलू था, जिसकी अनदेखी की गई। हाईकोर्ट ने पाया कि एएसआई को दी गई सजा प्रक्रियागत गैर-कानूनी खामियों और असंगतता से ग्रस्त है। इसके चलते अदालत ने मूल दंड आदेश, अपीलीय आदेश तथा दया याचिका खारिज करने वाले आदेश को निरस्त कर मामला पुनर्विचार के लिए अनुशासनात्मक प्राधिकारी के पास भेज दिया।

