गुजरात नशाबंदी कानून की धारा 98(2) जब्त वाहनों की अंतरिम रिहाई पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाती: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि गुजरात नशाबंदी कानून, 1949 की धारा 98(2) जब्त किए गए वाहनों को अंतरिम कस्टडी पर रिहा करने पर कोई पूर्ण वैधानिक प्रतिबंध (एब्सोल्यूट एम्बार्गो) नहीं लगाती है। कोर्ट ने कहा कि मुकदमों के लंबित रहने के दौरान पुलिस थानों में खड़े वाहनों को सड़ने और नष्ट होने से बचाने के लिए निचली अदालतों को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (सीआरपीसी) की धारा 451 के तहत अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल करना चाहिए। गुजरात हाईकोर्ट और निचली अदालतों के आदेशों को खारिज करते हुए जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने भारी मात्रा में शराब के साथ पकड़े गए एक अशोक लेलैंड ट्रक को 15 लाख रुपये के निजी मुचलके और सुरक्षा (सिक्योरिटी) सहित अन्य शर्तों पर अंतरिम कस्टडी में सौंपने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 4 और 5 जनवरी 2025 की दरमियानी रात का है। मैसर्स एबीसी एक्सप्रेस के स्वामित्व वाला अशोक लेलैंड ट्रक (पंजीकरण संख्या आरजे-14-जीक्यू-22692) मोडासा से लूणावाड़ा होते हुए वडोदरा की ओर जा रहा था, तभी पुलिस ने उसे रोका। ट्रक को केवल उसका चालक कासिद मोहम्मद खान चला रहा था। पूछताछ में उसने बताया कि वाहन में अपीलकर्ता कंपनी का विविध व्यावसायिक सामान लदा हुआ है।

जब पुलिस ने ट्रक के पीछे के दरवाजों को खोला, तो उसमें प्लास्टिक के थैलों, प्लास्टिक के डिब्बों और खाकी रंग के गत्ते के बक्सों में रखी भारतीय निर्मित विदेशी शराब (आईएमएफएल) पाई गई। चालक शराब परिवहन से जुड़ा कोई वैध पास या परमिट नहीं दिखा सका, जिसके बाद चालक और ट्रक दोनों को हिरासत में लेकर स्थानीय अपराध शाखा (लोकल क्राइम ब्रांच) के कार्यालय ले जाया गया। पंच गवाहों की मौजूदगी में की गई गिनती में 17,02,656 रुपये मूल्य की आईएमएफएल की 8,064 बोतलें (लगभग 22,532.253 लीटर) बरामद की गईं। इसके साथ ही ट्रक में 98,66,552 रुपये मूल्य की वैध खाद्य सामग्री भी पाई गई।

इस जब्ती के बाद जिला महिसागर के लूणावाड़ा पुलिस स्टेशन में नशाबंदी कानून की धारा 65(ए), 65(ई), 98(2), 81, 116(बी) और 83 के तहत अपराध दर्ज किया गया। जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने 1 मार्च 2025 को चालक सहित चार आरोपियों के खिलाफ सक्षम अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी।

अपीलकर्ता कंपनी ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, लूणावाड़ा के समक्ष भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) की धारा 497 के तहत मुद्दीमाल अर्जी दायर कर वाहन की अंतरिम कस्टडी मांगी। मजिस्ट्रेट ने 22 मई 2025 को यह अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद महिसागर के सत्र न्यायाधीश ने 7 अगस्त 2025 को इस आदेश की पुष्टि कर दी। इसके खिलाफ गुजरात हाईकोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 तथा बीएनएसएस की धारा 528 के तहत दाखिल याचिका भी 9 सितंबर 2025 को खारिज हो गई, जिसके बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि जब्त वाहन एक व्यावसायिक ट्रांसपोर्ट वाहन है जिसे चालक से पकड़ा गया था, और वाहन मालिक का कथित अपराध में कोई हाथ नहीं है। यह भी कहा गया कि मुकदमे की सुनवाई पूरी होने में चार से पांच साल लग सकते हैं। ट्रक एक साल से अधिक समय से थाने में खुले में खड़ा है और लगातार खराब हो रहा है। अपीलकर्ता ने वाहन की अंतरिम कस्टडी पाने के लिए पर्याप्त सुरक्षा राशि देने की पूरी सहमति जताई।

दूसरी तरफ, गुजरात राज्य के वकील ने तर्क दिया कि नशाबंदी कानून की संशोधित धारा 98(2) के तहत तय सीमा से अधिक मात्रा में शराब पाए जाने पर जब्त वाहन को बॉन्ड या जमानत पर रिहा नहीं किया जा सकता। राज्य ने कहा कि निचली अदालतों और हाईकोर्ट ने अंतरिम कस्टडी की अर्जी खारिज करके बिल्कुल सही फैसला लिया था।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और पूर्व निर्णय

दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों ने सीआरपीसी की धारा 451, 457, 458 और 459 के तहत अपने अधिकारों का बेहद संकीर्ण दायरा मानकर गंभीर त्रुटि की है। कोर्ट ने रेखांकित किया कि जब्त की गई संपत्ति को वर्षों तक पुलिस थानों में बेकार खड़े रखने से किसी का कोई भला नहीं होता, बल्कि इससे वाहन मालिक को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचता है।

खेंगरभाई लखाभाई डंभाला बनाम गुजरात राज्य (2024) के फैसले का हवाला देते हुए पीठ ने नशाबंदी कानून की धारा 98 और धारा 132 तथा सीआरपीसी की धारा 451 के आपसी तालमेल की व्याख्या की। सुप्रीम कोर्ट ने खेंगरभाई मामले के निम्नलिखित निष्कर्षों को उद्धृत किया:

“धारा 98 की उप-धारा (1) उन वस्तुओं से संबंधित है जो इस कानून के तहत अपराध किए जाने पर जब्त (कॉन्फिसकेट) किए जाने योग्य हैं। हालांकि, धारा 98 की उप-धारा (2) दो भागों में है। पहला भाग ‘लेकिन’ शब्द से पहले तक का है, जो पात्र, पैकेज या आवरण तथा ऐसी वस्तु ले जाने में प्रयुक्त पशुओं, गाड़ियों, जलयानों या अन्य वाहनों की जब्ती की बात करता है। दूसरा भाग, जो ‘लेकिन’ शब्द से शुरू होता है, उसे एक ऐसे प्रतिबंध के रूप में देखा जाता है कि यदि पकड़ी गई शराब की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक है, तो अदालत के अंतिम फैसले तक वाहन को छोड़ा नहीं जाएगा… चूंकि 2011 के संशोधन द्वारा जोड़ा गया यह दूसरा भाग बहुत स्पष्ट शब्दों में तैयार नहीं किया गया है, इसलिए सामंजस्यपूर्ण निर्माण के सिद्धांत (डॉक्ट्रिन ऑफ हारमोनियस कंस्ट्रक्शन) को लागू करते हुए हमें इसके प्रावधानों को इस कानून के अन्य प्रावधानों और सीआरपीसी के प्रावधानों के साथ समन्वित करना होगा।”

कोर्ट ने आगे उद्धृत किया:

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“सीआरपीसी की धारा 451 तब प्रभावी होती है जब जांच या अन्वेषण के दौरान जब्त की गई वस्तु या संपत्ति धारा 132 के खंड (ए) के अनुसार संबंधित अदालत के समक्ष पेश की जाती है, और अदालत से जांच या मुकदमे के निष्कर्ष तक ऐसी वस्तु या संपत्ति की उचित कस्टडी के लिए उपयुक्त आदेश पारित करने की अपेक्षा की जाती है।”

सुप्रीम कोर्ट ने तीन जजों की पीठ द्वारा दिए गए ऐतिहासिक निर्णय बसव्वा कोम दयामनगौड़ा पाटिल बनाम मैसूर राज्य (1977) का उल्लेख करते हुए कहा:

“संहिता के विभिन्न प्रावधानों का उद्देश्य और योजना यह दर्शाती है कि जब अपराध से जुड़ी संपत्ति पुलिस द्वारा जब्त की जाती है, तो उसे अदालत या पुलिस की कस्टडी में आवश्यकता से अधिक समय तक नहीं रखा जाना चाहिए। चूंकि पुलिस द्वारा संपत्ति की जब्ती सरकारी सेवक को संपत्ति सौंपे जाने के समान है, इसलिए आवश्यकता समाप्त होते ही संपत्ति उसके मूल मालिक को वापस लौटाई जानी चाहिए। यह स्पष्ट है कि संपत्ति मालिक को दो चरणों में लौटाई जा सकती है। पहले चरण में इसे किसी जांच या मुकदमे के दौरान लौटाया जा सकता है। यह विशेष रूप से तब आवश्यक हो जाता है जब संबंधित संपत्ति प्राकृतिक क्षय या तेजी से नष्ट होने की स्थिति में हो।”

पीठ ने सुंदरभाई अंबालाल देसाई बनाम गुजरात राज्य (2002) और जनरल इंश्योरेंस काउंसिल बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2010) के फैसलों पर भी भरोसा जताया, जिसमें कहा गया था:

“यह सर्वविदित तथ्य है कि जब वाहनों को जब्त कर विभिन्न थानों में रखा जाता है, तो वे न केवल थानों की काफी जगह घेरते हैं, बल्कि खुले में पड़े रहने के कारण मौसम के प्रभाव से तेजी से प्राकृतिक रूप से नष्ट होते हैं। एक अच्छी स्थिति वाला वाहन भी यदि पंद्रह दिनों से अधिक समय तक थाने में खड़ा रहे, तो वह सड़क पर चलने की अपनी क्षमता खो देता है। इसके अलावा, यह भी सामान्य जानकारी में है कि ऐसे वाहनों के कई मूल्यवान और महंगे पुर्जे या तो चोरी हो जाते हैं या निकाल लिए जाते हैं, जिससे वे वाहन सड़क पर चलने लायक नहीं रह जाते….”

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट द्वारा संदर्भित फैसले इस मामले पर लागू नहीं होते। मध्य प्रदेश राज्य बनाम उदय सिंह (2020) भारतीय वन अधिनियम, 1927 से जुड़ा था, जहां जब्ती की सूचना मिलने पर धारा 52-सी अदालतों के अधिकार क्षेत्र को स्पष्ट रूप से समाप्त करती है। वहीं, मुलतानी हनीफभाई कालूभाई बनाम गुजरात राज्य (2013) गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम, 1954 से संबंधित था, जिसमें संपत्ति जब्त करने (कॉन्फिसकेशन) का प्रावधान ही नहीं था। इसके विपरीत, नशाबंदी कानून अपनी जब्ती प्रक्रिया में मालिक को नोटिस, सुनवाई का अवसर और जुर्माने का विकल्प देता है, जो अंतरिम रिहाई के आड़े नहीं आ सकता।

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अदालत का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ट्रक के लगातार थाने में खड़े रहने से अपीलकर्ता की आजीविका को निरंतर नुकसान हो रहा है। वाहन केवल जगह घेर रहा है और बिना किसी उपयोग के दिन-ब-दिन खराब हो रहा है, जबकि मामले में चार्जशीट पहले ही दाखिल की जा चुकी है। कोर्ट ने कहा कि वाहन के साक्ष्य मूल्य को पंचनामा, फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के जरिए सुरक्षित रखा जा सकता है, जैसा कि खाद्य पदार्थों को छोड़ते समय किया गया था।

अपील को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों और हाईकोर्ट के आदेशों को निरस्त कर दिया तथा वाहन को निम्नलिखित शर्तों पर अपीलकर्ता की अंतरिम कस्टडी में सौंपने का निर्देश दिया:

  1. अपीलकर्ता को ट्रायल कोर्ट की संतुष्टि के अनुसार 15,00,000 रुपये (पंद्रह लाख रुपये) का निजी मुचलका और उपयुक्त सुरक्षा जमा करानी होगी।
  2. अपीलकर्ता यह वचन देगा कि जब भी जांच अधिकारी या ट्रायल कोर्ट द्वारा निर्देश दिया जाएगा, वह ट्रक को पेश करेगा।
  3. मुकदमे के लंबित रहने के दौरान अपीलकर्ता इस वाहन को न तो बेचेगा और न ही इस पर कोई तीसरा पक्ष अधिकार (थर्ड पार्टी इंटरेस्ट) बनाएगा।
  4. वाहन सौंपने से पहले जांच अधिकारी अपीलकर्ता के अधिकृत प्रतिनिधि और दो स्वतंत्र गवाहों की उपस्थिति में वाहन का विस्तृत पंचनामा तैयार करेगा, साथ ही उसकी मौजूदा स्थिति की तस्वीरें और वीडियोग्राफी कराकर रिकॉर्ड पर रखेगा।
  5. मुकदमे के अंत में यदि धारा 98(2) के तहत वाहन को पूरी तरह जब्त करने का आदेश दिया जाता है, तो ट्रायल कोर्ट को जमा सुरक्षा राशि से भरपाई करने या कानून सम्मत तरीके से वाहन की नीलामी करने की छूट होगी।
  6. अपीलकर्ता को ट्रायल कोर्ट द्वारा अभियोजन और मुकदमे के हित में लगाई जाने वाली किन्हीं अन्य शर्तों का भी पालन करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश में की गई टिप्पणियां केवल वाहन की अंतरिम कस्टडी तक ही सीमित हैं और इन्हें लंबित आपराधिक मुकदमे के गुण-दोष पर अदालत की राय नहीं माना जाएगा।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: मैसर्स एबीसी एक्सप्रेस बनाम गुजरात राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 4172/2026 (एस.एल.पी. (क्रिमिनल) संख्या 10301/2026 से उद्भूत)
पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर
निर्णय की तिथि: 02 सितंबर, 2026

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