तलाक के बाद भी क्रूरता और दहेज उत्पीड़न के मामले में राहत नहीं, तेलंगाना हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका

हैदराबाद तेलंगाना हाईकोर्ट ने पूर्व पत्नी द्वारा दर्ज कराए गए दहेज उत्पीड़न, शारीरिक शोषण और पैसों की उगाही से जुड़े आपराधिक मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने आरोपी व्यक्ति की याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि महिला द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों की सच्चाई का फैसला केवल पूरी अदालती सुनवाई के बाद ही हो सकता है, इसलिए शुरुआती स्तर पर मुकदमे को खत्म नहीं किया जा सकता।

जस्टिस एन तुकारामजी ने 25 अगस्त को सुनाए गए फैसले में कहा कि लगातार मारपीट, मानसिक उत्पीड़न, यौन शोषण और मोटी रकम ऐंठने के आरोपों को पहली नजर में बेबुनियाद या मनगढ़ंत नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने माना कि पैसों के लेन-देन की सही प्रकृति और पुलिस शिकायत दर्ज करने में हुई देरी जैसे विवादित मुद्दों की पुष्टि गवाहों और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्यों के जरिए ट्रायल कोर्ट में ही की जानी चाहिए।

गंभीर प्रताड़ना और पैसों की मांग के आरोप

दोनों का विवाह अप्रैल 2008 में हुआ था। पुलिस द्वारा दाखिल चार्जशीट के अनुसार, महिला ने आरोप लगाया है कि शादी की शुरुआत से ही उसका पति शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित करता आ रहा था। शिकायत के मुताबिक, आरोपी शराब का आदी था, अन्य महिलाओं के साथ संबंध रखता था, पत्नी को अश्लील सामग्री देखने के लिए मजबूर करता था और उसने शादी से पहले अपनी गुप्त बीमारी की बात भी छिपाई थी।

महिला ने यह भी आरोप लगाया कि 2016 में जब उसने वीआरएस लिया, तो आरोपी ने दबाव डालकर उसके बचत और सेवानिवृत्ति के पैसों में से 10 लाख रुपये ट्रांसफर करवा लिए। इसके बाद आरोपी ने अपने मकान के जीर्णोद्धार के लिए 25 लाख रुपये की अतिरिक्त मांग की। जब महिला ने पैसे देने से इनकार कर दिया, तो उसके बाल खींचकर बुरी तरह पीटा गया और बाद में पति ने उसे छोड़ दिया। महिला की इस शिकायत पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर जांच पूरी की और अदालत में चार्जशीट पेश की।

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तलाक के बाद भी धमकियों की शिकायत

दिसंबर 2021 में एक फैमिली कोर्ट ने दोनों के विवाह को औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया था। अदालत ने उस समय महिला को स्थायी गुजारा भत्ते के रूप में 10 लाख रुपये देने का आदेश भी दिया था। हालांकि, महिला ने बाद में एक अन्य शिकायत दर्ज कराई, जिसमें आरोप लगाया कि तलाक हो जाने के बाद भी आरोपी उसे फोन, मैसेज और ईमेल के जरिए लगातार धमका और परेशान कर रहा है।

अदालत का रुख और कानूनी पहलू

आरोपी ने हाईकोर्ट में दलील दी थी कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोप अस्पष्ट और निराधार हैं, जिनसे कोई ठोस अपराध साबित नहीं होता। वहीं, महिला ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि चार्जशीट में मुकदमे के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं।

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जस्टिस तुकारामजी ने स्पष्ट किया कि केवल किसी अन्य महिला से संबंध होना अपने आप में भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए के तहत क्रूरता का अपराध नहीं बनता। उसका यह आचरण कानून के दायरे में क्रूरता की श्रेणी में आता है या नहीं, इसका निर्धारण ट्रायल कोर्ट में पेश सबूतों के आधार पर ही होगा।

इसके साथ ही अदालत ने कहा कि 10 लाख रुपये का लेन-देन और 25 लाख रुपये की मांग घरेलू आर्थिक व्यवस्था थी या विवाह से जुड़ा दहेज उत्पीड़न, यह एक विवादित तथ्य है जिसकी जांच सुनवाई के दौरान होगी। अदालत ने यह भी साफ किया कि शिकायत दर्ज कराने में देरी के आधार पर आपराधिक कार्यवाही को रद्द नहीं किया जा सकता, क्योंकि इससे शिकायतकर्ता की विश्वसनीयता पर क्या असर पड़ता है, यह ट्रायल का विषय है

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