BCI चेयरमैन के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान वकीलों से कथित मारपीट की CBI जांच की मांग, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट जाने को कहा

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान वकीलों से कथित मारपीट की CBI जांच की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को दिल्ली हाईकोर्ट जाने की छूट दी है।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने याचिकाकर्ताओं को अपनी याचिका वापस लेने और संबंधित हाईकोर्ट का रुख करने की अनुमति दी। सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को मूल पेपर बुक वापस करने का भी निर्देश दिया गया, ताकि याचिकाकर्ता हाईकोर्ट में मामला दाखिल कर सकें।

मामला 21 अगस्त की उस घटना से जुड़ा है, जब करीब 20 से 25 वकील BCI परिसर में चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इस दौरान खुद को वकील बताने वाले कुछ लोगों ने प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट की। उनका दावा है कि पूरी घटना BCI परिसर में लगे CCTV कैमरों में रिकॉर्ड हुई है।

CBI जांच और CCTV फुटेज सुरक्षित रखने की मांग

एडवोकेट प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मामले का उल्लेख करते हुए बताया कि याचिकाकर्ता घटना की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से कराने और CCTV फुटेज को तत्काल सुरक्षित रखने का आदेश चाहते हैं।

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भूषण ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले से ही BCI से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रहा है, इसलिए इस याचिका पर भी शीर्ष अदालत को विचार करना चाहिए। हालांकि, बेंच ने कहा कि इस मामले को दिल्ली हाईकोर्ट देख सकता है।

भूषण ने मनन कुमार मिश्रा के एक कथित बयान का भी जिक्र किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि घटना के बाद मिश्रा ने प्रदर्शनकारी वकीलों के लिए ‘लीगल कॉकरोच’ शब्द का इस्तेमाल किया था और कहा था कि दूसरे वकीलों ने आकर उन्हें पीटा और वहां से हटा दिया।

मनन कुमार मिश्रा के खिलाफ यह विरोध प्रदर्शन NALSAR हैदराबाद के 2026 बैच के छात्रों के नामांकन पर रोक लगाने के उनके हालिया आदेश के बाद हुआ था। छात्रों ने CJI के खिलाफ अभियान चलाया था। कानूनी बिरादरी के भीतर और बाहर आलोचना के बाद यह फैसला वापस ले लिया गया था।

वकीलों के प्रदर्शन पर बेंच ने उठाए सवाल

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सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने वकीलों के विरोध प्रदर्शन के तरीके पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि वकील एक अनुशासित पेशे से जुड़े हैं और उनकी शिकायतों के समाधान के लिए तय व्यवस्था और उचित मंच उपलब्ध हैं।

जस्टिस बागची ने इस बात पर जोर दिया कि न्याय प्रशासन से जुड़े मामलों में वकीलों से कोर्ट के अधिकारी के रूप में एक निश्चित आचरण की अपेक्षा की जाती है। उन्होंने कहा कि आम नागरिकों को सड़कों पर उतरकर विरोध करने का अधिकार है, लेकिन वकीलों के लिए अपनी शिकायतें उठाने के निर्धारित कानूनी रास्ते भी मौजूद हैं।

बेंच ने कहा कि जब कानून वकीलों को अपनी शिकायत उठाने और उचित मंच का रुख करने का अवसर देता है, तो उन्हें उसी प्रक्रिया का इस्तेमाल करना चाहिए।

प्रशांत भूषण ने इस पर कहा कि अगर वकील प्रदर्शन कर भी रहे थे, तब भी उनके साथ मारपीट नहीं की जा सकती थी। CJI सूर्यकांत ने इस बात से सहमति जताई।

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याचिका वापस, अब दिल्ली हाईकोर्ट जाएंगे वकील

सुप्रीम कोर्ट ने मामले के आरोपों की मेरिट पर विचार करने के बजाय स्पष्ट किया कि इसके लिए हाईकोर्ट उचित मंच है। CJI सूर्यकांत ने संकेत दिया कि हर मामले को सीधे सुप्रीम कोर्ट में सुनने से यह धारणा बन सकती है कि शीर्ष अदालत हर तरह के विवाद को अपने सामने ले रही है।

बेंच का रुख स्पष्ट होने के बाद प्रशांत भूषण ने याचिका वापस लेने और दिल्ली हाईकोर्ट जाने पर सहमति जताई।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने रजिस्ट्री को मूल पेपर बुक याचिकाकर्ताओं को वापस करने का निर्देश दिया, ताकि वे दिल्ली हाईकोर्ट में उचित कार्यवाही शुरू कर सकें।

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