डॉक्टरों पर हमला करने वाले जमानत के हकदार नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के स्वतः संज्ञान और दखल को ठहराया पूरी तरह सही

सुप्रीम कोर्ट ने ठाणे जिले के एक सरकारी अस्पताल में डॉक्टरों के साथ हुई मारपीट के मामले में बेहद सख्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने मंगलवार को कहा कि चिकित्साकर्मियों पर हमला करने वाले लोग किसी भी सूरत में जमानत के हकदार नहीं हैं। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस कदम को पूरी तरह उचित ठहराया, जिसमें हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए कल्याण-डोंबिवली नगर निगम के शिवसेना पार्षद रमेश म्हात्रे की जमानत पर रोक लगा दी थी।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और जस्टिस संदीप मेहता की तीन सदस्यीय पीठ उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा जारी किए गए आदेशों और जमानत की शर्तों को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि हाईकोर्ट द्वारा 18 जुलाई को जमानत पर रोक लगाने का आदेश गलत था। इस दलील को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह ऐसा मामला था जिसमें हाईकोर्ट का खुद संज्ञान लेना और जमानत पर रोक लगाना पूरी तरह से न्यायसंगत था।

चिकित्सकों पर हिंसा और भीड़ के खौफ पर सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों पर होने वाली हिंसा को लेकर गहरी नाराजगी जताई। पीठ ने कहा कि जिन लोगों के मन में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के प्रति कोई सम्मान नहीं है, वे राहत पाने के पात्र नहीं हैं। अदालत ने इस बात को रेखांकित किया कि अस्पताल के भीतर घुसकर एक महिला चिकित्सक सहित ड्यूटी पर तैनात डॉक्टरों पर हमला किया गया और इस पूरी घटना का वीडियो भी सामने आया था।

अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए सवाल किया कि जब कोई अनियंत्रित भीड़ हमला करती है, तो पीड़ित व्यक्ति के मानसिक आघात की कल्पना कीजिए। क्या कोई भी व्यक्ति अस्पताल के अंदर जाकर किसी पर भी हमला कर सकता है?

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राज्य सरकार भी करेगी जमानत का विरोध, अगली सुनवाई 7 सितंबर को

मंगलवार को हुई सुनवाई में महाराष्ट्र सरकार के वकील ने सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी कि राज्य सरकार भी आरोपियों को जमानत देने के फैसले के खिलाफ अलग से याचिका दाखिल करेगी। सभी दलीलों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 7 सितंबर तय की है।

अस्पताल में विवाद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का कानूनी घटनाक्रम

यह मामला 6 जुलाई को ठाणे जिले के शास्त्री नगर अस्पताल में हुई घटना से जुड़ा है। अस्पताल में भर्ती एक गर्भवती महिला के परिजनों ने डॉक्टरों और कर्मचारियों पर इलाज में देरी का आरोप लगाया था। इसके बाद रमेश म्हात्रे अपने अन्य साथियों के साथ अस्पताल पहुंचे। इलाज के समय को लेकर शुरू हुआ विवाद देखते ही देखते डॉक्टरों के साथ मारपीट में बदल गया, जिससे भारी रोष फैल गया था।

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इस मामले में कानूनी घटनाक्रम इस प्रकार रहा:

  • 14 जुलाई: ठाणे की स्थानीय अदालत ने आरोपी रमेश म्हात्रे को जमानत दे दी।
  • 18 जुलाई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने मामले का स्वतः संज्ञान लिया। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को गलत ठहराते हुए जमानत पर अंतरिम रोक लगा दी और म्हात्रे को पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।
  • 7 अगस्त: बॉम्बे हाईकोर्ट ने म्हात्रे और तीन अन्य सह-आरोपियों को कुछ कड़ी शर्तों के साथ जमानत दे दी। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि जब तक मामले में चार्जशीट दाखिल नहीं हो जाती, तब तक सभी आरोपी महाराष्ट्र राज्य की सीमा से बाहर रहेंगे। इसके अलावा हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई को तय समय सीमा में और फास्ट-ट्रैक आधार पर पूरा करने का भी निर्देश दिया।
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हाईकोर्ट द्वारा लगाई गई इन्हीं शर्तों और आदेशों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गई थीं, जिन पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के सख्त रवैये को पूरी तरह जायज ठहराया।

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