सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों की पीठ, जिसमें जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल हैं, ने स्पष्ट किया है कि किसी कंपनी द्वारा काउंटर-एफिडेविट में यह कहना कि वह किसी सौदे को आगे नहीं बढ़ा रही है, केवल एक स्पष्टीकरणात्मक बयान है, न कि कोई बिना शर्त दी गई अंडरटेकिंग (वचनबद्धता) जिस पर अदालत की अवमानना की कार्रवाई की जा सके। हालांकि, कॉरपोरेट पुनर्गठन और पारिवारिक नियंत्रण के जरिए विदेशी मनी डिक्री को केवल एक “कागजी डिक्री” बनाने के जोखिम को देखते हुए अदालत ने जजमेंट डेटर निम्मगड्डा प्रसाद और संबंधित कंपनियों को दो सप्ताह के भीतर सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में ₹200 करोड़ की अतिरिक्त सुरक्षा संयुक्त व पृथक रूप से जमा कराने का निर्देश दिया है। इसके अलावा, अदालत ने विलय के बाद संपत्तियों के हस्तांतरण पर एनसीएलटी की सुरक्षात्मक शर्तों को बहाल किया और हैदराबाद व रंगा रेड्डी की कमर्शियल कोर्ट्स को चार महीने के भीतर मुख्य निष्पादन याचिकाओं का निपटारा करने का आदेश दिया।
विवाद की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता, रास अल खैमाह इनवेस्टमेंट अथॉरिटी (आरएकेआईए/RAKIA), संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की रास अल खैमाह सरकार से जुड़ी एक सार्वजनिक संस्था है। आंध्र प्रदेश सरकार और रास अल खैमाह सरकार के बीच वाडरेवु पोर्ट, निज़ामपटनम पोर्ट, इंडस्ट्रियल कॉरिडोर और एयरपोर्ट के विकास (वानपिक/VANPIC प्रोजेक्ट) के लिए एक समझौता ज्ञापन हुआ था। आरएकेआईए ने इस प्रोजेक्ट में निवेश के लिए निम्मगड्डा प्रसाद (एनपी) को फंड सौंपा था, जिसे लेकर आरोप है कि उन्होंने इस राशि का गबन किया।
आरएकेआईए ने यूएई की अदालतों में दीवानी और आपराधिक कार्रवाई शुरू की। 2 फरवरी 2022 को रास अल खैमाह कोर्ट ऑफ फर्स्ट इंस्टेंस (सिविल प्लेनरी सर्किट) ने माना कि आरएकेआईए धोखाधड़ी की शिकार हुई है और निम्मगड्डा प्रसाद को 5 अक्टूबर 2021 से 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ 26,79,41,374 यूएई दिरहम (लगभग ₹543.92 करोड़) चुकाने का आदेश दिया। इस डिक्री को वहां की सिविल सर्किट कोर्ट इन कैसेशन ने 27 दिसंबर 2022 को बिना किसी बदलाव के बरकरार रखा।
इस विदेशी डिक्री को भारत में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (सीपीसी) की धारा 44ए के तहत निष्पादित कराने के लिए आरएकेआईए ने हैदराबाद की कमर्शियल कोर्ट और तेलंगाना के रंगा रेड्डी की कमर्शियल कोर्ट में निष्पादन याचिकाएं (एग्जीक्यूशन पिटीशंस) दायर कीं। अक्टूबर 2023 में आरएकेआईए ने आईक्वेस्ट एंटरप्राइजेज प्राइवेट लिमिटेड (आईक्वेस्ट) को पक्षकार बनाने और उसकी संपत्तियों पर रोक लगाने के लिए आवेदन दिया, जिसमें आरोप लगाया गया कि प्रसाद विभिन्न कंपनियों के नेटवर्क पर नियंत्रण रखते हैं।
1 मई 2024 को हैदराबाद की कमर्शियल कोर्ट ने रोक लगाने की याचिका का निपटारा कर दिया, क्योंकि आईक्वेस्ट ने अपने काउंटर-एफिडेविट में कहा था कि वह शुरुआत में वियाट्रिस के अधिग्रहण में रुचि रखती थी, लेकिन बाद में उसने आगे न बढ़ने का फैसला किया। आरएकेआईए का दावा था कि आईक्वेस्ट ने इस बयान की अनदेखी करते हुए मैट्रिक्स फार्माकॉर्प प्राइवेट लिमिटेड के जरिए टियानिश लेबोरेटरीज प्राइवेट लिमिटेड का अधिग्रहण किया, जिसमें प्रसाद के परिवार के सदस्यों की बड़ी हिस्सेदारी है और आईक्वेस्ट टर्मिनेशन फीस के लिए बैक-स्टॉप के रूप में शामिल थी।
इसके बाद आरएकेआईए द्वारा दायर अवमानना याचिका को तेलंगाना हाईकोर्ट ने 7 नवंबर 2025 को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने माना कि काउंटर-एफिडेविट का बयान सिर्फ एक स्पष्टीकरण था, कोई अंडरटेकिंग नहीं, और समरी अवमानना कार्यवाही में ‘अल्टर ईगो’ (कॉरपोरेट नकाब हटाने) का सिद्धांत लागू नहीं होता। दूसरी ओर, कंपनी अधिनियम की धारा 230 के तहत मैट्रिक्स और टियानिश के विलय को मंजूरी देते समय एनसीएलटी ने संपत्तियों के हस्तांतरण पर अदालत की पूर्व अनुमति की सुरक्षात्मक शर्तें लगाई थीं, जिसे एनसीएलएटी ने हटा दिया था। इन सभी मामलों को लेकर अपीलें सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं।
पक्षों की दलीलें
आरएकेआईए की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी और गोपाल शंकरनारायणन ने तर्क दिया कि 23 जुलाई 2026 तक ब्याज सहित डिक्री की कुल राशि लगभग ₹949.96 करोड़ हो चुकी है, जो अभी भी असंतुष्ट है। उन्होंने कहा कि जजमेंट डेटर और उनके परिवार ने संपत्तियों को बचाने और डिक्री को निष्प्रभावी करने के लिए जानबूझकर कॉरपोरेट पुनर्गठन किया। उन्होंने दलील दी कि आईक्वेस्ट का बयान एक बाध्यकारी अंडरटेकिंग था जिसका उल्लंघन किया गया और लंबित मुकदमों को छिपाकर भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) से ग्रीन चैनल के तहत मंजूरी ली गई। उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि कॉरपोरेट का नकाब हटाया जाए और विदेशी डिक्री के सम्मान (कॉमिटी ऑफ कोर्ट्स) के लिए पूरी सुरक्षा राशि सुनिश्चित की जाए।
निम्मगड्डा प्रसाद, उनके परिजनों और आईक्वेस्ट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सी.ए. सुंदरम, मुकुल रोहतगी, डी.एस. नायडू, बलबीर सिंह और नीरज कौल ने दलील दी कि वे पहले ही ₹225 करोड़ नकद और लगभग ₹400 करोड़ मूल्य की मेडचल स्थित 37 एकड़ जमीन के टाइटल डीड जमा कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि अपीलकर्ता लगभग 32 अर्जियां दाखिल कर एक बड़े और बैंक-वित्तपोषित व्यापारिक समूह के सामान्य कामकाज को बाधित करने की कोशिश कर रहा है। आईक्वेस्ट के वकीलों ने जोर दिया कि प्रसाद 2012 से 2014 के बीच ही कंपनी से बाहर हो चुके थे, जो कि विदेशी डिक्री आने से आठ साल पहले की बात है। उन्होंने सीपीसी की धारा 60 का हवाला देते हुए कहा कि केवल जजमेंट डेटर की संपत्ति ही कुर्क की जा सकती है।
मैट्रिक्स और टियानिश की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कहा कि मैट्रिक्स एक स्वतंत्र कानूनी इकाई है जिसका अधिग्रहण निजी इक्विटी फंडिंग के जरिए हुआ था, और यह प्रसाद या आईक्वेस्ट का अल्टर ईगो नहीं है। वियाट्रिस के वरिष्ठ अधिवक्ता एस. निरंजन रेड्डी ने बताया कि आईक्वेस्ट की भूमिका केवल एक टर्मिनेशन फीस तक सीमित थी, जिसे बाद में समझौते से हटा दिया गया था। वहीं मोशचिप टेक्नोलॉजीज लिमिटेड की ओर से दलील दी गई कि वह 1999 में स्थापित एक सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध स्वतंत्र कंपनी है और प्रसाद के परिवार की उसमें हिस्सेदारी केवल गैर-कार्यकारी प्रकृति की है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
आईक्वेस्ट द्वारा काउंटर-एफिडेविट में दिए गए बयान की प्रकृति पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व उदाहरणों का संदर्भ लिया। अदालत ने बाबू राम गुप्ता बनाम सुधीर भसीन व अन्य के मामले का उल्लेख करते हुए कहा:
“जब रिकॉर्ड पर कोई अंडरटेकिंग नहीं है, तो अदालत के लिए यह मानना उचित नहीं है कि कोई अंतर्निहित (इंप्लाइड) अंडरटेकिंग दी गई थी। इसी आधार पर इस अदालत ने अदालत की अवमानना की दलील को खारिज कर दिया था। यह भली-भांति स्थापित है कि यद्यपि अदालत का यह कर्तव्य है कि वह उस व्यक्ति को दंडित करे जो न्याय के मार्ग में बाधा डालता है या न्यायपालिका की संस्था को बदनाम करता है, फिर भी इस शक्ति का प्रयोग लापरवाही या हल्के में नहीं, बल्कि बड़ी सावधानी और सतर्कता के साथ किया जाना चाहिए और केवल उन्हीं मामलों में जहां कानून की महिमा और अदालतों की गरिमा को बनाए रखने के लिए अवमाननाकर्ता को दंडित करना आवश्यक हो।”
पीठ ने पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड, इन रे बनाम भारत संघ के फैसले का भी उल्लेख करते हुए कहा:
“अदालत को दी गई अंडरटेकिंग का प्रभाव अदालत के आदेश के समान ही होता है और उसका उल्लंघन उसी तरह अवमानना होगा जैसे किसी निषेधाज्ञा (इंजंक्शन) का उल्लंघन। कोई पक्षकार या उसके वकील द्वारा दिया गया बयान अंडरटेकिंग माना जा सकता है या नहीं, यह दिए गए बयान में इस्तेमाल किए गए शब्दों और मामले के तथ्यों व परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।”
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आईक्वेस्ट का बयान एक बिना शर्त, स्पष्ट कानूनी अंडरटेकिंग नहीं था, बल्कि मात्र एक स्पष्टीकरण था। इसलिए हाईकोर्ट द्वारा अवमानना याचिका खारिज करने का निर्णय सही था और मैट्रिक्स, वियाट्रिस या मोशचिप के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई नहीं बनती।
हालांकि, संपत्तियों के स्थानांतरण और पुनर्गठन के सिलसिले पर चिंता जताते हुए अदालत ने टिप्पणी की:
“प्रथम दृष्टया, इस अदालत को अपीलकर्ता के इस तर्क में दम नजर आता है कि प्रतिवादी एनपी अपनी संपत्तियों को छिपाने का प्रयास कर रहे हैं और डिक्री के निष्पादन को विफल करने के उद्देश्य से उन्हें तितर-बितर (डिसिपेट) करने में लगे हुए हैं। यदि उचित सुरक्षा की शर्त के बिना यथास्थिति (स्टेटस को) का आदेश वापस ले लिया जाता है, तो यह न्याय के मार्ग में बाधा डालने के समान होगा।”
अंतरराष्ट्रीय न्यायिक सम्मान (कॉमिटी ऑफ नेशंस) पर जोर देते हुए पीठ ने कहा:
“राष्ट्रों के आपसी सम्मान (कॉमिटी ऑफ नेशंस) के सिद्धांत हमसे यह अपेक्षा करते हैं कि हम आरएके विदेशी डिक्री के आदेश का सम्मान करें और कोई अंतरिम आदेश पारित करते समय भी ऐसे आदेश को उचित महत्व दिया जाना चाहिए। किसी भी प्रकार की शर्तें लगाए बिना, डिक्री निष्पादित होने में असमर्थ हो जाएगी, जिससे अदालतों के आपसी सम्मान के सिद्धांत का उल्लंघन होगा और पारस्परिक प्रवर्तन की व्यवस्था कमजोर होगी।”
एनसीएलटी के आदेश के संबंध में अदालत ने माना कि विलय के बाद संपत्ति हस्तांतरण पर लगाई गई अंतरिम सुरक्षात्मक शर्तों को एनसीएलएटी द्वारा हटाया नहीं जाना चाहिए था।
सुरक्षा राशि के आकलन के संदर्भ में अदालत ने मेडचल की विवादित जमीन का एक अनंतिम अनुमानित मूल्य ₹250 करोड़ आंका (प्रतिवादियों का दावा ₹400 करोड़ और अपीलकर्ता का दावा ₹150 करोड़ था) और अतिरिक्त नकद सुरक्षा की आवश्यकता को उचित ठहराया।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय और निर्देश
सभी अपीलों का निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित मुख्य निर्देश जारी किए:
- अवमानना खारिज करने का फैसला बरकरार: अदालत ने तेलंगाना हाईकोर्ट के उस निष्कर्ष को बरकरार रखा कि काउंटर-एफिडेविट में दिया गया बयान कोई बिना शर्त अंडरटेकिंग नहीं था, और अवमानना याचिका को खारिज करने के निर्णय की पुष्टि की।
- ₹200 करोड़ की अतिरिक्त सुरक्षा: निम्मगड्डा प्रसाद और संबंधित प्रतिवादी कंपनियों को निर्देश दिया गया कि वे पहले से जमा राशि और टाइटल डीड के अतिरिक्त, दो सप्ताह के भीतर संयुक्त व पृथक रूप से ₹200 करोड़ की अतिरिक्त सुरक्षा सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में जमा कराएं।
- एनसीएलटी की शर्तों की बहाली: एनसीएलएटी के आदेश के खिलाफ अपीलों का निपटारा करते हुए मैट्रिक्स और टियानिश के विलय के बाद संपत्तियों के हस्तांतरण पर एनसीएलटी की सुरक्षात्मक शर्तों को प्रभावी रूप से बहाल किया गया।
- अल्टर ईगो का प्रश्न खुला रखा: क्या प्रसाद के परिवार द्वारा नियंत्रित कंपनियां एक साझा ढांचा बनाती हैं और क्या कॉरपोरेट नकाब हटाया जाना चाहिए, इस मूल प्रश्न को हैदराबाद और रंगा रेड्डी की कमर्शियल कोर्ट्स द्वारा स्वतंत्र रूप से तय किए जाने के लिए खुला छोड़ दिया गया।
- चार महीने में त्वरित निपटारे का आदेश: कमर्शियल कोर्ट, हैदराबाद और कमर्शियल कोर्ट, रंगा रेड्डी को निर्देश दिया गया कि वे मुख्य निष्पादन याचिकाओं और सभी संबंधित अंतरिम आवेदनों की सुनवाई कर अधिकतम चार महीने के भीतर उनका अंतिम निपटारा करें।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: रास अल खैमाह इनवेस्टमेंट अथॉरिटी बनाम मैट्रिक्स फार्माकॉर्प प्राइवेट लिमिटेड व अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 12993-12994/2025 (जुड़ी हुई अपीलें: सिविल अपील संख्या 12561-12566/2025, एसएलपी (सी) संख्या 27277-27279/2025 और एसएलपी (सी) संख्या 35892/2025)
पीठ: जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची, जस्टिस वी. मोहना
निर्णय की तिथि: 1 सितंबर 2026

