हरियाणा के कर्मचारियों की विदेश यात्रा पर लगा पूर्ण प्रतिबंध पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट से रद्द, परीक्षा के लिए जाने की मिली अनुमति

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार द्वारा अपने कर्मचारियों के विदेश जाने पर लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध को रद्द कर दिया है। अदालत ने 10 जून के सरकारी निर्देशों को मनमाना और अधिकारों का अनुचित हनन करार देते हुए कहा कि ईंधन और संसाधनों की बचत के नाम पर नागरिकों के बुनियादी अधिकारों पर ऐसी रोक नहीं लगाई जा सकती। जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ की एकल पीठ ने 27 अगस्त को यह फैसला सुनाते हुए ऑस्ट्रेलिया में पेशेवर परीक्षा देने जा रही एक नर्सिंग अधिकारी को तुरंत विदेश यात्रा की अनुमति देने का निर्देश दिया।

ईंधन बचत के तर्क पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

अदालत ने सरकार के इस फैसले की तुलना ‘अखरोट फोड़ने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल करने’ से की। जस्टिस बराड़ ने कहा कि किसी कर्मचारी को अपने पेशेवर कौशल में सुधार के लिए विदेश जाने से रोककर सरकार संसाधनों की बचत कैसे कर सकती है, यह समझ से परे है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल सरकारी सेवा में होने के आधार पर कर्मचारियों के पूरे वर्ग पर ऐसा व्यापक प्रतिबंध लगाना पूरी तरह से अतार्किक है। सरकार वैश्विक संकट और निजी विदेश यात्रा पर रोक के बीच कोई सीधा या तार्किक संबंध साबित करने में विफल रही है।

विदेश यात्रा और उच्च शिक्षा पाना मौलिक अधिकार

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि विदेश यात्रा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। इसे केवल एक प्रशासनिक विशेषाधिकार मानकर छीना नहीं जा सकता। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को परीक्षा में शामिल होने से रोकना न केवल उसके विदेश जाने के अधिकार पर आघात है, बल्कि उच्च शिक्षा और करियर में आगे बढ़ने के मौलिक अधिकार में भी बाधा डालता है। संविधान के भाग तीन में निहित शिक्षा का अधिकार सीधे तौर पर मानवीय गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा है।

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नर्सिंग अधिकारी की याचिका पर आया फैसला

यह मामला पंडित भगवत दयाल शर्मा पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में फरवरी 2021 से कार्यरत एक नर्सिंग अधिकारी की याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने ऑस्ट्रेलियन हेल्थ प्रैक्टिशनर रेगुलेशन एजेंसी और नेशनल बोर्ड्स द्वारा 29 सितंबर को आयोजित होने वाली ऑब्जेक्टिव स्ट्रक्चर्ड क्लीनिकल एग्जामिनेशन (OSCE) के लिए आवेदन किया था।

संस्थान ने 15 जनवरी को उन्हें अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) जारी किया था, जिसके आधार पर उन्हें ऑस्ट्रेलिया का विजिटर वीजा भी मिल गया। इसके बाद जब उन्होंने 18 अगस्त को छुट्टी का आवेदन दिया, तो अधिकारियों ने मानव संसाधन विभाग के 10 जून के उस परिपत्र का हवाला देकर इसे खारिज कर दिया, जिसमें सितंबर 2026 तक सभी कर्मचारियों, बोर्डों और निगमों के कर्मियों की निजी व आधिकारिक विदेश यात्रा पर रोक लगाई गई थी।

अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें

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याचिकाकर्ता के वकील बृजेंद्र कौशिक ने दलील दी कि कार्यपालिका के प्रशासनिक आदेश संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्थापित ‘विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ का स्थान नहीं ले सकते। उन्होंने नीति को असंवैधानिक और अधिकारों के अनुपात से बाहर बताया।

दूसरी तरफ, हरियाणा सरकार का पक्ष रखते हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता अक्षित पठानिया ने कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया संकट के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई है। ईंधन और संसाधनों की बचत तथा सरकारी खर्च में कटौती के उद्देश्य से यह अस्थायी मितव्ययिता कदम उठाया गया था।

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प्रशासनिक आदेशों की कानूनी सीमाएं

हाईकोर्ट ने सरकार के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि 10 जून के निर्देश पूरी तरह से प्रशासनिक थे और उन्हें किसी विधायी कानून का समर्थन प्राप्त नहीं था। सरकार ने कर्मचारियों के पद, उनकी जिम्मेदारियों और यात्रा के वास्तविक उद्देश्य पर विचार किए बिना इसे यांत्रिक तरीके से सभी पर थोप दिया। अदालत ने साफ किया कि कर्मचारियों की विदेश यात्रा को नियंत्रित करने की शक्ति होने के बावजूद, कोई भी नियम संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 21 के कड़े मानकों के अनुरूप ही होना चाहिए।

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