बॉम्बे हाईकोर्ट ने साल 2016 में पत्नी की हत्या के दोषी 52 वर्षीय व्यक्ति की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने अपने फैसले में पीड़िता के लगातार दिए गए मृत्युपूर्व बयानों (डाइंग डिक्लेरेशन) और घटना के वक्त मौजूद नाबालिग बेटे की गवाही पर भरोसा जताया।
जस्टिस मनीष पितले और जस्टिस श्रीराम वी. शिरसाट की खंडपीठ ने 28 अगस्त के अपने आदेश में दोषी की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अगस्त 2018 के निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी थी। ट्रायल कोर्ट ने उसे भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 (हत्या) के तहत उम्रकैद, 50,000 रुपये का जुर्माना और अपील अवधि समाप्त होने के बाद 40,000 रुपये उसके बेटों को देने का निर्देश दिया था।
कानूनी सिद्धांत और मृत्युपूर्व बयान पर भरोसा
हाईकोर्ट ने मृत्युपूर्व बयान से जुड़े सदियों पुराने कानूनी सिद्धांत ‘नेमो मोरिटुरस प्रिज्यूमिटुर मेंटिरे’ का हवाला दिया, जिसका अर्थ है कि कोई भी व्यक्ति अपने निर्माता (ईश्वर) के सामने मुंह में झूठ लेकर नहीं जाएगा। अदालत ने कहा कि पीड़िता द्वारा अभियोजन पक्ष के गवाह 1 (महिला के भाई), गवाह 2 (मकान मालिक) और गवाह 3 (मौसेरे भाई) को दिए गए मौखिक मृत्युपूर्व बयान पूरी तरह सच्चे, स्वैच्छिक और किसी भी तरह के सिखाए-पढ़ाए जाने से मुक्त नजर आते हैं।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह संदेह हो कि महिला को बयान देने के लिए बहकाया गया था। अदालत ने कहा कि ये मृत्युपूर्व बयान किसी कल्पना या मनगढ़ंत कहानी का नतीजा नहीं हैं। चूंकि महिला अस्पताल पहुंचने तक बात करने की स्थिति में थी, इसलिए गवाहों को दिया गया उसका बयान पूरी तरह स्वाभाविक था।
कक्षा दो में पढ़ने वाले बेटे ने कोर्ट में पिता और हथियार को पहचाना
अदालत ने दंपति के बेटे (अभियोजन पक्ष के गवाह 4) के बयान को बेहद अहम माना, जो घटना के समय दूसरी कक्षा का छात्र था। बच्चे ने गवाही दी कि घटना के वक्त वह अपने माता-पिता और भाई के साथ घर पर मौजूद था और सो रहा था। उसने देखा कि उसके पिता ने चाकू से उसकी मां के पेट और पीठ पर वार किए।
अदालत ने उल्लेख किया कि बच्चे ने अदालत की कार्यवाही के दौरान स्पष्ट रूप से अपने पिता की पहचान हमलावर के रूप में की और हमले में इस्तेमाल चाकू को भी सही तरीके से पहचाना।
घटना और कानूनी बहस की पृष्ठभूमि
अभियोजन पक्ष के अनुसार, घटना 4 मई 2016 की सुबह की है। महिला के भाई को सुबह करीब 6:30 बजे उसके मौसेरे भाई का फोन आया, जिसने बताया कि पति ने उसकी बहन पर चाकू से हमला कर दिया है और वह मौसेरे भाई के घर के सामने सीढ़ियों पर बैठी है। जब भाई मौके पर पहुंचा तो उसने बहन को घायल पाया और तुरंत अस्पताल पहुंचाया, जहां अगले दिन उसने दम तोड़ दिया।
अपील की सुनवाई के दौरान दोषी के वकील वाल्मिकी नार्वेकर ने तर्क दिया कि घटना का कोई स्वतंत्र प्रत्यक्षदर्शी नहीं था और पति द्वारा हथियार के इस्तेमाल को संदेह से परे साबित नहीं किया जा सका। उन्होंने यह भी दलील दी कि एंबुलेंस में अस्पताल ले जाते समय पीड़िता द्वारा अपने भाई को दिया गया बयान अविश्वसनीय था।
इसके विपरीत, सहायक लोक अभियोजक शर्मिला कौशिक ने दलील दी कि अभियोजन पक्ष ने अपना मामला बिना किसी संदेह के साबित किया है। उन्होंने इस दावे को भी गलत बताया कि बरामद चाकू को फोरेंसिक जांच के लिए नहीं भेजा गया था।
हाईकोर्ट ने बचाव पक्ष की सभी आपत्तियों को खारिज करते हुए कहा कि चश्मदीद बेटे की गवाही और महिला के लगातार दिए गए मृत्युपूर्व बयानों के बाद आरोपी के अपराध पर किसी भी तरह के संदेह की गुंजाइश नहीं बचती।

