केरल हाईकोर्ट का अहम फैसला: वेश्यालय जाने वाले ग्राहकों को भी अनैतिक देह व्यापार कानून के तहत बनाया जा सकता है आरोपी

केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि वेश्यालय जाकर देह व्यापार में शामिल होने वाले ग्राहकों के खिलाफ अनैतिक देह व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, 1956 (आईटीपीए) के तहत आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है। अदालत ने कहा कि इस अवैध और प्रतिबंधित गतिविधि में अहम भूमिका निभाने वाले ग्राहकों को आपराधिक जवाबदेही से किसी भी तरह की कानूनी छूट नहीं दी जा सकती।

जस्टिस राजा विजयाराघवन वी और जस्टिस के वी जयकुमार की खंडपीठ ने 11 अगस्त को यह फैसला एक कानूनी संदर्भ (रेफरेंस) का निपटारा करते हुए सुनाया। पीठ इस कानूनी प्रश्न पर विचार कर रही थी कि क्या किसी वेश्यालय में पैसे देकर जाने वाले ग्राहक को इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत आरोपी बनाया जा सकता है या नहीं।

मांग पैदा करने वाले भी व्यावसायिक शोषण के लिए समान रूप से जिम्मेदार

अदालत ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि वेश्यालयों में चलने वाली गतिविधियां व्यावसायिक यौन शोषण की श्रेणी में आती हैं। इस शोषणकारी तंत्र के दो अनिवार्य हिस्से होते हैं—पहला वह संचालक जो इस पूरे नेटवर्क को चलाता है और मुनाफा कमाता है, और दूसरा वह ग्राहक जो पैसे देकर यह सेवा हासिल करता है।

खंडपीठ ने कहा कि यदि दंडात्मक कार्रवाई केवल वेश्यालय संचालकों या प्रबंधकों तक ही सीमित रखी जाए और मांग पैदा करने वाले ग्राहकों को पूरी तरह बाहर कर दिया जाए, तो इस कानून का मूल उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाएगा। अदालत के अनुसार, जो व्यक्ति अपनी मर्जी से वेश्यालय जाता है और भुगतान करके सेवाएं लेता है, वह इस व्यावसायिक सौदेबाजी का सक्रिय भागीदार बन जाता है।

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पीड़िताओं की लाचारी और सामाजिक कल्याण कानून की मंशा

अदालत ने कहा कि अनैतिक देह व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, 1956 का प्राथमिक उद्देश्य देह व्यापार के व्यावसायीकरण पर रोक लगाना और महिलाओं व लड़कियों की तस्करी रोकना है। वेश्यालय महज शारीरिक संबंध बनाने का स्थान नहीं है, बल्कि यह वित्तीय लाभ के लिए व्यक्तियों के सुनियोजित शोषण का एक व्यावसायिक केंद्र है।

पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि देह व्यापार में लगी कई महिलाओं को अक्सर तस्करों, वेश्यालय संचालकों या विकट परिस्थितियों के दबाव में इस दलदल में धकेला जाता है। ऐसी स्थिति में, देह व्यापार के लिए पैसे देने वाला ग्राहक इस पूरे शोषणकारी तंत्र से अलग नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे कल्याणकारी सामाजिक कानूनों की व्याख्या हमेशा उनके मूल उद्देश्य को मजबूत करने वाली होनी चाहिए, न कि उनके असर को कमजोर करने वाली।

हाईकोर्ट की एकल पीठों के विरोधाभासी फैसलों का अंत

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यह कानूनी मामला खंडपीठ के पास तब भेजा गया था जब हाईकोर्ट की अलग-अलग एकल पीठों द्वारा इस मुद्दे पर परस्पर विरोधी निर्णय सामने आए थे। पुराने फैसलों में यह माना गया था कि वेश्यालय में जाना इस कानून के तहत अपराध नहीं है और ग्राहक पर मुकदमा नहीं चल सकता, जबकि बाद के कुछ फैसलों में ग्राहकों को भी कानून के दायरे में लाने की बात कही गई थी।

खंडपीठ ने अब इन सभी विरोधाभासों को समाप्त करते हुए यह तय कर दिया है कि वेश्यालय जाने वाले और पैसे देकर देह व्यापार में लिप्त होने वाले ग्राहकों के खिलाफ अनैतिक देह व्यापार (रोकथाम) अधिनियम के तहत कानूनी कार्यवाही की जा सकती है।

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