अधिवक्ता द्वारा महत्वपूर्ण तथ्यों को जानबूझकर छिपाना न्याय प्रशासन में सीधा हस्तक्षेप: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि किसी अधिवक्ता द्वारा अदालत से महत्वपूर्ण तथ्यों को सक्रिय रूप से छिपाना अदालत को गुमराह करने के समान है और यह सीधे तौर पर न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप करता है। अदालत ने सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी), 1908 की धारा 151 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए 5 मई 2026 के अपने उस पूर्व आदेश को वापस (रिकॉल) ले लिया, जिसमें गाजीपुर स्थित नेहरू विद्यापीठ इंटर कॉलेज की प्रबंध समिति के चुनाव वर्ष 2009 की मतदाता सूची के आधार पर कराने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने और तथ्यों को छिपाने के लिए याचिकाकर्ता और पुनर्विचार आवेदक दोनों पर 50-50 हजार रुपये का हर्जाना लगाया। इसके साथ ही, कैविएट दाखिल करने की प्रक्रिया में सुधार के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट रूल्स, 1952 में संशोधन करने का सुझाव मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रशासनिक स्तर पर रखने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह पूरा विवाद नेहरू विद्यापीठ इंटर कॉलेज, रेवतीपुर, गाजीपुर की प्रबंध समिति के प्रबंधन और चुनाव से जुड़ा हुआ है। 5 मई 2026 को हाईकोर्ट ने याचिका संख्या (रिट-सी संख्या 17384/2026) का निस्तारण करते हुए शिक्षा अधिकारियों को दो महीने के भीतर चुनाव कराने का निर्देश दिया था। उस समय दोनों पक्षों की ओर से यह दर्ज कराया गया था कि वर्ष 2009 में हुए चुनाव निर्विवाद थे, इसलिए उसी समय की मतदाता सूची के आधार पर नए चुनाव कराए जाएं।

इसके बाद, संस्था के प्रबंधक रहे शिव शंकर सिंह (यादव), जिन्हें रिट याचिका में प्रतिवादी संख्या 6 बनाया गया था, ने एक नए वकील के माध्यम से पुनर्विचार (रिव्यू) याचिका दाखिल की। उन्होंने शपथपत्र पर दावा किया कि उन्होंने कभी कोई वकालतनामा निष्पादित नहीं किया, न ही अधिवक्ता आर.सी. द्विवेदी को पैरवी के लिए अधिकृत किया और न ही कोई कैविएट अर्जी दाखिल करने के निर्देश दिए। उन्होंने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता अवधेश राय संस्था पर कब्जा करने की नीयत से फर्जीवाड़ा कर रहे हैं। इससे पहले, आवेदक द्वारा 5 मई के आदेश के खिलाफ दाखिल विशेष अपील को 27 मई 2026 को खंडपीठ ने खारिज करते हुए उचित विधिक कदम उठाने की छूट दी थी।

पक्षकारों के तर्क और तथ्य

इन आरोपों के जवाब में पिछले 30 वर्षों से वकालत कर रहे अधिवक्ता आर.सी. द्विवेदी ने व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर कहा कि शिव शंकर सिंह 2015 से उनके नियमित मुवक्किल रहे हैं। उन्होंने बताया कि आवेदक अपने भांजे भोला यादव (संस्था के सेवानिवृत्त प्रधान लिपिक) के साथ उनके दफ्तर आए थे, जहां उन्होंने संयुक्त शिक्षा निदेशक के 10 अप्रैल 2026 के आदेश की प्रति और हस्ताक्षरित वकालतनामा उनके क्लर्क राजेश यादव को सौंपा तथा कैविएट दाखिल करने के लिए 2,500 रुपये की फीस दी। हालांकि, अधिवक्ता आर.सी. द्विवेदी ने स्वीकार किया कि उनके क्लर्क ने वकालतनामे पर हस्ताक्षर के सत्यापन में प्रक्रियात्मक चूक की थी, जिसके लिए उन्होंने बिना शर्त माफी मांगी, लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि उन्होंने पूरी तरह सद्भावपूर्वक काम किया था।

भोला यादव ने भी हलफनामा दाखिल कर पुष्टि की कि वह अपने मामा शिव शंकर सिंह के साथ अप्रैल 2026 में इलाहाबाद आए थे और फीस व वकालतनामा जमा कराया था।

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दूसरी ओर, अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर शिव शंकर सिंह ने माना कि उन्होंने जनवरी 2026 तक आर.सी. द्विवेदी को अन्य मुकदमों में वकील नियुक्त किया था, लेकिन दावा किया कि 2024 में अपने भांजे भोला यादव द्वारा याचिकाकर्ता अवधेश राय के साथ मिलीभगत की जानकारी मिलने के बाद उन्होंने भांजे से सारे संबंध समाप्त कर लिए थे और इस रिट याचिका में कोई कैविएट दाखिल करने की अनुमति नहीं दी थी।

चुनाव के मुद्दे पर याचिकाकर्ता के अधिवक्ता एस.सी. द्विवेदी ने तर्क दिया कि 25 अक्टूबर 2009 के चुनाव निर्विवाद थे क्योंकि उसके बाद जुलाई 2012 में चुनाव हुए थे और प्रबंधक के हस्ताक्षर प्रमाणित किए गए थे।

फोरेंसिक जांच और अदालत का विश्लेषण

विवादित वकालतनामे पर हस्ताक्षरों की सच्चाई जानने के लिए हाईकोर्ट ने विधि विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल), प्रयागराज के उप निदेशक को शिव शंकर सिंह के नमूना हस्ताक्षरों, बैंक खातों के हस्ताक्षरों और पिछली याचिकाओं में दर्ज हस्ताक्षरों की जांच करने का निर्देश दिया। एफएसएल रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि पिछली याचिकाओं में मौजूद शिव शंकर सिंह के स्वीकृत हस्ताक्षर भी उनके नए नमूना हस्ताक्षरों और बैंक रिकॉर्ड से मेल नहीं खाते हैं। किसी भी पक्ष द्वारा रिपोर्ट पर आपत्ति न जताए जाने के कारण विशेषज्ञ रिपोर्ट अंतिम हो गई।

फोरेंसिक निष्कर्षों के आधार पर अदालत ने पुनर्विचार आवेदक के इस दावे को खारिज कर दिया कि वकालतनामे पर फर्जी हस्ताक्षर बनाए गए थे:

“ऐसी स्थिति में पुनर्विचार आवेदन के साथ दाखिल हलफनामे में किए गए इन दावों को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि श्री शिव शंकर सिंह उर्फ यादव ने उस वकालतनामे पर हस्ताक्षर नहीं किए थे, जिसे श्री आर.सी. द्विवेदी, अधिवक्ता द्वारा दाखिल कैविएट आवेदन के साथ पेश किया गया था।”

इसके बाद अदालत ने याचिकाकर्ता के अधिवक्ता एस.सी. द्विवेदी के आचरण की जांच की। न्यायिक रिकॉर्ड से पता चला कि संयुक्त शिक्षा निदेशक द्वारा 16 अप्रैल 2016 को पारित आदेश में यह स्पष्ट कहा गया था कि अधिकृत नियंत्रक द्वारा वर्ष 2009 में कराया गया चुनाव संदेहास्पद था और नए सिरे से चुनाव कराने के निर्देश दिए गए थे। इस आदेश के खिलाफ दाखिल याचिका (रिट-सी संख्या 19276/2016) 18 अगस्त 2023 को निष्प्रभावी होकर खारिज हो चुकी थी। इसके अतिरिक्त, तत्कालीन जिला विद्यालय निरीक्षक डॉ. मालती राय ने 23 जुलाई 2016 की अपनी लिखित रिपोर्ट में स्पष्ट किया था कि वर्ष 2009 की चुनाव कार्यवाही उनके हस्ताक्षरों से जारी नहीं हुई थी और वह पूरी तरह फर्जी थी।

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अदालत ने पाया कि यह पूरा घटनाक्रम याचिकाकर्ता के अधिवक्ता एस.सी. द्विवेदी की जानकारी में था, क्योंकि वह शुरू से ही याचिकाकर्ता की पैरवी कर रहे थे। अदालत ने माना कि एस.सी. द्विवेदी और उनके मुवक्किल अवधेश राय ने इन महत्वपूर्ण तथ्यों को जानबूझकर छिपाया ताकि यह झूठा प्रभाव दिया जा सके कि 2009 का चुनाव निर्विवाद था:

“तथ्यों को जानबूझकर छिपाने और अनजाने में हुई चूक या तथ्यात्मक अथवा कानूनी स्थिति की गलत व्याख्या के बीच अंतर होता है। जब कोई याचिकाकर्ता इस न्यायालय का रुख करता है, तो उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह उन सभी प्रासंगिक तथ्यों और सामग्रियों का खुलासा करे जो वाद हेतुक का आधार बनते हैं।”

अदालत ने विधिक सिद्धांत “सप्रेशन ऑफ ट्रुथ इज इक्विवेलेंट टू द एक्सप्रेशन ऑफ ए फॉल्सहुड” (सत्य को छिपाना असत्य बोलने के समान है) का उल्लेख करते हुए कहा:

“तथ्यों को जानबूझकर छिपाने का अर्थ है कि अदालत को गुमराह करने के उद्देश्य से जानबूझकर सच पर पर्दा डाला गया है; जबकि अज्ञानतावश बयान देने का अर्थ है कि वास्तविक सच्चाई का पता न होने के कारण भूलवश गलत जानकारी साझा की गई है।”

अदालत ने स्पष्ट निष्कर्ष दिया:

“श्री आर.सी. द्विवेदी, अधिवक्ता वर्तमान रिट याचिका में प्रतिवादी के वकील थे और चूंकि याचिकाकर्ता चुनाव कराने का इच्छुक था, इसलिए वह इस तथ्य की गहराई में नहीं गए होंगे, क्योंकि वर्ष 2009 के चुनावों को संदेहास्पद दर्शाने वाले दस्तावेज कभी रिकॉर्ड पर रखे ही नहीं गए थे; ऐसे में इस अदालत को यह निष्कर्ष निकालने में कोई हिचक नहीं है कि श्री एस.सी. द्विवेदी, अधिवक्ता और उनके मुवक्किल की ओर से तथ्यों को जानबूझकर छिपाया गया, जिससे न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप हुआ।”

न्यायिक मर्यादा और पेशेवर आचरण पर पूर्व निर्णयों का हवाला

हाईकोर्ट ने अधिवक्ताओं के “अदालत के अधिकारी” होने के दायित्व पर जोर देते हुए कई महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख किया:

  • भगवान सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (2025) 6 एससीसी 416: सुप्रीम कोर्ट ने फर्जी वकालतनामे के मामले की सीबीआई जांच का आदेश देते हुए टिप्पणी की थी: “कोई भी अदालत खुद को धोखाधड़ी का जरिया नहीं बनने दे सकती और न ही अदालत इस बात से अपनी आंखें मूंद सकती है कि उसका इस्तेमाल धोखाधड़ी के लिए किया जा रहा है।”
  • सौम्या चौरसिया बनाम प्रवर्तन निदेशालय (2024) 6 एससीसी 410: सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अधिवक्ताओं का यह कर्तव्य है कि वे अपनी विधिक सूझबूझ का इस्तेमाल करते हुए केस रिकॉर्ड से तथ्यों का सत्यापन करें और इस जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता।
  • कुंज बिहारी (मृत) विधिक प्रतिनिधि दिलीप त्रिपाठी बनाम झिंगुरी उर्फ दौसिया व अन्य (आईएलआर 2025 एमपी 1238): मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने माना था कि कोई भी वकील फर्जी वकालतनामे के आधार पर किसी पक्षकार का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता।
  • नारायण पांडे बनाम पन्नालाल पांडे (2013) 11 एससीसी 435: सुप्रीम कोर्ट ने बिना अधिकार वकालतनामा और फर्जी समझौता दाखिल करने पर वकील को तीन साल के लिए निलंबित करते हुए कहा था कि धोखाधड़ी का आचरण न्याय प्रणाली की गरिमा को नुकसान पहुंचाता है।
  • जे.एस. जाधव बनाम मुस्तफा हाजी मोहम्मद यूसुफ व अन्य (1993) 2 एससीसी 562: सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि वकालत कोई व्यापार नहीं बल्कि एक पावन कर्तव्य है और जॉर्ज शार्सवुड के कथन को उद्धृत किया कि एक वकील का चरित्र न केवल बेदाग होना चाहिए, बल्कि किसी भी प्रकार के संदेह से परे होना चाहिए।
  • बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र बनाम एम.वी. दाभोलकर (1976) 2 एससीसी 291: जस्टिस कृष्णा अय्यर के उस कथन को उद्धृत किया गया जिसमें उन्होंने कहा था कि बार कोई निजी संघ नहीं है, बल्कि सार्वजनिक न्याय के प्रति समर्पित एक सार्वजनिक संस्था है।
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अदालत का निर्णय और निर्देश

अदालत ने आपराधिक अवमानना शुरू करने या बार काउंसिल को मामला भेजने से न्यायिक संयम बरतते हुए निम्नलिखित दिशा-निर्देश जारी किए:

  1. पूर्व आदेश वापस लिया गया: सीपीसी की धारा 151 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए 5 मई 2026 के आदेश को वापस (रिकॉल) ले लिया गया, क्योंकि 2009 के चुनावों के संबंध में महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए गए थे। रिट याचिका को नए सिरे से सुनवाई के लिए संबंधित रोस्टर पीठ के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया गया।
  2. हर्जाना लगाया गया: अदालत को गुमराह करने और प्रक्रिया का दुरुपयोग करने के लिए याचिकाकर्ता अवधेश राय और पुनर्विचार आवेदक शिव शंकर सिंह दोनों पर 50-50 हजार रुपये का हर्जाना लगाया गया। यह राशि एक माह के भीतर हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी में जमा करनी होगी, अन्यथा रजिस्ट्रार जनरल द्वारा अवमानना की कार्यवाही शुरू की जाएगी।
  3. कैविएट नियमों में संशोधन का प्रस्ताव: हाईकोर्ट ने पाया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट रूल्स, 1952 के अध्याय XXII नियम 5 के तहत कैविएट दाखिल करते समय हलफनामा अनिवार्य नहीं है, जिससे मुवक्किल बाद में मुकर जाते हैं और वकील असुरक्षित स्थिति में आ जाते हैं। अदालत ने इस आदेश की एक प्रति मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने का निर्देश दिया ताकि कैविएट अर्जी के साथ आवेदक का शपथपत्र अनिवार्य करने पर विचार किया जा सके।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: शिव शंकर सिंह बनाम प्रबंध समिति नेहरू विद्यापीठ इंटर कॉलेज व अन्य
वाद संख्या: सिविल मिस. रिव्यू एप्लीकेशन संख्या – 106/2026 (रिट-सी संख्या 17384/2026 में)
पीठ: जस्टिस सिद्धार्थ नंदन
निर्णय की तिथि: 24.08.2026

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