झारखंड हाईकोर्ट ने एक याचिकाकर्ता को निचली अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण (सरेंडर) करने और निर्धारित धनराशि जमा करने के लिए दो सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया है। कोर्ट की पीठ, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी कर रहे थे, ने कहा कि जमानत देते समय अत्यधिक कठिन या बोझिल शर्तें लगाना वैधानिक जमानत (स्टैच्यूटरी बेल) के मूल उद्देश्य को ही समाप्त कर देता है और यह एक हाथ से राहत देकर दूसरे हाथ से वापस लेने जैसा है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता शपथ कुमार चंद्रा उर्फ शपथ कुमार चंद (उम्र लगभग 57 वर्ष) ने वर्ष 2013 के अग्रिम जमानत आवेदन (एबीए संख्या 5103/2013) में 26 मार्च 2014 को पारित आदेश में संशोधन की मांग करते हुए आपराधिक विविध याचिका (सीआर.एम.पी. संख्या 2606/2026) के जरिए हाईकोर्ट का रुख किया था।
वर्ष 2014 के आदेश के तहत हाईकोर्ट की समकालीन पीठ ने याचिकाकर्ता को इस शर्त पर अग्रिम जमानत दी थी कि वह तीन व्यक्तियों—संजय कुमार दुबे, राजेश साह और अरुण सिंह—में से प्रत्येक को 35,000-35,000 रुपये का भुगतान करे और जीवन भगत के नाम से 23,000 रुपये का बैंक ड्राफ्ट प्रस्तुत करे। इसके साथ ही सब-डिविजनल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट, गोड्डा के समक्ष 10,000 रुपये का बेल बॉन्ड और इतनी ही राशि की दो जमानतें पेश करने का निर्देश दिया गया था।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील के.के. ओझा ने अदालत में दलील दी कि 2014 के आदेश के बाद याचिकाकर्ता तय समय सीमा के भीतर सरेंडर नहीं कर सका था, क्योंकि वह उस समय आवश्यक राशि का प्रबंध नहीं कर पाया था। उन्होंने अदालत को बताया कि अब याचिकाकर्ता ने आवश्यक धनराशि की व्यवस्था कर ली है और वह एक सप्ताह के भीतर इसे निचली अदालत में जमा कर सकता है। इसके साथ ही उन्होंने सरेंडर करने के लिए दो सप्ताह का समय देने की प्रार्थना की।
दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त लोक अभियोजक के.के. सिंह (एस.सी.-V) ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 में ही अग्रिम जमानत का लाभ दिए जाने के बावजूद याचिकाकर्ता ने लंबे समय तक आत्मसमर्पण नहीं किया और कई वर्षों के लंबे अंतराल के बाद यह संशोधन याचिका दायर की गई है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और मुख्य टिप्पणियां
मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता को दी गई जमानत एक वैधानिक जमानत थी। कोर्ट ने जमानत देते समय बहुत अधिक कठिन मौद्रिक शर्तें थोपने की आलोचना की।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“इस अदालत की समकालीन पीठ ने ऐसी जमानत देते समय एक कठिन शर्त लगा दी, जिससे वैधानिक जमानत देने का मूल उद्देश्य ही विफल हो गया। जमानत देना अदालत के न्यायिक विवेक का अभ्यास है, जो कई कारकों के विचार पर आधारित होता है। जमानत देते समय शर्तें लगाना भी इस न्यायिक विवेक का हिस्सा है। ऐसी शर्तें ठोस न्यायिक सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए और मनमानी या यांत्रिक नहीं होनी चाहिए। केवल शर्तें लगाने के लिए शर्तें नहीं थोपी जानी चाहिए।”
जमानत की शर्तों के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कोर्ट ने आगे कहा:
“जमानत की शर्तें लगाने की आड़ में कोई भी कठोर शर्त नहीं लगाई जानी चाहिए। ऐसी शर्तें जो inherently कठोर हों या जिनका पालन करना आरोपी के लिए असंभव हो, वे एक हाथ से जमानत देने और दूसरे हाथ से उसे वापस लेने के समान होंगी।”
संशोधन याचिका दायर करने में हुई देरी पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482—जो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528 के समकक्ष है—के तहत हाईकोर्ट के समक्ष याचिका दायर करने के लिए किसी समय-सीमा (लिमिटेशन) का प्रावधान नहीं है।
अदालत का निर्णय
याचिकाकर्ता के इस कथन को ध्यान में रखते हुए कि उसने आवश्यक राशि का प्रबंध कर लिया है और वह एक सप्ताह में इसे जमा कर देगा, हाईकोर्ट ने आदेश की तारीख से निचली अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने के लिए दो सप्ताह का समय बढ़ा दिया।
हाईकोर्ट ने 26 मार्च 2014 के आदेश को केवल इसी सीमा तक संशोधित किया, जबकि बाकी शर्तों को यथावत रखा और याचिका का निपटारा कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: शपथ कुमार चंद्रा उर्फ शपथ कुमार चंद बनाम झारखंड राज्य
वाद संख्या: सीआर.एम.पी. संख्या 2606/2026
पीठ: जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी
निर्णय की तिथि: 21.08.2026

