फैमिली कोर्ट जजों को हाईकोर्ट में पदोन्नति देने के नियमों में बदलाव नीतिगत मामला: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को महाराष्ट्र के सात फैमिली कोर्ट जजों की उस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 217 के तहत हाईकोर्ट जज के रूप में पदोन्नति पर विचार किए जाने की मांग की थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि फैमिली कोर्ट के लिए अलग कैडर बनाए जाने के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है और इस संबंध में नियमों में बदलाव करना राज्य सरकार तथा संबंधित हाईकोर्ट का नीतिगत निर्णय है।

नियमों में बदलाव के लिए राज्य सरकार और हाईकोर्ट से संपर्क का सुझाव

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन जजों की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि फैमिली कोर्ट के लिए बने अलग कैडर की वजह से यह अड़चन है। पीठ ने सवाल उठाया कि बिना किसी नए कानूनी या तथ्यात्मक आधार के इस विषय पर पुराने बाध्यकारी फैसलों पर दोबारा विचार कैसे किया जा सकता है।

पीठ ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ताओं के पास एकमात्र व्यावहारिक रास्ता यह है कि वे संबंधित हाईकोर्ट और राज्य सरकार से संपर्क करें। अदालत ने कहा कि अन्य राज्यों में लागू व्यवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए फैमिली कोर्ट के पीठासीन अधिकारियों की नियुक्ति से जुड़े सेवा नियमों में सुधार की मांग की जा सकती है। पीठ ने दोहराया कि यह अनिवार्य रूप से एक नीतिगत मामला है, जिस पर राज्य सरकार और हाईकोर्ट आपस में विचार-विमर्श करके उचित कदम उठा सकते हैं।

अनुच्छेद 217 की व्याख्या को लेकर याचिकाकर्ताओं की दलील

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याचिकाकर्ता जजों की ओर से वरिष्ठ वकील आर. बसंत ने पक्ष रखते हुए कहा कि यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 217 की व्याख्या से जुड़ी है। संविधान का अनुच्छेद 217 हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति, योग्यता, कार्यकाल और सेवा शर्तों से संबंधित है।

वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट के जज न्यायिक कार्यों का निर्वहन करते हैं और न्यायिक पद धारक हैं, इसलिए वे पदोन्नति पर विचार के पात्र हैं। उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता सीधे हाईकोर्ट नहीं जा सकते थे क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसले उन्हें वहां से राहत पाने से रोकते हैं।

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कैडर और न्यायिक पद की स्थिति पर पुराना कानूनी रुख

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों के मुताबिक, फैमिली कोर्ट के पीठासीन अधिकारी सामान्य अर्थों में जज तो कहे जा सकते हैं, लेकिन वे राज्य की नियमित न्यायिक सेवा के सदस्य नहीं माने जाते। न ही वे अनुच्छेद 217 के दायरे में आने वाले न्यायिक पद धारक हैं। इसी कानूनी स्थिति के चलते उन्हें हाईकोर्ट में जज के रूप में पदोन्नत किए जाने पर विचार का अधिकार प्राप्त नहीं है।

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