पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने चेक बाउंस मामले में दर्ज शिकायत और समन आदेश को रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस मनीषा बत्रा की पीठ ने स्पष्ट किया कि जब चेक जारीकर्ता चेक पर अपने हस्ताक्षर से इनकार नहीं करता, तो ऐसे में चेक के केवल ‘सुरक्षा’ (सिक्योरिटी) के तौर पर दिए जाने या धोखाधड़ी होने जैसे तथ्यात्मक दावों की जांच मुकदमे की सुनवाई (ट्रायल) के दौरान साक्ष्यों के आधार पर ही की जा सकती है। हाईकोर्ट ने माना कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 482 के तहत अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए इन विवादित तथ्यों का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला अमृतसर के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास की अदालत में शिकायतकर्ता दविंदर सिंह द्वारा दायर नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (एनआई एक्ट) की धारा 138 के तहत दर्ज आपराधिक शिकायत से जुड़ा है। शिकायतकर्ता के अनुसार, याचिकाकर्ता मनिंदर सिंह ने वैध बिल के बदले 20 लाख रुपये के सोने के जेवर खरीदे थे और अपनी कानूनी देनदारी चुकाने के लिए 20 लाख रुपये का पोस्ट-डेटेड चेक जारी किया था।
बैंक में प्रस्तुत करने पर चेक “पेमेंट स्टॉप्ड बाय ड्रॉअर” (खाताधारक द्वारा भुगतान रोका गया) की टिप्पणी के साथ बाउंस हो गया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने कानूनी नोटिस भेजा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिलने पर अदालत में शिकायत दर्ज कराई। शिकायतकर्ता ने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता और उसकी पत्नी ने शिकायतकर्ता की पत्नी को 300 वर्ग गज की संपत्ति बेची थी, जिसका पूरा भुगतान चेक के माध्यम से किया गया था। प्रारंभिक साक्ष्य दर्ज करने के बाद, जहां शिकायतकर्ता ने स्वयं सीडब्ल्यू-1 के रूप में गवाही दी, मजिस्ट्रेट अदालत ने 14 सितंबर 2021 को याचिकाकर्ता को बतौर आरोपी समन जारी कर दिया। याचिकाकर्ता ने इस समन आदेश और पूरी शिकायत को रद्द करवाने के लिए हाईकोर्ट में धारा 482 सीआरपीसी के तहत याचिका दायर की थी।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि उन्हें इस मामले में झूठा फंसाया गया है। याचिकाकर्ता सोने के आभूषणों के निर्माण और बिक्री के कारोबार में है। उन्होंने पैसे उधार लेने के लिए अपनी संपत्ति शिकायतकर्ता और उसकी पत्नी के पास गिरवी रखी थी, जिसे रकम लौटाने पर मुक्त करने का आश्वासन दिया गया था। आरोप लगाया गया कि इस दौरान याचिकाकर्ता से कुछ अन्य दस्तावेजों पर दस्तखत कराए गए, 5,75,000 रुपये के चेक दिए गए और सिक्योरिटी के तौर पर एक सादा हस्ताक्षरित (ब्लैंक साइन्ड) चेक व दो स्टाम्प पेपर ले लिए गए। बाद में शिकायतकर्ता ने इन कागजातों को धोखे से सेल डीड में बदल दिया, जिसके खिलाफ दीवानी मुकदमा (सिविल सूट) लंबित है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि यह चेक किसी कानूनी रूप से लागू देनदारी के बदले नहीं दिया गया था, इसलिए शिकायत और समन आदेश रद्द किए जाने योग्य हैं।
दूसरी ओर, शिकायतकर्ता के वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि समन आदेश पूरी तरह वैध है। चेक कानूनी देनदारी चुकाने के लिए दिया गया था और जानबूझकर भुगतान रुकवाया गया। मजिस्ट्रेट अदालत ने प्रारंभिक साक्ष्यों पर विचार करने के बाद उचित आदेश पारित किया है। जब तक कोई ऐसा पुख्ता साक्ष्य न हो जिससे यह साबित हो जाए कि याचिकाकर्ता का चेक से कोई संबंध नहीं था, तब तक हाईकोर्ट को धारा 482 के तहत हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
हाईकोर्ट का कानूनी विश्लेषण और न्यायिक दृष्टांत
धारा 482 सीआरपीसी के क्षेत्राधिकार पर चर्चा करते हुए जस्टिस मनीषा बत्रा ने कहा कि यद्यपि भूषण कुमार बनाम स्टेट (एनसीटी ऑफ दिल्ली), मेसर्स पेप्सी फूड्स लिमिटेड बनाम स्पेशल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट और विकास चंद्रा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसलों के तहत समन आदेश को चुनौती देने वाली याचिका सुनवाई योग्य है, लेकिन इस शक्ति का प्रयोग बेहद सावधानी और संयम से किया जाना चाहिए, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने श्रीमती नागव्वा बनाम वीरन्ना शिवलिंगप्पा कोंजालगी में निर्धारित किया है।
अदालत ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 204 के तहत समन जारी करने के लिए केवल “कार्रवाई के लिए पर्याप्त आधार” होने की संतुष्टि जरूरी है। मजिस्ट्रेट को ट्रायल जज की तरह मामले के गुण-दोष या दोषसिद्धि की संभावनाओं की गहन पड़ताल करने की आवश्यकता नहीं होती, जैसा कि महेंद्र के.सी. बनाम कर्नाटक राज्य में सुप्रीम कोर्ट ने तय किया है।
याचिकाकर्ता के सिक्योरिटी चेक और धोखाधड़ी के दावों को खारिज करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:
“ये दलीलें तथ्यात्मक हैं जिनका पता केवल दोनों पक्षों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले साक्ष्यों के गहन मूल्यांकन के बाद ही मुकदमे (ट्रायल) के समय लगाया जा सकता है। यह अदालत सीआरपीसी की धारा 482 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए ट्रायल कोर्ट की भूमिका नहीं निभा सकती और इस स्तर पर याचिकाकर्ता के संभावित बचाव का मूल्यांकन करके कानूनी कार्यवाही का गला नहीं घोंट सकती।”
सुप्रीम कोर्ट के मेसर्स एम.एम.टी.सी. लिमिटेड बनाम मेसर्स मेडचल केमिकल्स और एचएमटी वॉचेस लिमिटेड बनाम एम.ए. आबिदा मामलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि देनदारी न होने की बात साबित करने का भार ट्रायल के दौरान आरोपी पर होता है। रथीश बाबू उन्नीकृष्णन बनाम स्टेट (एनसीटी दिल्ली) मामले का उल्लेख करते हुए अदालत ने रेखांकित किया:
“मुकदमे से पहले के चरण में आपराधिक प्रक्रिया को रोकने के परिणाम गंभीर और अपूरणीय हो सकते हैं। प्रारंभिक चरण में कार्यवाही रद्द करने से पक्षों को साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर मिले बिना ही अंतिम निर्णय हो जाएगा और इसका परिणाम यह होगा कि उचित मंच यानी ट्रायल कोर्ट को महत्वपूर्ण साक्ष्यों का मूल्यांकन करने से बाहर कर दिया जाएगा।”
इसके अतिरिक्त, सम्पल्ली सत्यनारायण राव बनाम इंडियन रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपमेंट एजेंसी लिमिटेड और राजेशभाई मुलजीभाई पटेल बनाम गुजरात राज्य का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि जब विवादित तथ्य शामिल हों, तो धारा 482 के तहत कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती।
सिक्योरिटी चेक के संबंध में अदालत ने शालिनी एंटरप्राइज बनाम इंडियाबुल्स फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड का उल्लेख करते हुए कहा कि सिक्योरिटी चेक वाणिज्यिक लेन-देन का एक अभिन्न अंग है और इसे देनदारी के निपटान के लिए कानूनी तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। एनआई एक्ट की धारा 139 के तहत, हस्ताक्षर स्वीकार होने पर यह वैधानिक उपधारणा (प्रिजम्प्शन) लागू होती है कि चेक वैध देनदारी के लिए ही जारी किया गया था।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने पाया कि मजिस्ट्रेट ने रिकॉर्ड पर मौजूद प्रारंभिक साक्ष्यों के आधार पर एक संभावित और उचित दृष्टिकोण अपनाया है। कानून के तहत अनुमान का लाभ शिकायतकर्ता के पक्ष में है और याचिकाकर्ता को ट्रायल के दौरान साक्ष्य पेश कर इस उपधारणा का खंडन करने की पूरी छूट रहेगी। अदालत ने शिकायत और समन आदेश को रद्द करने का कोई आधार न पाते हुए याचिका खारिज कर दी। साथ ही यह स्पष्ट किया कि इस आदेश में की गई टिप्पणियों का मामले के गुण-दोष पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मनिंदर सिंह बनाम दविंदर सिंह
वाद संख्या: सीआरएम-एम-30215-2022 (ओएंडएम)
पीठ: जस्टिस मनीषा बत्रा
निर्णय की तिथि: 25.08.2026

