रद्द की गई एफआईआर प्रिवेंटिव डिटेंशन का आधार नहीं बन सकती, जमानत आदेशों पर विचार करना अनिवार्य: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक हिरासत) के एक आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट किया है कि जिस आपराधिक मामले में एफआईआर (FIR) रद्द की जा चुकी हो, उसे प्रिवेंटिव डिटेंशन का आधार नहीं बनाया जा सकता। जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुड़ी की खंडपीठ ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका को स्वीकार करते हुए हिरासत में लिए गए व्यक्ति (डिटेन्यू) को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि एफआईआर रद्द होने के आदेश को नजरअंदाज करना, पहले से मंजूर जमानत आदेशों पर विचार न करना और डिटेन्यू के प्रतिवेदन (रिप्रजेंटेशन) के निस्तारण में 143 दिनों की अकारण देरी डिटेनिंग अथॉरिटी की संतुष्टि (सब्जेक्टिव सेटिस्फैक्शन) को पूरी तरह दूषित करती है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता कोंडूरी नाग लक्ष्मी ने अपने भाई कोंडूरी मणिकंता उर्फ पांडु उर्फ केटीएम पांडु की रिहाई की मांग को लेकर हाईकोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दायर की थी। मणिकंता को राजमहेंद्रवरम के केंद्रीय कारागार में निरुद्ध रखा गया था।

कृष्णा जिले के जिला कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट ने 11 फरवरी 2026 को आंध्र प्रदेश प्रिवेंशन ऑफ डेंजरस एक्टिविटीज ऑफ बूट-लेगर्स, डकैत, ड्रग-ऑफेंडर्स, गुंडा, अनैतिक व्यापार अपराधी और भू-माफिया अधिनियम, 1986 की धारा 3 के तहत डिटेंशन आदेश पारित किया था। इसके बाद राज्य सरकार ने 19 फरवरी 2026 को इस आदेश को मंजूरी दी और सलाहकार बोर्ड (एडवाइजरी बोर्ड) की रिपोर्ट के बाद 26 मार्च 2026 को इसकी पुष्टि कर दी।

डिटेंशन का आदेश पेनामाकुरु पुलिस स्टेशन में दर्ज तीन आपराधिक मामलों पर आधारित था:

  1. अपराध संख्या 126/2025: भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 109(1) सपठित धारा 3(5)।
  2. अपराध संख्या 180/2025: एनडीपीएस (NDPS) अधिनियम, 1985 की धारा 8(c) सपठित धारा 20(b)(ii)(C)।
  3. अपराध संख्या 725/2025: भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 109(1) सपठित धारा 3(5)।

पक्षों की दलीलें

अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर याचिकाकर्ता ने दलील दी कि अपराध संख्या 126/2025 में दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया था और हाईकोर्ट ने आपराधिक याचिका संख्या 2653/2025 में 11 मार्च 2025 को ही इस एफआईआर को रद्द कर दिया था। इसके अलावा, डिटेन्यू को अन्य दो मामलों में डिटेंशन आदेश जारी होने से पहले ही जमानत मिल चुकी थी—अपराध संख्या 180/2025 में 14 जुलाई 2025 को और अपराध संख्या 725/2025 में 9 जनवरी 2026 को। इसके बावजूद डिटेनिंग अथॉरिटी ने इन जमानत आदेशों पर कोई विचार नहीं किया। याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि हिरासत के खिलाफ दिए गए प्रतिवेदन को 143 दिनों की अस्पष्ट देरी के बाद खारिज किया गया, जिससे यह निरंतर हिरासत अवैध हो जाती है।

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याचिका का विरोध करते हुए सरकारी वकील ने कहा कि पहली एफआईआर में समझौते के तथ्य को डिटेनिंग अथॉरिटी ने रिकॉर्ड पर लिया था। सुप्रीम कोर्ट के पेसला नूकाराजू बनाम आंध्र प्रदेश सरकार व अन्य के फैसले का हवाला देते हुए उन्होंने तर्क दिया कि यदि कोई आपराधिक मामला रद्द भी हो गया हो, तब भी प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश पारित करने के लिए उस पर विचार किया जा सकता है। बाकी दो मामलों में जमानत आदेशों पर विचार न किए जाने के संबंध में उन्होंने मुप्पिडी स्वप्ना बनाम तेलंगाना राज्य व अन्य का हवाला दिया और कहा कि सशर्त जमानत आदेशों पर विचार न करने मात्र से डिटेंशन आदेश दूषित नहीं होता।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष

हाईकोर्ट ने मामले में तीन प्रमुख कानूनी बिंदुओं का परीक्षण किया: रद्द एफआईआर पर निर्भरता, जमानत आदेशों पर विचार न करना और प्रतिवेदन पर निर्णय लेने में अत्यधिक देरी।

1. रद्द की गई एफआईआर को संज्ञान में नहीं लिया जा सकता

पीठ ने पाया कि डिटेंशन आदेश में केवल यह उल्लेख किया गया था कि अपराध संख्या 126/2025 में समझौता हो गया था, लेकिन हाईकोर्ट द्वारा एफआईआर को पूरी तरह रद्द किए जाने के न्यायिक आदेश को नजरअंदाज कर दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट के श्री चामुंडी मोपेड्स लिमिटेड बनाम चर्च ऑफ साउथ इंडिया ट्रस्ट एसोसिएशन मामले का संदर्भ देते हुए अदालत ने रेखांकित किया:

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“किसी आदेश को रद्द करने का परिणाम यह होता है कि स्थिति उसी रूप में बहाल हो जाती है, जैसी वह उस आदेश के पारित होने की तारीख से पहले थी जिसे रद्द किया गया है।”

इस सिद्धांत को लागू करते हुए अदालत ने टिप्पणी की:

“श्री चामुंडी मोपेड्स लिमिटेड के फैसले के आलोक में यह कहा जा सकता है कि एफआईआर के रद्द होने पर स्थिति एफआईआर दर्ज होने से पहले की अवस्था में बहाल हो जाती है। दूसरे शब्दों में, कानून की नजर में एफआईआर में दर्ज ऐसा कोई आपराधिक मामला मौजूद ही नहीं था। इसलिए, एफआईआर के उस मामले को संज्ञान में नहीं लिया जाना चाहिए था।”

हाईकोर्ट ने दासा कविता बनाम आंध्र प्रदेश राज्य के फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें माना गया था कि जिन मामलों में कार्यवाही या एफआईआर रद्द कर दी गई हो, उन्हें प्रिवेंटिव डिटेंशन के आधार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। सरकार द्वारा पेश किए गए पेसला नूकाराजू मामले को अलग बताते हुए पीठ ने कहा:

“यदि बरी होने या डिस्चार्ज होने का कोई आदेश है, तो उस आपराधिक मामले को ध्यान में रखते हुए प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश दिया जा सकता है, ठीक वैसे ही जैसे यह अभियोजन के साथ या बिना अभियोजन के और आशंका के आधार पर भी दिया जा सकता है। लेकिन ग्राउंड नंबर 1 का मामला डिस्चार्ज या बरी होने का नहीं है। यह वह मामला है जिसमें एफआईआर रद्द की जा चुकी है। एक बार जब एफआईआर रद्द कर दी गई, तो ऐसे आपराधिक मामले पर न तो विचार किया जा सकता था और न ही इसे प्रिवेंटिव डिटेंशन का आधार बनाया जा सकता था।”

2. जमानत आदेशों पर विचार न करना डिटेंशन को दूषित करता है

अपराध संख्या 180/2025 और 725/2025 में जमानत आदेशों की अनदेखी पर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एम. अहमद कुट्टी बनाम भारत संघ और इस अदालत की खंडपीठ के बुद्दिगा धना लक्ष्मी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य के फैसलों पर भरोसा जताया। अदालत ने कहा:

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“एम. अहमद कुट्टी मामले में शीर्ष अदालत द्वारा तय कानून के अनुसार, जमानत आदेशों पर विचार करना अनिवार्य है और जमानत आदेशों जैसी प्रासंगिक सामग्री को नजरअंदाज कर तय की गई संतुष्टि कानून सम्मत नहीं मानी जाएगी।”

3. प्रतिवेदन पर निर्णय लेने में अकारण देरी

हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि डिटेन्यू के प्रतिवेदन पर विचार करने में 143 दिनों की अत्यधिक देरी हुई, जिसका सरकार के जवाबी हलफनामे में कोई उचित कारण नहीं दिया गया। अदालत ने कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है:

“कानून में यह भली-भांति स्थापित है कि डिटेन्यू को प्रतिवेदन देने का मौलिक अधिकार है, जिस पर ‘यथाशीघ्र’ विचार किया जाना आवश्यक है। किसी पर्याप्त स्पष्टीकरण के अभाव में, ऐसी देरी बिना किसी औचित्य के मानी जाएगी, जो डिटेन्यू के ‘यथाशीघ्र’ विचार किए जाने के मौलिक अधिकार का हनन करती है। ऐसे मामले में निरंतर हिरासत अवैध हो जाएगी।”

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने माना कि प्रासंगिक कानूनी सामग्रियों की अनदेखी और रद्द एफआईआर को आधार बनाने के कारण डिटेनिंग अथॉरिटी की संतुष्टि कानूनी रूप से अमान्य हो गई थी। अदालत ने रिट याचिका स्वीकार करते हुए डिटेंशन आदेश और पुष्टि आदेश को निरस्त कर दिया।

पीठ ने निर्देश दिया कि यदि डिटेन्यू किसी अन्य मामले में वांछित न हो, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए। साथ ही, डिटेनिंग अथॉरिटी को कानून के अनुसार नए सिरे से उचित आदेश पारित करने की छूट भी प्रदान की।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: कोंडूरी नाग लक्ष्मी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य व 3 अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका संख्या 11834 / 2026
पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुड़ी
निर्णय की तिथि: 06.08.2026

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