कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक विवादित और जर्जर इमारत में रहने वाले लोगों की बिजली आपूर्ति बहाल रखने का फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि आधुनिक दौर में बिजली के बिना रहना एक “सार्थक सभ्य जीवन” से वंचित होने के बराबर है, क्योंकि संविधान हर नागरिक को गरिमापूर्ण और स्वस्थ जीवन जीने की गारंटी देता है।
जस्टिस शम्पा सरकार और जस्टिस अर्जुन राय मुखर्जी की खंडपीठ ने 27 अगस्त को यह फैसला सुनाते हुए एकल पीठ के आदेश में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत ने साफ किया कि केवल बिजली बहाल हो जाने से रहने वालों को उस परिसर पर रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता और न ही इससे उनके पक्ष में कोई कानूनी रियायत (इक्विटी) बनती है।
बिजली बहाली से नहीं मिलेगा मालिकाना हक
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत का यह निर्णय केवल उन लोगों को बुनियादी सुविधा उपलब्ध कराने तक सीमित है जो पहले से वहां बिजली का उपयोग कर रहे थे या बाद में उस परिसर में रहने आए। अदालत ने रेखांकित किया कि इस याचिका के जरिए इमारत में रहने वालों के कानूनी दर्जे या मालिकाना हक का फैसला नहीं किया गया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि कोलकाता नगर निगम (केएमसी) अथवा किसी सिविल कोर्ट में लंबित कानूनी कार्यवाहियों पर इस फैसले का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और सभी संपत्ति विवाद अपने तय कानूनी मंचों पर ही सुलझाए जाएंगे।
सुरक्षा कारणों से काटी गई थी बिजली
यह मामला तब शुरू हुआ जब कलकत्ता इलेक्ट्रिक सप्लाई कॉरपोरेशन (सीईएससी) ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए इमारत की बिजली काट दी थी। विद्युत वितरण कंपनी का कहना था कि मीटर बोर्ड के पास पानी का रिसाव हो रहा था, जिससे करंट फैलने या आग लगने जैसी गंभीर दुर्घटना का खतरा था।
इसके खिलाफ इमारत में रहने वाले लोगों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इस पर सुनवाई करते हुए 6 अगस्त को एकल पीठ ने निर्देश दिया था कि यदि याचिकाकर्ता तय फॉर्म में आवेदन करते हैं और दो कार्यदिवसों के भीतर जरूरी शुल्क जमा करते हैं, तो सीईएससी बिजली कनेक्शन बहाल करे। इसके अलावा, सीईएससी को शुल्क मिलने के तीन दिनों के अंदर पुराना सर्विस केबल हटाने का निर्देश दिया गया ताकि स्थानीय नगर निगम को सूचना देकर जर्जर दीवार और मीटर बोर्ड की मरम्मत कराई जा सके। बाहरी दीवार पर अलग मीटर बोर्ड लगाने और सुरक्षा मानकों की जांच पूरी होने के बाद कंपनी ने बिजली आपूर्ति बहाल कर दी थी।
मकान मालिकों की आपत्तियां खारिज
एकल पीठ के इस आदेश के खिलाफ मकान मालिकों ने खंडपीठ में अपील दायर की थी। मकान मालिकों के वकील का तर्क था कि इमारत बेहद जर्जर स्थिति में है और कोलकाता नगर निगम अधिनियम, 1980 की धारा 412ए के तहत नगर निगम की कार्रवाई पहले से जारी है। उन्होंने दलील दी कि इमारत में रहने वालों का परिसर पर कोई वैध अधिकार नहीं है और यदि बिजली चालू रखी गई, तो वे भविष्य में संपत्ति पर अतिरिक्त अधिकारों या इक्विटी का दावा कर सकते हैं।
वहीं, रहने वालों के वकील ने पक्ष रखा कि नगर निगम से जुड़ा विवाद अलग चल रहा है और बुनियादी सुविधा की बहाली को संपत्ति विवाद से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद खंडपीठ ने बिजली की आपूर्ति रोकने से इनकार कर दिया और दोहराया कि बिजली जैसी अनिवार्य सेवा का उपयोग किसी भी स्थिति में संपत्ति पर स्थायी कानूनी अधिकार साबित करने का आधार नहीं बन सकता।

