सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक के साथ लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद पर महाराष्ट्र सरकार की 2004 की याचिका पर जल्द सुनवाई के अनुरोध पर विचार करने पर सहमति जताई है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने मामले को तुरंत सूचीबद्ध करने का कोई निश्चित आश्वासन नहीं दिया।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष महाराष्ट्र सरकार के वकील ने मामले का उल्लेख करते हुए शीघ्र सुनवाई की मांग की। वकील ने पीठ को अवगत कराया कि इस मूल वाद (ओरिजिनल सूट) से संबंधित सभी आवश्यक प्रक्रियाएं और औपचारिकताएं पूरी हो चुकी हैं, लिहाजा अब इस पर अंतिम सुनवाई शुरू होनी चाहिए।
इस अनुरोध पर चीफ जस्टिस ने कहा कि वह मामले के दस्तावेजों का परीक्षण करेंगे। इसके साथ ही उन्होंने स्पष्ट करते हुए कहा, “मैं इसे तुरंत सूचीबद्ध करने का कोई आश्वासन नहीं दे सकता।”
भाषाई आधार पर पुनर्गठन के सिद्धांत का दिया हवाला
महाराष्ट्र के वकील ने दलील दी कि 865 मराठी भाषी गांव और कस्बे वर्तमान में कर्नाटक के प्रशासनिक नियंत्रण में हैं। उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रों का कर्नाटक में शामिल रहना उस मूल सिद्धांत के खिलाफ है, जिसके तहत देश में भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया गया था।
इन विवादित इलाकों में बेलगावी (बेलगाम), कारवार और निपाणी जैसे प्रमुख सीमावर्ती शहर और गांव शामिल हैं, जो वर्तमान में कर्नाटक के प्रशासन के अधीन आते हैं।
1956 के राज्य पुनर्गठन कानून से जुड़ा है विवाद
इस सीमा विवाद की पृष्ठभूमि ‘राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956’ से जुड़ी है, जिसके अंतर्गत देश में भाषाई आधार पर राज्यों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया गया था। इस कानून के तहत कन्नड़ भाषी आबादी की बहुलता को आधार बनाकर बेलगावी को तत्कालीन मैसूर राज्य (वर्तमान कर्नाटक) में शामिल कर दिया गया था, जबकि इसके निकटवर्ती मराठी बहुल क्षेत्र महाराष्ट्र का हिस्सा बने।
महाराष्ट्र सरकार ने कर्नाटक के प्रशासनिक अधिकार और 1956 के कानून के प्रावधानों को चुनौती देते हुए वर्ष 2004 में सुप्रीम कोर्ट में मूल मुकदमा दायर किया था, जो तब से लंबित है।

