सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि निचली अर्ध-न्यायिक संस्थाओं के आदेश विकृत (perverse) हों, अनुमानों पर आधारित हों या रिकॉर्ड पर मौजूद महत्वपूर्ण दस्तावेजी साक्ष्यों को पूरी तरह नजरअंदाज करके दिए गए हों, तो हाईकोर्ट संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत अपने पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करते हुए उन्हें रद्द कर सकता है। जस्टिस उज्जल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की खंडपीठ ने मेसर्स बर्मा शेल कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी के खिलाफ एक मृतक दावेदार के कानूनी उत्तराधिकारी द्वारा दायर अपीलों को खारिज कर दिया। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसने आवासीय प्लॉट आवंटित करने संबंधी मध्यस्थ (आर्बिट्रेटर) के फैसले और अपीलीय न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) के आदेश को रद्द कर दिया था।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह मामला मूल दावेदार एस. एन. शर्मा द्वारा शुरू किए गए एक लंबे विवाद से जुड़ा है। उन्होंने खुद को मेसर्स बर्मा शेल कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी का सदस्य बताते हुए आवासीय प्लॉट आवंटित करने की मांग की थी। प्लॉट आवंटन से वंचित किए जाने का आरोप लगाते हुए उन्होंने संयुक्त रजिस्ट्रार, सहकारी समितियां, दिल्ली के समक्ष विवाद उठाया, जिसे दिल्ली सहकारी समिति अधिनियम, 1972 की धारा 61 के तहत मध्यस्थ को भेज दिया गया।
शुरुआत में मध्यस्थ ने दावेदार के पक्ष में एकतरफा (एक्स-पार्टी) फैसला सुनाया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने प्रकाश नारायण शर्मा बनाम बर्मा शेल कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी लिमिटेड मामले में 21 अगस्त 2002 को उस एकतरफा फैसले को रद्द कर दिया और मामले को रजिस्ट्रार, सहकारी समितियां के समक्ष नए सिरे से निर्णय के लिए वापस भेज दिया।
मामला वापस भेजे जाने के बाद, रजिस्ट्रार ने 7 अक्टूबर 2003 को अपना फैसला सुनाते हुए माना कि मूल दावेदार सोसाइटी का सदस्य था और उसने प्लॉट पाने की सभी जिम्मेदारियों को पूरा किया था। इसके आधार पर सोसाइटी की प्रबंध समिति को निर्देश दिया गया कि वह जमीन की पूरी लागत चुकाने पर मूल दावेदार के कानूनी वारिस प्रकाश नारायण शर्मा को प्लॉट आवंटित करे। इसके बाद दिल्ली कोऑपरेटिव ट्रिब्यूनल ने भी 18 मार्च 2004 को अधिनियम की धारा 76 के तहत अपील खारिज करते हुए रजिस्ट्रार के आदेश को बरकरार रखा।
इन आदेशों से असंतुष्ट होकर सोसाइटी ने संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत दिल्ली हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। 6 अक्टूबर 2010 को हाईकोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार करते हुए दोनों आदेशों को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने पाया कि दावेदार ने वर्ष 1951 में ही सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था और 1952 में उसे दोबारा सदस्य नहीं बनाया गया था। इसके अलावा, चार वरिष्ठ सदस्य पहले से प्लॉट आवंटन के हकदार थे। इस फैसले के खिलाफ कानूनी वारिस ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता जितेंद्र मोहन शर्मा ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने अनुच्छेद 226 और 227 के तहत अपने सीमित रिट क्षेत्राधिकार की सीमाओं का उल्लंघन करते हुए वैधानिक प्राधिकरणों के समवर्ती तथ्यात्मक निष्कर्षों को पलट दिया है। शालिनी श्याम शेट्टी और अन्य बनाम राजेंद्र शंकर पाटिल मामले का हवाला देते हुए उन्होंने तर्क दिया कि मध्यस्थ ने सभी दस्तावेजों का सही मूल्यांकन किया था, जिससे यह साबित होता है कि मूल दावेदार जीवनभर सदस्य बना रहा और उसका नाम सदस्यता सूची में दर्ज था। उन्होंने सिविल कोर्ट के निष्कर्षों का हवाला देते हुए यह भी कहा कि आवंटन के लिए खाली प्लॉट उपलब्ध थे।
दूसरी तरफ, सोसाइटी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आशिम वच्छर ने हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि मध्यस्थ और ट्रिब्यूनल दोनों ने रिकॉर्ड पर मौजूद महत्वपूर्ण दस्तावेजों की पूरी तरह अनदेखी की थी। उन्होंने बताया कि मूल दावेदार ने 1951 में स्वेच्छा से इस्तीफा दे दिया था, उसका शेयर किसी अन्य सदस्य को ट्रांसफर कर दिया गया था और 1952 में सदस्यता के लिए दिए गए उसके नए आवेदन को प्रबंध समिति ने खारिज कर दिया था। इसके बाद उसे कोई शेयर सर्टिफिकेट भी जारी नहीं किया गया। उन्होंने पशुपति वेंकटेश्वरलू बनाम द मोटर एंड जनरल ट्रेडर्स, स्पेशल रेफरेंस नंबर 1 ऑफ 2002, और राज कुमार डे और अन्य बनाम तारापद डे और अन्य फैसलों का सहारा लेते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से न्याय की विफलता और विकृत निष्कर्षों को सुधारने के लिए उत्प्रेषण (Certiorari) क्षेत्राधिकार का सही इस्तेमाल किया है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और उत्प्रेषण क्षेत्राधिकार
जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर द्वारा लिखे गए निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने उत्प्रेषण रिट के दायरे और सिद्धांतों का विस्तार से विश्लेषण किया। पीठ ने जनरल मैनेजर, इलेक्ट्रिकल रेंगाली हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट, उड़ीसा और अन्य बनाम श्री गिरिधारी साहू और अन्य मामले का उल्लेख किया, जिसमें संविधान पीठ के फैसले हरि विष्णु कामथ बनाम सैयद अहमद इशाक और अन्य के सिद्धांतों को दोहराया गया था:
“उत्प्रेषण रिट जारी करने का क्षेत्राधिकार पर्यवेक्षी है, अपीलीय नहीं। उत्प्रेषण की रिट याचिका पर विचार करते समय अदालत अपीलीय अदालत की भूमिका में नहीं आती। यह साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं करेगी। उत्प्रेषण रिट का उद्देश्य क्षेत्राधिकार के अतिक्रमण को सुधारना है… तथ्य का ऐसा निष्कर्ष जो किसी भी साक्ष्य द्वारा समर्थित नहीं है, वह विकृत होगा और वास्तव में कानून की ऐसी त्रुटि का निर्माण करेगा जिससे रिट अदालत को हस्तक्षेप करने का अधिकार मिल जाता है। यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि यदि साक्ष्यों का भारी वजन निष्कर्ष का समर्थन नहीं करता है, तो यह निर्णय को उत्प्रेषण क्षेत्राधिकार के अधीन बना देगा।”
पीठ ने सेंट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन आयुर्वेदिक साइंसेज और अन्य बनाम बिकर्तन दास और अन्य मामले के निष्कर्षों को भी दोहराते हुए उद्धृत किया:
“हालांकि, हम यह स्पष्ट कर सकते हैं कि ‘बिना किसी साक्ष्य’ पर या पूरी तरह से अनुमानों और अटकलों पर आधारित तथ्य के निष्कर्ष या जो विकृत बिंदु हैं, उन्हें उत्प्रेषण के माध्यम से चुनौती दी जा सकती है क्योंकि ऐसे निष्कर्षों को कानून की त्रुटि माना जा सकता है।”
“…उत्प्रेषण क्षेत्राधिकार की त्रुटियों को ठीक करने के लिए जारी किया जाएगा, अर्थात क्षेत्राधिकार का अभाव, अतिक्रमण या प्रयोग करने में विफलता, और तब भी जब निर्विवाद क्षेत्राधिकार के प्रयोग में कोई अवैधता हुई हो। यह निर्णय या निर्धारण में हुई त्रुटि को ठीक करने के लिए भी जारी किया जाएगा, यदि वह कार्यवाही के रिकॉर्ड पर प्रत्यक्ष त्रुटि हो। इसके प्रयोग से केवल स्पष्ट त्रुटि को सुधारा जा सकता है, न कि किसी गलत निर्णय को। दोहराव की कीमत पर भी यह अच्छी तरह याद रखा जाना चाहिए कि उत्प्रेषण अपीलीय नहीं बल्कि केवल पर्यवेक्षी है।”
इन कानूनी सिद्धांतों को वर्तमान मामले के तथ्यों पर लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि मध्यस्थ और ट्रिब्यूनल ने कई महत्वपूर्ण दस्तावेजी साक्ष्यों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया था, जिनमें शामिल हैं:
- मूल दावेदार का इस्तीफा और 5 मई 1951 को प्रबंध समिति की बैठक में उसकी औपचारिक स्वीकृति।
- 18 अगस्त 1951 को दावेदार के शेयर का किसी अन्य सदस्य को ट्रांसफर किया जाना।
- 5 नवंबर 1952 को प्रबंध समिति की बैठक में दावेदार के नए सदस्यता आवेदन की स्पष्ट अस्वीकृति।
- 4 नवंबर 1979 तक प्लॉट के लिए पैसे जमा करने के दावेदार के अनुरोध की अस्वीकृति।
पीठ ने मध्यस्थ के आदेश में मौजूद विकृति को रेखांकित करते हुए मध्यस्थ के 7 अक्टूबर 2003 के आदेश के इस अंश को उद्धृत किया:
“…श्री एस. एन. शर्मा के इस्तीफे और कुछ खातों को निपटाने के लिए उनके बाद के पुनः प्रवेश की दलील स्वीकार्य नहीं है क्योंकि उन्हें न तो किसी कारण का समर्थन प्राप्त है और न ही कानून का। यह माना जाना चाहिए कि वह अपने जीवन के अंत तक सोसाइटी के सदस्य बने रहे और उनका नाम सदस्यों की सूची में दर्शाया जाता रहा…”
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के पैरा 13 का समर्थन किया, जिसमें कहा गया था:
“13. उपरोक्त के आलोक में, हम रिट याचिका स्वीकार करते हैं और नीचे के दोनों प्राधिकरणों के आदेशों को रद्द करते हैं क्योंकि वे न केवल संक्षिप्त हैं बल्कि वे प्रासंगिक तथ्यों और मुद्दों पर चर्चा करने में विफल रहे हैं, और यदि ऐसा किया गया होता तो परिणाम याचिकाकर्ता सोसाइटी के पक्ष में होता। इसलिए, हम दिल्ली कोऑपरेटिव ट्रिब्यूनल द्वारा पारित आक्षेपित आदेश दिनांक 18.3.2004 और अवार्ड दिनांक 7.10.2003 को रद्द करते हैं तथा याचिकाकर्ता सोसाइटी में प्लॉट के आवंटन के लिए प्रतिवादी नंबर 1 और उनके पिता द्वारा दायर दावा याचिका को खारिज करते हैं। पक्षकार अपना-अपना खर्च स्वयं वहन करेंगे।”
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मध्यस्थ पूरी तरह धारणाओं और अनुमानों पर आगे बढ़े, जबकि ट्रिब्यूनल ने छह पैराग्राफ के संक्षिप्त आदेश में इस त्रुटिपूर्ण निष्कर्ष को सही ठहरा दिया। इसके अलावा, हाईकोर्ट का समानता और संतुलन (equities) पर विचार करना भी उचित था, क्योंकि चार वरिष्ठ सदस्यों का दावा मूल दावेदार से पहले का था।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि मूल दावेदार सोसाइटी का सदस्य ही नहीं था और उसे कभी दोबारा सदस्य नहीं बनाया गया था, इसलिए उसे प्लॉट आवंटित करने का कोई सवाल ही नहीं उठता। इस स्थिति में, जमीन या प्लॉट की वास्तविक उपलब्धता की जांच करने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती।
हाईकोर्ट द्वारा उत्प्रेषण क्षेत्राधिकार के प्रयोग में कोई त्रुटि न पाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी वारिस द्वारा दायर सिविल अपीलों को बिना किसी खर्च के खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: श्री प्रकाश नारायण शर्मा (मृतक) कानूनी प्रतिनिधि के माध्यम से बनाम मेसर्स बर्मा शेल कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी (पंजीकृत) प्रबंध समिति सदस्य श्री पी. जिंदल और अन्य के माध्यम से
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 10693-10694 / 2026
पीठ: जस्टिस उज्जल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर
निर्णय की तिथि: 31 अगस्त 2026

