सुप्रीम कोर्ट ने टैक्स कानूनों के दंडात्मक प्रावधानों को लेकर एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि टैक्स जमा करने में महज देरी को टैक्स न चुकाना या भुगतान करने में विफलता नहीं माना जा सकता। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने मैसर्स सऊदी अरेबियन एयरलाइंस पर फॉरेन ट्रैवल टैक्स (एफएफटी) देर से जमा करने के कारण लगाए गए 71 लाख रुपये से अधिक के भारी जुर्माने को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि समयसीमा का उल्लंघन होने पर वैधानिक जुर्माना अपने आप (ऑटोमैटिक) लागू नहीं होता। इसके साथ ही अदालत ने ‘नो रिफॉर्मेशियो इन पेजस’ (No Reformatio in Peius) के स्थापित सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि अपील दायर करने वाले किसी भी पक्षकार की स्थिति अपील के कारण पहले से बदतर नहीं की जा सकती।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता मैसर्स सऊदी अरेबियन एयरलाइंस एक अंतरराष्ट्रीय विमानन कंपनी है, जिसके पास भारत आने और यहां से जाने वाली उड़ानों के संचालन का लाइसेंस है। वित्त अधिनियम, 1979 के अध्याय V और फॉरेन ट्रैवल टैक्स रूल्स, 1979 के तहत एयरलाइन को विदेश जाने वाले यात्रियों से फॉरेन ट्रैवल टैक्स वसूल कर हर महीने के खत्म होने के 30 दिनों के भीतर सरकारी खजाने में जमा कराना अनिवार्य था।
वर्ष 1994 से 1997 के बीच ऐसे छह मामले सामने आए, जिनमें वसूला गया टैक्स सरकारी खजाने में जमा करने में देरी हुई। इनमें से पांच मामलों में देरी केवल 1 से 11 दिन की थी, जिसमें बैंक से डिमांड ड्राफ्ट नियत तिथि से पहले ही बनवा लिए गए थे, लेकिन सुरक्षा प्रतिबंधों के कारण उन्हें समय पर जमा नहीं कराया जा सका। एक अन्य मामले में 63 दिनों की देरी हुई, क्योंकि संबंधित कर्मचारी आपातकालीन अवकाश पर था।
इस मामले में एयरलाइन को 14 कारण बताओ नोटिस जारी किए गए। मूल निर्णायक प्राधिकारी (एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी) ने 14 जून, 1999 के आदेश में वित्त अधिनियम की धारा 38(3) के तहत टैक्स जमा करने में देरी के लिए 12,000 रुपये का जुर्माना लगाया। इसके अलावा कम भुगतान और रिटर्न देर से दाखिल करने पर भी मामूली जुर्माना लगाया गया।
एयरलाइन ने इस आदेश के खिलाफ अपील की। अपीलीय प्राधिकारी ने मामले को नए सिरे से विचार (डी नोवो) के लिए वापस भेज दिया। हालांकि, नए सिरे से सुनवाई करते हुए निर्णायक प्राधिकारी ने 8 अगस्त, 2001 को देर से भुगतान पर लगाए गए जुर्माने को 12,000 रुपये से बढ़ाकर सीधे 71,29,140 रुपये कर दिया। प्राधिकारी का मानना था कि धारा 38(3) के तहत टैक्स राशि के पांचवें हिस्से के बराबर न्यूनतम जुर्माना लगाना अनिवार्य है।
जुर्माने में इस भारी बढ़ोतरी को कमिश्नर ऑफ कस्टम्स (अपील), राजस्व विभाग (केंद्रीय वित्त मंत्रालय) के रिविजनल प्राधिकारी और बाद में 9 अगस्त, 2010 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी सही ठहराया। इसके बाद एयरलाइन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ता एयरलाइन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता पी.वी. दिनेश ने दलील दी:
- वित्त अधिनियम की धारा 38(3) केवल पूर्ण रूप से टैक्स न चुकाने (भुगतान में विफलता) के मामलों में लागू होती है, न कि अनजाने में हुई तकनीकी देरी के मामलों में, जहां कारण बताओ नोटिस जारी होने से पहले ही टैक्स जमा कर दिया गया हो।
- टैक्स जमा करने में देरी का मामला 1979 के नियमों के नियम 4 और 9 के साथ पठित धारा 38(4) के दायरे में आता है, जहां प्राधिकारी के पास जुर्माना तय करने काविवेकाधिकार होता है।
- 1979 के नियमों के नियम 11 के परंतुक (प्रोविज़ो) के अनुसार, कस्टम्स अधिकारी को 5,000 रुपये से अधिक का जुर्माना लगाने का अधिकार नहीं है।
- यू.एस. टेक्नोलॉजीज इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड बनाम कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स मामले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि दंडात्मक प्रावधान पूरी तरह से डिफ़ॉल्ट होने पर लागू होते हैं, टैक्स भेजने में महज देरी पर नहीं।
- केवल अपील के कानूनी अधिकार का उपयोग करने के कारण किसी अपीलकर्ता की स्थिति पहले से खराब नहीं की जा सकती।
दूसरी ओर, राजस्व विभाग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरिजीत प्रसाद ने दलील दी:
- वित्त अधिनियम की धारा 38(3) एक सख्त दायित्व (स्ट्रिक्ट लायबिलिटी) वाला प्रावधान है, जिसमें ‘टैक्स चुकाने में विफल’ रहने पर जानबूझकर की गई गलती (मेन्स रीया) साबित किए बिना भी जुर्माना स्वतः आकर्षित होता है।
- निर्धारित समयसीमा बीत जाने के बाद कानून की नजर में देरी से भुगतान करना टैक्स न चुकाने के ही बराबर है। इसके समर्थन में उन्होंने मथुराम अग्रवाल बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले का उल्लेख किया।
- नियम 12 और धारा 38(3) के तहत दंडात्मक कार्यवाही नियम 7 की वसूली की समयसीमा से पूरी तरह स्वतंत्र है। इसके लिए जे.के. इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम चीफ इंस्पेक्टर ऑफ फैक्ट्रीज एंड बॉयलर्स, आर.एस. जोशी बनाम अजीत मिल्स लिमिटेड और गुजरात त्रावणकोर एजेंसी बनाम कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स के फैसलों पर भरोसा जताया गया।
- नए सिरे से सुनवाई के दौरान जुर्माने में वृद्धि पूरी तरह उचित थी, क्योंकि शुरुआती आदेश में वैधानिक न्यूनतम जुर्माने के प्रावधान को नजरअंदाज कर दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्व विभाग की दलीलों को खारिज करते हुए निचली अथॉरिटीज और हाईकोर्ट के तर्कों में बुनियादी खामियां पाईं।
1. ‘भुगतान में विफलता’ बनाम ‘भुगतान में देरी’
वित्त अधिनियम, 1979 की धारा 38(3) की व्याख्या करते हुए पीठ ने टिप्पणी की: “उपरोक्त दोनों वाक्यांशों का विश्लेषण करने से पहले, हमें यह ध्यान में रखना होगा कि यह प्रावधान उस स्थिति की बात करता है जहां यात्रियों से एफटीटी वसूला गया हो, लेकिन एयरलाइन या संबंधित व्यक्ति उसे केंद्र सरकार के खाते में जमा करने में विफल रहता है। इस संदर्भ में, ‘फॉरेन ट्रैवल टैक्स चुकाने में विफल रहता है’ का अर्थ होगा कि टैक्स को केंद्र सरकार के खाते में जमा करने में विफलता हुई है। ‘भुगतान में विफलता’ का अर्थ ‘भुगतान न करना’ (गैर-भुगतान) होगा। ‘भुगतान में विफलता’ का अर्थ ‘भुगतान करने में देरी’ नहीं हो सकता और न ही दोनों की तुलना की जा सकती है।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कारण बताओ नोटिस जारी होने से पहले किया गया कोई भी भुगतान ‘देरी से भुगतान’ माना जाएगा जो धारा 38(4) और नियमों के दायरे में आता है, जबकि नोटिस मिलने के बाद जमा कराया गया पैसा ‘भुगतान न करने’ की श्रेणी में आएगा।
2. जुर्माना अपने आप नहीं लगता
हिंदुस्तान स्टील लिमिटेड बनाम उड़ीसा राज्य मामले में तीन जजों की पीठ के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा: “किसी वैधानिक दायित्व को पूरा न करने पर जुर्माना लगाया जाना चाहिए या नहीं, यह प्राधिकारी का विवेकाधिकार है जिसे न्यायिक रूप से और सभी प्रासंगिक परिस्थितियों पर विचार करके प्रयोग किया जाना चाहिए। भले ही कानून में न्यूनतम जुर्माना निर्धारित किया गया हो, लेकिन जहां कानून के प्रावधानों का उल्लंघन केवल तकनीकी या मामूली हो, अथवा जहां उल्लंघन इस वास्तविक विश्वास के कारण हुआ हो कि पक्षकार पर ऐसा दायित्व नहीं बनता, वहां जुर्माना लगाने के लिए सक्षम प्राधिकारी जुर्माना लगाने से इनकार करने में पूरी तरह उचित होगा।”
पीठ ने जोर देकर कहा कि जुर्माना लगाने के अधिकार में जुर्माना न लगाने का अधिकार भी शामिल है: “जहां जुर्माना लगाने से पूर्व की न्यायिक प्रक्रिया में कारण बताओ नोटिस, नोटिस के आधारों पर जवाब या प्रतिवेदन प्रस्तुत करने और व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर दिया गया हो, वहां यह मानना कि जुर्माना लगाना अनिवार्य, स्वतः होने वाला या पहले से तय परिणाम है, ऐसी कानूनी प्रक्रिया को निरर्थक बना देगा। आखिरकार, जुर्माना लगाने की शक्ति में जुर्माना न लगाने की शक्ति भी शामिल है।”
3. ‘नो रिफॉर्मेशियो इन पेजस’ का सिद्धांत
खुद अपीलकर्ता द्वारा दायर अपील पर जुर्माने को 12,000 रुपये से बढ़ाकर 71 लाख रुपये से अधिक करने को कोर्ट ने गंभीर त्रुटि माना। ज्योति प्लास्टिक वर्क्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम भारत संघ, जवाल नेको लिमिटेड बनाम कमिश्नर ऑफ कस्टम्स और नागराज बनाम तमिलनाडु राज्य के फैसलों का संदर्भ देते हुए पीठ ने कहा: “जब इस वाक्यांश के आगे ‘नो’ या ‘प्रोहिबिशन’ शब्द जुड़ जाता है, तो यह ‘नो रिफॉर्मेशियो इन पेजस’ या ‘प्रोहिबिशन ऑफ रिफॉर्मेशियो इन पेजस’ का कानूनी सिद्धांत बन जाता है। यह प्रक्रिया का एक ऐसा सिद्धांत है जिसके अनुसार कानून में उपलब्ध उपाय (अपील) का उपयोग करने से उस व्यक्ति की स्थिति और खराब नहीं होनी चाहिए जो उस उपाय का सहारा लेता है। दूसरे शब्दों में, अपील दायर करने के परिणामस्वरूप किसी व्यक्ति को पहले से बदतर स्थिति में नहीं डाला जा सकता। ‘नो रिफॉर्मेशियो इन पेजस’ निष्पक्ष प्रक्रिया का हिस्सा है और इस प्रकार इसे प्राकृतिक न्याय का हिस्सा भी माना जा सकता है। यह न केवल एक प्रक्रियात्मक गारंटी है बल्कि समानता और न्याय का भी सिद्धांत है।”
अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने सऊदी अरेबियन एयरलाइंस की अपील स्वीकार करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के 9 अगस्त, 2010 के फैसले के साथ-साथ रिविजनल, अपीलीय और नए सिरे से जारी किए गए आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें एफटीटी देर से जमा करने पर जुर्माना लगाया गया था।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि एयरलाइन द्वारा इस जुर्माने के रूप में जमा की गई कोई भी राशि प्रतिवादियों द्वारा 9 प्रतिशत प्रति वर्ष ब्याज के साथ 3 महीने के भीतर वापस की जाए। साथ ही, कोर्ट ने एयरलाइन द्वारा जमा कराई गई बैंक गारंटी को भी तत्काल मुक्त (डिस्चार्ज) करने का आदेश दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मैसर्स सऊदी अरेबियन एयरलाइंस बनाम भारत संघ एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 1052/2013
पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां
निर्णय की तिथि: 01 सितंबर, 2026

