सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले में हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें 19 दिनों की देरी और देरी माफी का आवेदन न होने के आधार पर पीड़िता की मां की अपील को खारिज कर दिया गया था। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि किसी पक्षकार को उचित कानूनी प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है, तो संवैधानिक अदालतों का यह दायित्व है कि वे उसे गुणवत्तापूर्ण कानूनी सहायता मुहैया कराएं। शीर्ष अदालत ने अपील को हाईकोर्ट में पुनर्स्थापित करते हुए मामले की मेरिट के आधार पर सुनवाई करने का निर्देश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला आरोपियों को बरी किए जाने के आदेश के खिलाफ पीड़िता की मां द्वारा दायर की गई आपराधिक अपील से जुड़ा है। मूल मामला दहेज की मांग, प्रताड़ना और उसके कारण हुई मौत के आरोपों से संबंधित था।
हाईकोर्ट ने अपील को केवल इस आधार पर खारिज कर दिया था कि इसे दाखिल करने में 19 दिनों का विलंब हुआ था और इसके साथ देरी माफी का कोई आवेदन नहीं लगाया गया था। इसके अलावा, जिस दिन मामला हाईकोर्ट के समक्ष सुनवाई के लिए लगा था, उस दिन अपीलकर्ता की ओर से कोई भी वकील उपस्थित नहीं हुआ था।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
प्रक्रियागत खामी पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि देरी माफी का आवेदन लगाना आवश्यक था, लेकिन इसके साथ ही प्रभावी विधिक सहायता सुनिश्चित करने के संवैधानिक दायित्व को भी रेखांकित किया। पीठ ने टिप्पणी की:
“यह सच है कि अपील के साथ देरी माफी का आवेदन संलग्न होना चाहिए था, लेकिन संवैधानिक अदालतों को पक्षकार की कठिनाइयों के प्रति भी संवेदनशील होना चाहिए। यदि कानूनी सहायता पर्याप्त नहीं है, तो पक्षकारों को गुणवत्तापूर्ण कानूनी सहायता प्रदान करना अदालत का कर्तव्य है, चाहे वह पीड़िता हो या आरोपी।”
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता की ओर से किसी के उपस्थित न होने का संज्ञान लेते हुए पीठ ने कहा कि अपील को सीधे खारिज करने के बजाय विधिक सहायता तंत्र का सहारा लिया जाना चाहिए था:
“हमने यह भी देखा कि जब मामला अदालत के समक्ष लगा था, तब अपीलकर्ता की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ था। ऐसी स्थिति में कोर्ट को न्यायमित्र (एमिकस क्यूरी) या लीगल सर्विसेज अथॉरिटी से किसी वकील को नियुक्त करना चाहिए था।”
शीर्ष अदालत ने माना कि प्रक्रियागत देरी बहुत मामूली थी और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए इस पर गुण-दोष के आधार पर सुनवाई होनी चाहिए:
“परिस्थितियों की समग्रता और हुई मामूली देरी को ध्यान में रखते हुए, हमारी राय है कि हाईकोर्ट को इस मामले की सुनवाई मेरिट के आधार पर करनी चाहिए।”
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के आक्षेपित आदेश को रद्द कर दिया और अपील को हाईकोर्ट की फाइलों में बहाल कर दिया। शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि वह मामले की सुनवाई मेरिट पर करे। इसके साथ ही सभी लंबित आवेदनों का भी निस्तारण कर दिया गया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: उम्मेद देवी बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 4090-4091/2026 (एसएलपी (क्रिमिनल) संख्या 14359-14360/2026 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 25 अगस्त, 2026

