इलाहाबाद हाईकोर्ट ने व्यक्तिगत रूप से अदालत में पक्ष रख रहे एक याचिकाकर्ता की समीक्षा याचिका में सिंगल जज के खिलाफ अपमानजनक और अवमाननापूर्ण भाषा का प्रयोग पाए जाने पर कड़ा रुख अपनाया है। चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की डिविजन बेंच ने माना कि याचिकाकर्ता की टिप्पणियां अदालत की गरिमा को कम करने का प्रयास हैं। हाईकोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि इस मामले को आपराधिक अवमानना याचिका के रूप में दर्ज कर उचित पीठ के समक्ष पेश किया जाए।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता विश्राम सिंह ने विशेष अपील (दोषपूर्ण) संख्या 488 ऑफ 2026 में हाईकोर्ट द्वारा 9 जुलाई 2026 को पारित आदेश की समीक्षा के लिए एक याचिका दाखिल की थी। इससे पूर्व के आदेश में, हाईकोर्ट ने सिंगल जज के फैसले के खिलाफ दायर विश्राम सिंह की विशेष अपील को सुनवाई योग्य न मानते हुए खारिज कर दिया था। इस खारिज आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने खुद ही समीक्षा याचिका दायर की थी।
समीक्षा याचिका में की गई दलीलें
हाईकोर्ट की डिविजन बेंच ने समीक्षा याचिका की जांच के दौरान पाया कि इसमें उस सिंगल जज के खिलाफ कई अवमाननापूर्ण और आपत्तिजनक दलीलें दी गई थीं, जिनके फैसले को चुनौती दी गई थी। याचिका में शामिल प्रमुख आपत्तिजनक अंश इस प्रकार थे:
“1. …न ही किसी विधि का निर्धारण कर हड़प सकती है”
“2. …धोखे से जारी आदेश और अवैध जारी आदेश और बिना कारण व आधार के जारी आदेश और एक निर्णय के आधार पर आम जनता के अधिकारों को प्रभावित करने के आदेश आदि प्रकार से जारी आदेश के विरुद्ध विशेष अपील पोषणीय होने के दृष्टान्त है। न ही किसी विधि का निर्धारण कर हड़प सकती है… न केवल अवैध है बल्कि बिना अधिकारिता के पास…”
“2. …उसके पास बिना अधिकारिता के और धोखे से जारी आदेश और अवैध जारी आदेश और बिना कारण व आधार के जारी आदेश और एक निर्णय के आधार पर आम जनता के अधिकारों को प्रभावित करने के आदेश आदि प्रकार से जारी आदेश के विरुद्ध विशेष अपील पोषणीय होने के दृष्टान्त है…”
“3. न्याय से एक कूटरचित षडयंत्रकारी आदेश की रचना करने द्वारा वंचित करना ही अपीलार्थी/याची को धोखा देना है। ऐसे अवैध व धोखा देने वाले आदेश के खिलाफ विशेष अपील पोषणीय है।”
“5. …आदेश के प्रकथनों में प्रकट न करना आदेश चालाकी से पास किया आवेदक/याची को धोखा देने के समान है ऐसे आदेश के विरुद्ध विशेष अपील पोषणीय है जिसमें आदेश दिनांक 09.07.2025 की समीक्षा किए जाने योग्य है।”
हाईकोर्ट की टिप्पणी और विश्लेषण
समीक्षा याचिका की सामग्री का अवलोकन करने के बाद डिविजन बेंच ने स्पष्ट किया कि याचिका में इस्तेमाल की गई भाषा प्रथम दृष्टया अवमाननापूर्ण है।
याचिकाकर्ता के आचरण पर टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा: “मामले की परिस्थितियों में, जहां व्यक्तिगत रूप से उपस्थित याचिकाकर्ता ने भाषा के प्रयोग से इस अदालत की गरिमा को कम करने का प्रयास किया है, जो आपराधिक अवमानना के दायरे में आता है। इसलिए, रजिस्ट्री को निर्देश दिया जाता है कि वह इस मामले को आपराधिक अवमानना याचिका के रूप में दर्ज करे और इसे उपयुक्त पीठ के समक्ष रखे।”
अदालत का निर्णय
डिविजन बेंच ने रजिस्ट्री को मामले को तुरंत आपराधिक अवमानना याचिका के रूप में पंजीकृत करने और सुनवाई के लिए सक्षम पीठ के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
पेंडिंग समीक्षा याचिका पर रुख स्पष्ट करते हुए पीठ ने निर्देश दिया कि: “जहां तक समीक्षा याचिका का प्रश्न है, इस पर आपराधिक अवमानना याचिका के निपटारे के बाद ही सुनवाई की जाएगी।”
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: विश्राम सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 4 अन्य
वाद संख्या: सिविल विविध पुनर्विचार आवेदन (दोषपूर्ण) संख्या 231 ऑफ 2026
पीठ: चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र
निर्णय की तिथि: 13 अगस्त 202

