शादी का अधिकार जेल से रिहाई या जेल को मैरिज हॉल बनाने की गारंटी नहीं: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि उम्रकैद की सजा काट रहे किसी कैदी को शादी करने का संवैधानिक अधिकार हासिल होने का यह मतलब नहीं है कि उसे शादी के लिए पैरोल दी जाए या फिर जेल परिसर को ही विवाह स्थल में तब्दील कर दिया जाए। अदालत ने कैदी के जेल से भागने के पिछले रिकॉर्ड और लगातार अनुशासनहीनता को ध्यान में रखते हुए उसकी रिहाई और जेल में शादी कराने की मांग को खारिज कर दिया।

यह फैसला जस्टिस सुनीता गंधम ने दुल्हन की मां की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया। याचिका में हत्या के मामले में 11 साल से सजा काट रहे कैदी को उसकी शादी में शामिल होने के लिए 30 दिनों की अस्थायी पैरोल देने का अनुरोध किया गया था।

हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए क्या कहा

अदालत ने कहा कि हालांकि जीवनसाथी चुनना और शादी करना व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सम्मान का हिस्सा है, लेकिन इस अधिकार का इस्तेमाल कानूनन कस्टडी, जेल के नियमों और सुरक्षा सीमाओं के अधीन ही हो सकता है।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कैदी होना किसी व्यक्ति के मूलभूत अधिकारों को पूरी तरह खत्म नहीं करता। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों ‘डी भुवन मोहन पटनायक बनाम आंध्र प्रदेश राज्य’ और ‘सुनील बत्रा (द्वितीय) बनाम दिल्ली प्रशासन’ का हवाला देते हुए माना कि कैदियों के मौलिक अधिकार बरकरार रहते हैं, लेकिन जेल में बंद रहने के दौरान उन पर वाजिब पाबंदियां लागू होती हैं।

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वैकल्पिक मांगें भी अदालत ने कीं खारिज

याचिकाकर्ता की ओर से 12 अगस्त को एक आवेदन प्रस्तुत किया गया था, जिसमें बताया गया था कि शादी 23 अगस्त को सुबह 11:28 बजे गुडूर स्थित कोदंडरामस्वामी देवस्थानम में तय हुई है। मुख्य मांग खारिज होने की स्थिति में याचिकाकर्ता ने दो वैकल्पिक रास्ते पेश किए थे। पहला प्रस्ताव था कि कैदी को पुलिस सुरक्षा में 6 घंटे के लिए सिम्हाचलम स्थित श्री वराह लक्ष्मी नरसिम्हा स्वामी मंदिर ले जाया जाए, और दूसरा विकल्प विशाखापत्तनम सेंट्रल जेल के अंदर ही विवाह समारोह आयोजित करने का था।

हाईकोर्ट ने इन दोनों ही विकल्पों को अमान्य कर दिया। अदालत की टिप्पणी थी कि किसी हाई-सिक्योरिटी सेंट्रल जेल को ओपन-एयर कैंप नहीं माना जा सकता। एक निजी शादी के लिए पंडित, दुल्हन और रिश्तेदारों के जेल में प्रवेश तथा सुरक्षा के जटिल इंतजाम करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।

भगोड़े और अनुशासनहीन रिकॉर्ड के कारण कड़ाई

राज्य सरकार के वकील ने याचिका का कड़ा विरोध करते हुए कैदी का आपराधिक और जेल का रिकॉर्ड अदालत के समक्ष रखा। अभियोजन पक्ष ने बताया कि दोषी की अपील हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों जगह से खारिज हो चुकी है।

सरकारी वकील ने अदालत को जानकारी दी कि यह कैदी 2014 में नेल्लूर स्थित ओल्ड सेंट्रल जेल के बाहरी परिसर से फरार हो गया था और 1,736 दिनों (लगभग पौने पांच साल) तक पुलिस की गिरफ्त से बाहर रहने के बाद ही उसने आत्मसमर्पण किया था। इसके अलावा जेल के भीतर भी उसके खिलाफ नौ अलग-अलग अनुशासनात्मक कार्रवाइयां दर्ज हैं, जिससे उसके दोबारा भागने या अपराध करने की आशंका बनी रहती है।

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पैरोल नियमों के तहत भविष्य का रास्ता

हाईकोर्ट ने कानूनी पहलुओं पर ध्यान दिलाते हुए कहा कि आंध्र प्रदेश सस्पेंशन ऑफ सेंटेंस ऑन पैरोल रूल्स, 2024 के नियम 1(सी) में परिवार के किसी सदस्य या रिश्तेदार की शादी के लिए पैरोल का प्रावधान तो है, लेकिन कैदी की खुद की शादी के लिए पैरोल का कोई स्पष्ट अधिकार नहीं दिया गया है। अदालत ने दोहराया कि पैरोल कोई जन्मसिद्ध अधिकार नहीं बल्कि शर्तों के अधीन मिलने वाली एक सुविधा है।

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इसके अलावा, 26 अगस्त 2025 को जेल अनुशासन तोड़ने पर कैदी को तीन महीने के लिए फोन और मुलाकात की सुविधाओं से वंचित करने की सजा दी गई थी। पैरोल नियमों के मुताबिक, सजा पूरी होने के बाद कैदी को अगले दो साल तक पैरोल के लिए अयोग्य माना जाता है। अदालत ने कहा कि यह अनिवार्य प्रतीक्षा अवधि अभी पूरी नहीं हुई है।

अदालत ने साफ किया कि अगर दो साल का कूलिंग-ऑफ पीरियड पूरा हो जाता है और उस दौरान जेल में कैदी का आचरण संतोषजनक रहता है, तो वह नियमानुसार दोबारा पैरोल के लिए आवेदन करने के लिए स्वतंत्र होगा।

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