झारखंड हाईकोर्ट ने 28 वर्षीय एक तलाकशुदा महिला के स्थायी गुजारा भत्ते की राशि को 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 40 लाख रुपये कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि महिला की अपनी कोई आय नहीं है और औसत जीवन प्रत्याशा के आधार पर उसे आगामी 42 वर्षों तक जीवन यापन करना है, ऐसे में 10 लाख रुपये की राशि अपर्याप्त है।
पति की बढ़ती आय और भविष्य की जरूरतों का आकलन
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने 18 अगस्त के अपने आदेश में कहा कि कानून में स्थायी गुजारा भत्ते का प्रावधान उस जीवनसाथी की आर्थिक कठिनाइयों को दूर करने के लिए किया गया है, जिसके पास जीवन यापन के लिए पर्याप्त स्वतंत्र आय नहीं है।
अदालत ने माना कि 70 वर्ष की औसत जीवन प्रत्याशा के हिसाब से 28 वर्षीय महिला को अभी 42 वर्षों तक गुजारा करना है। अपनी कोई कमाई न होने के कारण उसे केवल गुजारा भत्ते पर मिलने वाले ब्याज पर ही निर्भर रहना पड़ेगा। इसके विपरीत, सरकारी विभाग में कार्यालय सहायक के रूप में कार्यरत उसके पूर्व पति का सितंबर 2024 में वेतन लगभग 54,000 रुपये प्रति माह था, जो कटौतियों के बाद लगभग 40,000 रुपये बनता था। अदालत ने रेखांकित किया कि हर छह महीने में महंगाई भत्ते में वृद्धि, वार्षिक वेतन वृद्धि, पदोन्नति और वेतन आयोगों की सिफारिशों से पति की आय में लगातार बढ़ोतरी होगी। साथ ही उसे सेवानिवृत्ति के बाद भी एक बड़ी राशि मिलेगी।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यद्यपि पूर्व पति ने दूसरी शादी कर ली है और उसकी नई पारिवारिक जिम्मेदारियां हैं, फिर भी अपनी पहली पत्नी के जीवन स्तर को बनाए रखना उसका प्राथमिक कर्तव्य है, जैसा कि विवाह कायम रहने की स्थिति में होता।
फैमिली कोर्ट के फैसले को दी गई थी चुनौती
यह मामला मई 2023 के फैमिली कोर्ट के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें क्रूरता के आधार पर शादी को भंग करते हुए 10 लाख रुपये का स्थायी गुजारा भत्ता तय किया गया था। पति अग्रिम जमानत प्राप्त करते समय इस राशि में से 8 लाख रुपये पहले ही दे चुका था। महिला ने इस निर्णय के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान पत्नी के अधिवक्ता आशुतोष प्रसाद जोशी ने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट ने महिला की कम उम्र, उसकी दयनीय आर्थिक स्थिति, पति के प्रोविडेंट फंड और अन्य बचतों के साथ-साथ विवाह में हुए भारी खर्च पर विचार नहीं किया।
दूसरी तरफ, पति का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता प्रभात कुमार ने तर्क दिया कि 10 लाख रुपये की राशि पर्याप्त थी। उन्होंने कहा कि उनके मुवक्किल ने पुनर्विवाह कर लिया है, दूसरी शादी से उनकी एक बेटी है और उनके वित्तीय साधन सीमित हैं।
विवाह का इतिहास और प्रताड़ना के आरोप
मामले के रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों का विवाह जून 2018 में हजारीबाग में हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। महिला ने बताया कि उसके पिता ने शादी का पूरा खर्च उठाया था, जिसमें 12 लाख रुपये नकद, 10 भरि सोने के आभूषण और 2 लाख रुपये का घरेलू सामान दिया गया था।
महिला का आरोप था कि शादी के एक महीने बाद ही पति और ससुराल वालों ने 5 लाख रुपये अतिरिक्त दहेज की मांग शुरू कर दी और उसे प्रताड़ित किया। जब उसने मायके लौटने की धमकी दी, तो पति उसे अपने कार्यस्थल वाले दूसरे जिले में ले गया। हालांकि, वहां भी उसने फ्लैट खरीदने के लिए मायके से 10 लाख रुपये मांगने का दबाव बनाया।
मायके वालों द्वारा और पैसे देने से इनकार करने पर महिला के साथ मारपीट की गई, जिसके बाद उसने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। फैमिली कोर्ट ने पाया था कि पति वैवाहिक जीवन दोबारा शुरू करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहा था, जिसके बाद शादी का विघटन कर दिया गया था।
हाईकोर्ट ने अब पति को निर्देश दिया है कि वह एक साल के भीतर शेष राशि का भुगतान कर कुल 40 लाख रुपये का एकमुश्त गुजारा भत्ता पूरा करे।

