इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व चीफ प्रॉक्टर के खिलाफ एफआईआर अर्जी खारिज करने का फैसला रद्द, हाईकोर्ट ने दिए नए सिरे से समीक्षा के निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व चीफ प्रॉक्टर राकेश सिंह पर जातिसूचक अपशब्दों के इस्तेमाल और मारपीट के आरोपों से जुड़ी याचिका खारिज करने के निचली अदालत के फैसले को निरस्त कर दिया है। हाईकोर्ट ने ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आईसा) के छात्र नेता विवेक कुमार की अर्जी पर सुनवाई करते हुए मामले को विशेष एससी/एसटी अदालत को नए सिरे से विचार के लिए वापस भेज दिया है। अदालत ने विशेष न्यायाधीश को मामले में तार्किक और स्पष्ट आदेश जारी करने का निर्देश दिया है।

निचली अदालत के फैसले पर हाईकोर्ट की टिप्पणी

जस्टिस जय प्रकाश तिवारी की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि विशेष न्यायाधीश ने उपलब्ध तथ्यों और प्राथमिक साक्ष्यों का विश्लेषण किए बिना ही शिकायत को सरसरी तौर पर निरस्त कर दिया, जो कि एक गंभीर कानूनी त्रुटि है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक न्यायिक आदेश का तर्कसंगत और स्पष्ट होना अनिवार्य है, ताकि उसमें न्यायाधीश के निष्कर्ष तक पहुंचने के कारणों का पता चल सके। बिना पर्याप्त कारणों के दिए गए आदेश कानून की नजर में मनमाने और पोषणीय नहीं होते।

क्या था पूरा मामला और आरोप

यह मामला 17 अक्टूबर 2023 का है, जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय के परिसर के बाहर छात्र अपनी विभिन्न मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। आईसा की विश्वविद्यालय इकाई के अध्यक्ष और अनुसूचित जाति समुदाय से आने वाले छात्र नेता विवेक कुमार के अनुसार, वे लाइब्रेरी को 24 घंटे खोलने, निलंबित छात्रों को बहाल करने और बेहतर स्वच्छता सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग को लेकर शांतिपूर्ण धरना दे रहे थे।

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विवेक कुमार का आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान तत्कालीन चीफ प्रॉक्टर राकेश सिंह ने उन्हें निशाना बनाया, उनके खिलाफ जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया और लकड़ी की लाठी से हमला कर दिया, जिससे उन्हें गंभीर चोटें आईं।

पुलिस और विशेष अदालत की कार्रवाई

घटना के बाद पीड़ित छात्र ने पुलिस स्टेशन और उच्च अधिकारियों को शिकायत दर्ज कराई थी। हालांकि, पुलिस द्वारा प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज न किए जाने पर उन्होंने एफआईआर दर्ज कराने का निर्देश देने की मांग को लेकर विशेष एससी/एसटी अदालत का दरवाजा खटखटाया। विशेष अदालत ने घटना को “संदिग्ध” करार देते हुए बिना किसी विस्तृत जांच या साक्ष्यों के मूल्यांकन के अर्जी को खारिज कर दिया था।

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान राकेश सिंह के वकील ने निचली अदालत के निर्णय का समर्थन करते हुए कहा कि घटना से जुड़ी परिस्थितियां संदेहास्पद प्रतीत होने के कारण अर्जी खारिज करने का निर्णय सही था।

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लापरवाह पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई के निर्देश

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में विशेष अदालत को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 4 के अनुप्रयोग पर भी विचार करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि यदि मामले के तथ्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि संबंधित पुलिसकर्मियों या लोक सेवकों ने अपने कानूनी और वैधानिक कर्तव्यों का पालन नहीं किया है, तो उनके विरुद्ध भी नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

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