बेंगलुरु स्थित प्रतिष्ठित हरे कृष्णा मंदिर और शैक्षणिक परिसर के मालिकाना हक को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट 5 अक्टूबर के बाद वाले हफ्ते में पुनर्विचार याचिकाओं और अंतरिम आवेदनों पर सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सोमवार को इस मामले को नई पीठ के समक्ष लगाने की रूपरेखा तय की।
इस्कॉन बेंगलुरु की ओर से पेश वरिष्ठ वकील श्याम दीवान और अधिवक्ता कार्तिक सेठ ने अदालत के समक्ष मामले का उल्लेख किया। वकीलों ने पीठ को बताया कि पुनर्विचार याचिका को इस वर्ष 22 जनवरी को सुनवाई के लिए लगाने का निर्देश हुआ था, इसलिए अब इसे औपचारिक रूप से पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाना चाहिए। इस आग्रह पर चीफ जस्टिस ने स्पष्ट किया कि पुनर्विचार याचिका और उससे जुड़ी तमाम अंतरिम अर्जियों को 5 अक्टूबर के एक सप्ताह बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा।
दो जजों की खंडपीठ के विभाजित फैसले के बाद उठा कदम
मामले की सुनवाई के लिए नई पीठ गठित करने की जरूरत नवंबर 2025 में आए खंडित फैसले (स्प्लिट वर्डिक्ट) के बाद पड़ी। उस समय जस्टिस जे.के. माहेश्वरी (अब सेवानिवृत्त) और जस्टिस ए.जी. मसीह की दो सदस्यीय खंडपीठ ने इस्कॉन मुंबई द्वारा दाखिल पुनर्विचार याचिका पर अलग-अलग राय जाहिर की थी।
उस फैसले में जस्टिस माहेश्वरी ने माना था कि इस्कॉन मुंबई ने पुनर्विचार के लिए पर्याप्त आधार प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने अपने दो वाक्यों के संक्षिप्त आदेश में कहा था, “खुली अदालत में पुनर्विचार याचिकाओं को सूचीबद्ध करने के आवेदनों को स्वीकार किया जाता है। पक्षों को नोटिस जारी किया जाए।” इसका अर्थ यह था कि मुंबई पक्ष को खुली अदालत में अपनी दलीलें रखने और फैसले में प्रत्यक्ष त्रुटि को उजागर करने का अवसर दिया जाना चाहिए।
इसके विपरीत, जस्टिस मसीह ने पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज करते हुए अपने आदेश में कहा, “पुनर्विचार याचिकाओं, विचाराधीन फैसले और उससे जुड़ी सामग्री का बारीकी से अध्ययन करने के बाद मैं संतुष्ट हूं कि रिकॉर्ड में प्रत्यक्ष रूप से कोई खामी नजर नहीं आती और न ही याचिकाओं में ऐसा कोई दम है जिसके आधार पर विवादित फैसले पर पुनर्विचार की आवश्यकता हो। अत: पुनर्विचार याचिकाएं खारिज की जाती हैं।” दोनों जजों की राय भिन्न होने के चलते खंडपीठ ने इस मामले को आगे के दिशा-निर्देशों के लिए चीफ जस्टिस के समक्ष भेजने का निर्णय लिया था।
मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने दिया था बेंगलुरु इकाई के पक्ष में निर्णय
इस्कॉन मुंबई की पुनर्विचार याचिका सुप्रीम कोर्ट के 16 मई 2025 के उस फैसले के खिलाफ है, जिसमें जस्टिस अभय एस. ओका (अब सेवानिवृत्त) और जस्टिस ए.जी. मसीह की पीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए मंदिर परिसर पर इस्कॉन बेंगलुरु के अधिकार पर मुहर लगाई थी।
शीर्ष अदालत ने ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों का हवाला देते हुए रेखांकित किया था कि इस्कॉन मुंबई ‘शेड्यूल ए’ संपत्ति पर अपने कब्जे का कोई भी सबूत पेश करने में नाकाम रही है और उसके दावे के समर्थन में साक्ष्यों का पूरी तरह अभाव है।
दशकों पुराना है दोनों संस्थाओं के बीच का कानूनी संघर्ष
यह कानूनी लड़ाई समान नाम और समान आध्यात्मिक परंपरा वाली दो संस्थाओं के बीच प्रशासनिक स्वतंत्रता और मंदिर के नियंत्रण को लेकर है। कर्नाटक के राज्य कानूनों के तहत पंजीकृत इस्कॉन बेंगलुरु का पक्ष है कि वह दशकों से एक स्वतंत्र संस्था के रूप में काम कर रही है और मंदिर की देखरेख करती आ रही है। वहीं, राष्ट्रीय स्तर पर ‘सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860’ और ‘बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट 1950’ के तहत पंजीकृत इस्कॉन मुंबई का दावा है कि इस संपत्ति पर उसका कानूनी अधिकार है और बेंगलुरु इकाई महज उसकी एक शाखा है।
इस विवाद की कानूनी प्रक्रिया काफी लंबी रही है। साल 2009 में बेंगलुरु की एक स्थानीय अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने इस्कॉन बेंगलुरु के कानूनी अधिकार को मान्यता दी थी और इस्कॉन मुंबई के खिलाफ स्थायी निषेधाज्ञा (परमानेंट इंजंक्शन) जारी की थी।
हालांकि, 23 मई 2011 को कर्नाटक हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को उलटते हुए इस्कॉन मुंबई के जवाबी दावे को स्वीकार कर लिया और मंदिर का प्रशासनिक नियंत्रण मुंबई संस्था को सौंप दिया।
कर्नाटक हाईकोर्ट के इस फैसले को चुनौती देते हुए इस्कॉन बेंगलुरु ने अपने पदाधिकारी कोदंडराम दास के जरिए 2 जून 2011 को सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी, जिस पर अब आने वाली नई पीठ के सामने सुनवाई आगे बढ़ेगी।

