दिल्ली हाईकोर्ट ने यूपीएससी इंजीनियरिंग सेवा परीक्षा के एक अभ्यर्थी की उम्मीदवारी रद्द करने के रेलवे बोर्ड और सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (कैट) के आदेश को निरस्त कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब केंद्र सरकार किसी व्यक्ति को आधिकारिक दिव्यांगता प्रमाण पत्र जारी कर चुकी हो, तब कोई भी प्रशासनिक संस्था या मेडिकल बोर्ड उसके विपरीत निष्कर्ष नहीं निकाल सकता।
जस्टिस सी. हरी शंकर और जस्टिस विनोद कुमार की बेंच ने माना कि ट्रिब्यूनल ने मनीष कुमार को सिविल इंजीनियरिंग सेवा के लिए अयोग्य ठहराकर भारी भूल की थी। बेंच ने रेखांकित किया कि भारत सरकार द्वारा जारी यूनिक डिसएबिलिटी आईडी (यूडीआईडी) कार्ड में अभ्यर्थी को 45 प्रतिशत लोकोमोटर दिव्यांगता से ग्रस्त माना गया है। अदालत ने ‘ओम राठौड़ बनाम डायरेक्टर जनरल ऑफ हेल्थ सर्विसेज’ मामले की नज़ीर का हवाला देते हुए कहा कि वैध दिव्यांगता प्रमाण पत्र धारक को ऐसे किसी मेडिकल परीक्षण से नहीं गुजारा जा सकता, जिसका मकसद उस आधिकारिक दस्तावेज में दर्ज तथ्यों के उलट राय कायम करना हो।
परीक्षा में सफलता और मेडिकल बोर्ड का ऐतराज
संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) ने 28 सितंबर 2016 को इंजीनियरिंग सेवा परीक्षा (ईएसई) 2017 के लिए अधिसूचना जारी की थी। मनीष कुमार ने इस भर्ती के लिए दिव्यांग (शारीरिक रूप से अक्षम) श्रेणी के तहत आवेदन किया था। उन्होंने अपनी योग्यता साबित करते हुए प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और व्यक्तित्व परीक्षण (साक्षात्कार) तीनों चरण सफलतापूर्वक पास कर लिए।
चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद रेलवे बोर्ड ने उनका मेडिकल परीक्षण कराया। इस दौरान अपीलीय मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि अभ्यर्थी ‘मायोक्लोनस और डिसार्थ्रिया युक्त सामान्यीकृत डिस्टोनिया’ (जनरलाइज्ड डिस्टोनिया विद मायोक्लोनस एंड डिसार्थ्रिया) नाम की न्यूरोलॉजिकल बीमारी से पीड़ित हैं। इस चिकित्सकीय रिपोर्ट के आधार पर रेलवे प्रशासन ने 12 फरवरी 2018 को कुमार को कारण बताओ नोटिस थमा दिया। नोटिस में उनसे पूछा गया कि उन्हें दिव्यांग अभ्यर्थी क्यों माना जाए, क्योंकि इंजीनियरिंग सेवा परीक्षा नियम 2017 के तहत उनका यह न्यूरोलॉजिकल विकार निर्धारित दिव्यांगता की श्रेणी में दर्ज नहीं है।
उम्मीदवारी रद्द करने का फैसला और कानूनी लड़ाई
कारण बताओ नोटिस के जवाब में कुमार ने बताया कि उनके पास तीन वैध दिव्यांगता प्रमाण पत्र मौजूद हैं। इनमें गोविंद बल्लभ पंत अस्पताल और इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड अलाइड साइंसेज (इहबास) द्वारा जारी प्रमाण पत्र भी शामिल हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस न्यूरोलॉजिकल स्थिति का असर उनकी वाणी (बोलने की क्षमता) पर पड़ता है, जो दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत शारीरिक दिव्यांगता के दायरे में आता है।
रेलवे बोर्ड ने उनके इस तर्क को अस्वीकार करते हुए मार्च 2018 में उनकी उम्मीदवारी रद्द कर दी। बोर्ड का कहना था कि इस परीक्षा के माध्यम से भरे जाने वाले किसी भी पद या सेवा के लिए यह न्यूरोलॉजिकल स्थिति उपयुक्त नहीं पाई गई है। मनीष कुमार ने इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी, जहां से वर्ष 2019 में मामला सुनवाई के लिए कैट को स्थानांतरित कर दिया गया। हालांकि, ट्रिब्यूनल ने भी उनकी याचिका खारिज कर दी और माना कि उनकी स्थिति उन्हें सिविल इंजीनियरिंग शाखा में नियुक्ति के योग्य नहीं बनाती। रेलवे बोर्ड ने हाईकोर्ट में भी ट्रिब्यूनल के इसी निष्कर्ष का बचाव किया।
लोकोमोटर दिव्यांगता पर अदालत का रुख और कानूनी आधार
अदालत में कुमार का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता अमन जैन, राहुल जैन और सारा ने दलील दी कि केंद्र सरकार ने स्वयं उनके मेडिकल दस्तावेजों के आधार पर यूडीआईडी कार्ड जारी किया है, जिसमें उन्हें 45 प्रतिशत लोकोमोटर दिव्यांगता से प्रमाणित किया गया है। अधिवक्ताओं ने कहा कि रिकॉर्ड से यह साफ है कि न्यूरोलॉजिकल समस्या के कारण कुमार के अंगों की गतिशीलता और सामान्य शारीरिक कामकाज प्रभावित होता है। लिहाजा, उनका मामला सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की 1 जून 2001 की अधिसूचना के दायरे में पूरी तरह फिट बैठता है।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों से सहमति जताई। पीठ ने रेखांकित किया कि अभ्यर्थी के मेडिकल प्रमाण पत्र यह प्रमाणित करते हैं कि उनकी बीमारी के चलते उनकी गतिशीलता और उससे जुड़ी गतिविधियां सीमित हो जाती हैं। अदालत ने याद दिलाया कि सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की 1 जून 2001 की अधिसूचना में मस्कुलोस्केलेटल या तंत्रिका तंत्र (नर्वस सिस्टम) की गड़बड़ी से उत्पन्न होने वाली शारीरिक अक्षमता को स्पष्ट रूप से ‘लोकोमोटर दिव्यांगता’ माना गया है। ऐसे में उनकी उम्मीदवारी रद्द करने का निर्णय टिकने योग्य नहीं है।

