सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा वर्ष 2019 में 75 वकीलों को सीनियर एडवोकेट का दर्जा दिए जाने के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता नए सिरे से आवेदन कर सकता है और उसके आवेदन पर जितेंद्र उर्फ कल्ला बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) मामले में निर्धारित सिद्धांतों सहित मौजूदा कानूनी प्रावधानों के अनुसार विचार किया जाएगा।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने 6 नवंबर 2026 को अधिवक्ता विष्णु बिहारी तिवारी की विशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज कर दी। याचिका में इलाहाबाद हाईकोर्ट के सितंबर 2024 के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें वर्ष 2019 की सीनियर एडवोकेट नामांकन प्रक्रिया के खिलाफ आपत्तियां खारिज कर दी गई थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:
“हम हाईकोर्ट द्वारा पारित आदेश में हस्तक्षेप करने के इच्छुक नहीं हैं। हम स्पष्ट करते हैं कि याचिकाकर्ता दोबारा आवेदन करने का हकदार होगा और ऐसा आवेदन किए जाने पर उस पर संबंधित विषय को नियंत्रित करने वाले कानून के अनुसार विचार किया जाएगा, जिसमें जितेंद्र कल्ला मामले में निर्धारित सिद्धांत भी शामिल हैं।”
याचिकाकर्ता ने नई नामांकन प्रक्रिया में देरी का मुद्दा उठाया
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्रणव सचदेवा ने दलील दी कि उनके मुवक्किल ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में लगातार 15 वर्षों तक बिना किसी शिकायत के वकालत की है, लेकिन सीनियर एडवोकेट के रूप में उनके नाम पर विचार नहीं किया गया।
उन्होंने यह भी कहा कि चयन समिति ने कई वर्षों से सीनियर एडवोकेट नामांकन की प्रक्रिया नहीं कराई है, जबकि जितेंद्र उर्फ कल्ला फैसले के अनुसार प्रत्येक कैलेंडर वर्ष में कम से कम एक बार यह प्रक्रिया आयोजित करना आवश्यक है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस नरसिम्हा ने पुराने नामांकन को लेकर मुकदमेबाजी जारी रखने की आवश्यकता पर सवाल उठाया और याचिकाकर्ता को नए सिरे से आवेदन करने की सलाह दी।
अंततः सुप्रीम कोर्ट ने पिछली प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता के दोबारा आवेदन करने का अधिकार बरकरार रखा।
पहले सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अंक निर्धारण प्रक्रिया पर उठाए थे सवाल
इससे पहले जब विशेष अनुमति याचिका सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी, तब जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्जल भुयान की पीठ ने नोटिस जारी करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा अपनाई गई मूल्यांकन प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे।
पीठ ने कहा था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की स्थायी समिति ने अधिकतम अंकों को 100 से घटाकर 75 कर दिया था, जो इंदिरा जयसिंह बनाम सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया मामले में निर्धारित प्रक्रिया से अलग था।
इसके बाद जस्टिस ओका की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने जितेंद्र उर्फ कल्ला मामले में इंदिरा जयसिंह फैसले के तहत निर्धारित व्यवस्था की दोबारा समीक्षा की। इस फैसले में अंक आधारित मूल्यांकन प्रणाली और स्थायी समिति के समक्ष इंटरव्यू की प्रक्रिया समाप्त कर दी गई।
जस्टिस ओका के सेवानिवृत्त होने के बाद यह मामला जस्टिस नरसिम्हा और जस्टिस आराधे की पीठ के समक्ष आया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2019 की चयन प्रक्रिया को सही ठहराया था
विवाद वर्ष 2019 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की स्थायी समिति द्वारा सीनियर एडवोकेट नामांकन के लिए अपनाई गई प्रक्रिया से जुड़ा था।
तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली स्थायी समिति ने तय किया था कि 75 में से कम से कम 45 अंक प्राप्त करने वाले अधिवक्ताओं के नाम ही आगे विचार के लिए भेजे जाएंगे।
समिति ने 78 नाम फुल कोर्ट के समक्ष रखे थे, जिनमें से 75 अधिवक्ताओं को सीनियर एडवोकेट का दर्जा दिया गया।
सितंबर 2024 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी थी।
हाईकोर्ट ने माना था कि स्थायी समिति द्वारा केवल चयनित आवेदकों के नाम फुल कोर्ट को भेजना वर्ष 2017 के इंदिरा जयसिंह फैसले के अनुरूप था।
इंटरव्यू नहीं कराए जाने की आपत्ति पर हाईकोर्ट ने स्वीकार किया था कि शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों का इंटरव्यू लिए बिना नामांकन नहीं होना चाहिए था। हालांकि, उसने कहा कि वर्ष 2023 के इंदिरा जयसिंह फैसले में स्वतः संज्ञान लेकर सीनियर एडवोकेट नामित करने की शक्ति बरकरार रखी गई थी और इंटरव्यू की आवश्यकता विवेकाधीन थी।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि इंटरव्यू नहीं होने पर केवल शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवार ही आपत्ति उठा सकते हैं। चूंकि याचिकाकर्ता निर्धारित न्यूनतम अंक प्राप्त नहीं कर सके थे, इसलिए वे इस आधार पर प्रक्रिया को चुनौती नहीं दे सकते थे।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी दर्ज किया था कि वर्ष 2019 के बाद सीनियर एडवोकेट नामांकन की कोई प्रक्रिया आयोजित नहीं हुई थी।
अब सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से इनकार करने के बाद वर्ष 2019 में किए गए सभी 75 नामांकन बरकरार रहेंगे। वहीं, विष्णु बिहारी तिवारी नए सिरे से आवेदन कर सकेंगे, जिस पर वर्तमान कानूनी व्यवस्था के अनुसार विचार करना होगा।
