आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत चेक बाउंस मामले में आरोपी को बरी किए जाने के खिलाफ शिकायतकर्ता की अपील पर आरोपी को नोटिस दिए बिना गुण-दोष के आधार पर फैसला नहीं किया जा सकता। यदि शिकायतकर्ता बार-बार अवसर मिलने के बावजूद नोटिस तामील कराने में विफल रहता है, तो हाईकोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए पैरवी के अभाव में अपील खारिज कर सकता है।
जस्टिस अलापति गिरिधर ने यह सिद्धांत स्पष्ट करते हुए नेशनल कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड की वर्ष 2009 से लंबित आपराधिक अपील खारिज कर दी।
2008 में आरोपी को बरी किए जाने के खिलाफ अपील
नेशनल कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत चेक बाउंस की शिकायत दर्ज कराई थी।
1 सितंबर 2008 को ट्रायल कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 की धारा 256 के तहत आरोपी को बरी कर दिया था। उस दिन शिकायतकर्ता और उसके अधिवक्ता, दोनों अदालत में अनुपस्थित थे।
बैंक ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
अपीलकर्ता बैंक के अधिवक्ता एन. रवि प्रसाद की ओर से पेश के.वी. अखिलेश्वर रेड्डी ने कोर्ट को बताया कि बैंक अपने अधिवक्ता के संपर्क में नहीं है और उन्हें कोई निर्देश नहीं मिला है।
रिकॉर्ड से सामने आया कि 21 अगस्त 2025 को भी अदालत को यही जानकारी दी गई थी।
हाईकोर्ट ने पाया कि कई अवसर दिए जाने के बावजूद अपीलकर्ता ने इतने वर्षों में आरोपी को नोटिस तामील नहीं कराया था। कुछ सुनवाई की तारीखों पर बैंक की ओर से कोई उपस्थित भी नहीं हुआ।
राज्य सरकार की ओर से लोक अभियोजक पेश हुए।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
“ऐसा प्रतीत होता है कि अपीलकर्ता इतने वर्षों से अपील की पैरवी करने में रुचि नहीं दिखा रहा है।”
बेंच ने यह भी दर्ज किया कि मामला लंबे समय से लंबित मामलों की सूची में शामिल था।
क्या आरोपी को सुने बिना अपील का फैसला किया जा सकता है?
जस्टिस गिरिधर ने कहा कि स्थापित कानूनी सिद्धांत के अनुसार किसी आपराधिक अपील को केवल पैरवी न होने या अनुपस्थिति के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा:
“किसी आपराधिक अपील को पैरवी के अभाव या चूक के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता और अपील का निर्णय उसके गुण-दोष के आधार पर किया जाना चाहिए।”
हालांकि, कोर्ट के सामने प्रश्न यह था कि क्या धारा 138 के मामले में आरोपी को बरी किए जाने के खिलाफ अपील पर उसे नोटिस दिए बिना और सुनवाई का अवसर प्रदान किए बिना गुण-दोष के आधार पर फैसला सुनाया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के Bani Singh फैसले की व्याख्या
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों की बेंच के Bani Singh and Others v. State of U.P. (1996) 4 SCC 720 फैसले पर विचार किया।
उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि CrPC की धारा 385 और 386 के तहत किसी अपील को केवल पैरवी के अभाव में खारिज करने की व्यवस्था नहीं है। आपराधिक अपील का निस्तारण गुण-दोष के आधार पर किया जाना चाहिए।
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि Bani Singh का मामला दोषसिद्धि के खिलाफ आरोपी द्वारा दाखिल अपील से संबंधित था।
कोर्ट ने Associated Cement Co. Ltd. v. Keshvanand (1998) SCC (Cri) 475 और National Small Industries Corporation Limited v. State (NCT of Delhi) (2009) 1 SCC 407 के फैसलों का भी उल्लेख किया।
इन फैसलों में स्वीकार किया गया है कि शिकायतकर्ता की अनुपस्थिति में मजिस्ट्रेट को CrPC की धारा 256 के तहत शिकायत खारिज करने की शक्ति प्राप्त है।
बरी आरोपी को नोटिस दिए बिना दोषसिद्ध नहीं किया जा सकता
हाईकोर्ट ने कहा कि शिकायत पर आधारित किसी मामले में दोषसिद्धि के खिलाफ अपील में नोटिस विधिवत तामील होने के बाद Bani Singh का सिद्धांत लागू होता है।
लेकिन आरोपी को बरी किए जाने के खिलाफ शिकायतकर्ता की अपील की स्थिति अलग है।
कोर्ट ने कहा:
“इस प्रश्न का उत्तर नकारात्मक है, क्योंकि अदालत आरोपी को नोटिस तामील कराए बिना अपील स्वीकार करके उसे दोषसिद्ध नहीं ठहरा सकती।”
बेंच ने स्पष्ट किया कि यदि आरोपी को नोटिस तामील हो चुका है, लेकिन वह स्वयं उपस्थित नहीं होता या अधिवक्ता नियुक्त नहीं करता, तो अदालत को Bani Singh के सिद्धांत के अनुसार अपील का निर्णय गुण-दोष के आधार पर करना होगा।
इसके विपरीत, यदि शिकायतकर्ता लगातार नोटिस तामील कराने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाता, तो स्थिति अलग होगी।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी परिस्थिति में उसके पास “अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करके पैरवी के अभाव में अपील खारिज करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।”
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि Bani Singh के फैसले में इस विशेष परिस्थिति पर विचार नहीं किया गया था।
बेंच ने कहा कि ऐसी स्थिति में सत्र न्यायाधीश भी इसी प्रकार कार्रवाई कर सकते हैं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि ऐसी अपीलों को खारिज नहीं किया जाए, तो वे वर्षों तक लंबित बनी रहेंगी।
बेंच के अनुसार, इससे “पहले से लंबित पुराने मामलों की सूची में इन अपीलों को जोड़कर अदालतों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।”
16 वर्ष से अधिक समय से लंबित अपील खारिज
हाईकोर्ट ने पाया कि बैंक ने कई अवसर मिलने के बावजूद आरोपी को नोटिस तामील कराने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाए।
इन परिस्थितियों में कोर्ट ने नेशनल कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड की अपील पैरवी के अभाव में खारिज कर दी।
इसके साथ ही सभी लंबित विविध आवेदनों का भी निस्तारण कर दिया गया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: National Cooperative Bank Ltd. v. S. Mary Joyice and Another
केस नंबर: Criminal Appeal No. 1022 of 2009
पीठ: जस्टिस अलापति गिरिधर
फैसले की तारीख: 3 नवंबर 2026
