इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग में लैब असिस्टेंट (ग्रामीण) के 728 पदों पर वर्ष 2009 में हुई भर्ती में कथित अनियमितताओं की नए सिरे से स्वतंत्र जांच कराने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) खारिज कर दी है।
कोर्ट ने कहा कि भर्ती प्रक्रिया पूरी होने के लगभग 18 वर्ष बाद मामले में आगे की जांच या दोबारा जांच का आदेश देना उचित नहीं होगा। बेंच ने याचिका को गलत आधार पर दाखिल किया गया बताते हुए कहा कि इसके पीछे अनुचित उद्देश्य थे।
जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की डिवीजन बेंच ने 5 नवंबर 2026 को दिए फैसले में पाया कि याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट नियमावली, 1952 के तहत जनहित याचिका दाखिल करने की अनिवार्य शर्तों का पालन नहीं किया था।
हालांकि, याचिकाकर्ता के सेवानिवृत्त कर्मचारी होने के कारण कोर्ट ने उस पर कोई जुर्माना नहीं लगाया।
728 पदों की भर्ती और CBCID की क्लोजर रिपोर्ट का विवाद
याचिका सुदामा राम ने दाखिल की थी, जो लखनऊ के स्वास्थ्य भवन स्थित चिकित्सा निदेशालय में वरिष्ठ सहायक के पद से सेवानिवृत्त हुए थे।
उन्होंने दावा किया कि भर्ती विवाद में उनका कोई व्यक्तिगत हित नहीं है।
याचिकाकर्ता ने 12 जुलाई 2018 की CBCID की क्लोजर रिपोर्ट रद्द करने, भर्ती में कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराने तथा जांच अधिकारी और कथित रूप से शामिल विभागीय अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की थी।
लैब असिस्टेंट (ग्रामीण) के पदों के लिए लिखित परीक्षा 30 अगस्त 2009 को आयोजित हुई थी।
इस भर्ती से संबंधित मामले में 4 जनवरी 2017 को लखनऊ के हुसैनगंज थाने में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 409 और 420 के तहत मुकदमा अपराध संख्या 0005/2017 दर्ज किया गया था।
जांच पूरी होने के बाद 12 जुलाई 2018 को अंतिम रिपोर्ट दाखिल की गई थी।
राज्य सरकार ने पहले के न्यायिक फैसलों का हवाला दिया
राज्य सरकार की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता प्रथम (AGA-I) अनुराग वर्मा ने कोर्ट को बताया कि भर्ती से जुड़ा विवाद पहले ही Manoj Srivastava v. State of U.P. में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के समक्ष आ चुका था।
विशेष अपील संख्या 695/2012 को 4 अक्टूबर 2021 को खारिज करते हुए डिवीजन बेंच ने पाया था कि OMR शीट गायब होने के मामले में जांच आगे बढ़ाने के लिए रिकॉर्ड पर कोई आधार नहीं था।
राज्य सरकार ने यह भी बताया कि विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट, CBCID, लखनऊ ने 30 अप्रैल 2024 को अंतिम रिपोर्ट स्वीकार कर ली थी।
इस आदेश को न तो किसी प्रभावित व्यक्ति ने चुनौती दी थी और न ही वर्तमान जनहित याचिका में इसे चुनौती दी गई।
अनुराग वर्मा ने Pramod Kumar v. State of U.P. का हवाला देते हुए कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 173(8) के तहत आगे की जांच का निर्देश संबंधित अदालत ही दे सकती है।
उन्होंने State of Jharkhand v. Shiv Shankar Sharma के फैसले का उल्लेख करते हुए तर्क दिया कि जांच शुरू कराने के लिए रिट कोर्ट उपयुक्त मंच नहीं है। केवल आरोपों और अधूरी जानकारी पर आधारित जनहित याचिका पर विचार नहीं किया जाना चाहिए।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता पी.एस. बाजपेयी ने कहा कि सुदामा राम क्लोजर रिपोर्ट से व्यक्तिगत रूप से प्रभावित नहीं थे।
उनका उद्देश्य भर्ती प्रक्रिया में विभाग द्वारा कथित रूप से किए गए ऐसे फर्जीवाड़े को सामने लाना था, जो उनके अनुसार अब भी जारी था।
आपराधिक मामलों में PIL का दायरा सीमित
हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामलों में जनहित याचिका का दायरा सीमित होता है।
बेंच ने स्पष्ट किया:
“यदि किसी आपराधिक मामले में जनहित याचिका दाखिल की जाती है, तो उसका दायरा केवल उन मुद्दों तक सीमित होता है जो आपराधिक न्याय प्रशासन में सुधार, उसकी व्यवस्था के संचालन या आपराधिक न्याय प्रशासन के तहत अपने दायित्वों और जिम्मेदारियों का निर्वहन करने वाली एजेंसियों के नियमन से संबंधित हों।”
कोर्ट ने पाया कि विवादित भर्ती प्रक्रिया काफी पहले पूरी हो चुकी थी और चयनित उम्मीदवार अपने पदों पर कार्यभार ग्रहण कर चुके थे।
बेंच ने कहा:
“इसलिए संबंधित चयन के लगभग 18 वर्ष बाद आगे की जांच या दोबारा जांच का निर्देश देना उचित नहीं होगा।”
पहले के फैसले की जानकारी छिपाने पर हाईकोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने अपनी PIL में 4 अक्टूबर 2021 के डिवीजन बेंच के फैसले का उल्लेख नहीं किया था।
राज्य सरकार की जानकारी के अनुसार, उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी नहीं दी गई थी।
बेंच ने कहा कि जब Manoj Srivastava मामले में संबंधित मुद्दे पर पहले ही विचार हो चुका था, तब याचिकाकर्ता का पूरक हलफनामे में यह कहना कि विषय पर कोई प्रामाणिक न्यायिक निर्णय मौजूद नहीं है, गलत था।
कोर्ट ने इस दावे के संबंध में कहा:
“इसे गलत और निराधार माना जाएगा।”
बेंच ने पाया कि याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट नियमावली, 1952 के अध्याय 22 की आवश्यकताओं का पालन नहीं किया।
इन नियमों के तहत जनहित याचिका दाखिल करने वाले व्यक्ति को अपनी योग्यता और पृष्ठभूमि का सही विवरण देना होता है। साथ ही संबंधित विषय पर पहले से मौजूद न्यायिक फैसलों का उल्लेख करना और उनकी प्रतियां संलग्न करना भी आवश्यक है।
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:
“वर्तमान आपराधिक जनहित याचिका न केवल गलत आधार पर दाखिल की गई है, बल्कि इसे अनुचित उद्देश्यों से दाखिल किया गया है।”
हाईकोर्ट ने बिना जुर्माने के याचिका खारिज की
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने लैब असिस्टेंट भर्ती की दोबारा जांच कराने की मांग वाली आपराधिक जनहित याचिका खारिज कर दी।
बेंच ने याचिकाकर्ता के चिकित्सा विभाग के सेवानिवृत्त वरिष्ठ सहायक होने को ध्यान में रखते हुए उस पर कोई लागत नहीं लगाई।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: Sudama Ram v. Addl. Chief Secy./Prin. Secy. Deptt. of Medical and Health Services, Lucknow and 7 Others
केस नंबर: Criminal Writ-Public Interest Litigation No. 14 of 2026
पीठ: जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा
फैसले की तारीख: 5 नवंबर 2026
