माफी मांगना कानूनी शक्तियों के इस्तेमाल में सावधानी बरतने का विकल्प नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व चेन्नई पुलिस कमिश्नर के खिलाफ टिप्पणियां हटाईं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाली कानूनी शक्तियों के इस्तेमाल में आवश्यक सावधानी की जगह माफी नहीं ले सकती। कोर्ट ने तमिलनाडु गुंडा अधिनियम के तहत निवारक हिरासत का आदेश जारी करने के मामले में पूर्व चेन्नई पुलिस कमिश्नर और आईपीएस अधिकारी ए. अरुण की बिना शर्त माफी स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट की प्रतिकूल टिप्पणियां हटाने का निर्देश दिया।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की बेंच ने स्पष्ट किया कि उसका आदेश केवल अधिकारी के खिलाफ की गई टिप्पणियों तक सीमित है। इससे निवारक हिरासत का आदेश रद्द करने वाला हाईकोर्ट का फैसला प्रभावित नहीं होगा।

निवारक हिरासत के मामलों में विशेष सावधानी जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निवारक हिरासत की शक्तियों का इस्तेमाल करते समय अधिकारियों को कानून की आवश्यकताओं का सख्ती से पालन करना चाहिए।

बेंच ने कहा:

“निवारक हिरासत के मामलों में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि वैधानिक शक्ति का प्रयोग सीधे किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित करता है। इसलिए ऐसी शक्ति का इस्तेमाल अत्यधिक सावधानी और कानून की आवश्यकताओं के सख्त अनुपालन के साथ किया जाना चाहिए।”

कोर्ट ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी पर भी जोर दिया।

बेंच ने कहा:

“पुलिस प्रशासन में वरिष्ठ पद पर कार्यरत अधिकारी से अपेक्षा की जाती है कि वह उसे सौंपे गए कर्तव्यों के महत्व और वैधानिक शक्तियों के प्रयोग के साथ आने वाली जिम्मेदारी को समझे।”

अधिकारी की माफी और भविष्य में सावधानी बरतने के आश्वासन पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया:

“हम यह भी आगाह करते हैं कि माफी मांगने को किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाली शक्तियों के इस्तेमाल में आवश्यक सावधानी का विकल्प नहीं माना जा सकता।”

क्या था मामला?

ए. अरुण घटना के समय ग्रेटर चेन्नई के पुलिस कमिश्नर थे। वर्तमान में वह तमिलनाडु पुलिस अकादमी के निदेशक हैं।

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मामले की शुरुआत 29 अगस्त 2025 को रवि नामक व्यक्ति की शिकायत पर दर्ज एफआईआर संख्या 178/2025 से हुई थी।

शिकायतकर्ता के अनुसार, उन्होंने एक अपार्टमेंट खरीदने के लिए मेसर्स लोका डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड के साथ बिक्री और निर्माण समझौता किया था। इसके तहत उन्होंने 1,38,08,095 रुपये का भुगतान किया।

आरोप था कि भुगतान के बावजूद अपार्टमेंट का कब्जा नहीं दिया गया। संपत्ति को कथित रूप से तीसरे पक्ष के पक्ष में हस्तांतरित किया गया और बाद में कथित जाली दस्तावेजों के आधार पर गिरवी रख दिया गया।

कंपनी के निदेशकों, संबंधित व्यक्ति और उसकी पत्नी के खिलाफ IPC की धारा 409, 420, 465, 468, 471 और 120-B के तहत मामला दर्ज किया गया।

दोनों को 1 सितंबर 2025 को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजा गया। इसी तरह के आरोपों में उनके खिलाफ अन्य मामले भी दर्ज हुए।

इसके बाद सेंट्रल क्राइम ब्रांच-II के पुलिस इंस्पेक्टर के प्रस्ताव पर तत्कालीन पुलिस कमिश्नर ए. अरुण ने 22 सितंबर 2025 को तमिलनाडु अधिनियम संख्या 14, 1982 की धारा 3(1) के तहत निवारक हिरासत का आदेश जारी किया।

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इस आदेश में संबंधित व्यक्ति को ‘गुंडा’ की श्रेणी में रखा गया था।

मद्रास हाईकोर्ट ने हिरासत का आदेश किया था रद्द

हिरासत में लिए गए व्यक्ति की बेटी वर्षा शर्मा ने H.C.P. संख्या 2066/2025 के जरिए मद्रास हाईकोर्ट में आदेश को चुनौती दी।

29 मई 2026 को हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए निवारक हिरासत का आदेश रद्द कर दिया।

अपने फैसले के पैराग्राफ 6, 8, 10 और 19 से 23 में हाईकोर्ट ने तत्कालीन पुलिस कमिश्नर ए. अरुण के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां भी की थीं।

इन टिप्पणियों को हटाने की मांग लेकर अधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुप्रीम कोर्ट में अधिकारी ने बिना शर्त माफी मांगी

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान ए. अरुण व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहे।

उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि अधिकारी को अपनी गलती का एहसास हो गया है और वह बिना शर्त माफी मांगने के लिए तैयार हैं।

उन्होंने दलील दी कि हाईकोर्ट की टिप्पणियां रिकॉर्ड पर बनी रहने से अधिकारी की पेशेवर प्रतिष्ठा और करियर पर गंभीर असर पड़ सकता है।

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अरुण ने अपने हलफनामे में स्वीकार किया कि हाईकोर्ट के समक्ष पेश होने पर उन्हें अपनी गलती स्वीकार कर माफी मांगनी चाहिए थी।

उन्होंने ऐसा नहीं करने पर खेद व्यक्त किया और भविष्य में अधिक सावधानी बरतने का आश्वासन दिया।

प्रतिवादी संख्या 2 से 5 की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता प्रशांतो चंद्र सेन और वर्षा शर्मा की ओर से अधिवक्ता वैरावन ए.एस. उपस्थित हुए।

सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिकूल टिप्पणियां हटाने का दिया निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारी की बिना शर्त माफी, गलती स्वीकार करने और भविष्य में सावधानी बरतने के आश्वासन को ध्यान में रखते हुए उनकी अपील का निस्तारण किया।

बेंच ने मद्रास हाईकोर्ट के 29 मई 2026 के फैसले के पैराग्राफ 6, 8, 10 और 19 से 23 में ए. अरुण के खिलाफ की गई प्रतिकूल टिप्पणियां रिकॉर्ड से हटाने का निर्देश दिया।

हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निवारक हिरासत का आदेश रद्द करने वाला हाईकोर्ट का फैसला यथावत रहेगा।

केस डिटेल्स

केस टाइटल: A. Arun v. Varsha Sharma & Ors.

केस नंबर: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 16725 of 2026

पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह

फैसले की तारीख: 2 नवंबर 2026

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