सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी करदाता ने बकाया एक्साइज ड्यूटी को अपने लाभ-हानि खाते (Profit and Loss Account) में खर्च के रूप में दर्ज ही नहीं किया है और उसकी कटौती का दावा नहीं किया है, तो आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 43B के तहत उस राशि की कटौती अस्वीकार नहीं की जा सकती।
जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने मैसर्स लक्ष्मी शुगर मिल्स कंपनी लिमिटेड की अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने आकलन वर्ष 2005-06 के लिए कंपनी की कर योग्य आय में 69,91,983 रुपये जोड़ने का आदेश बहाल किया था।
क्या था मामला?
लक्ष्मी शुगर मिल्स क्रिस्टल शुगर का उत्पादन करती है और इस प्रक्रिया में मोलासेस (शीरा) उप-उत्पाद के रूप में प्राप्त होता है।
कंपनी ने आकलन वर्ष 2005-06 के आयकर रिटर्न में 28,36,167 रुपये का शुद्ध घाटा घोषित किया था।
टैक्स ऑडिटर की रिपोर्ट के अनुसार, अंतिम स्टॉक पर 2,80,56,430 रुपये की एक्साइज ड्यूटी देय थी। इसमें से 30 सितंबर 2005 तक 2,10,64,447 रुपये का भुगतान हो चुका था, जबकि 69,91,983 रुपये बकाया थे।
ऑडिटर ने टिप्पणी की थी कि बकाया राशि को आयकर अधिनियम की धारा 43B के तहत आय में वापस जोड़ा जाना चाहिए।
कंपनी ने आकलन अधिकारी को बताया कि वह लेखांकन की एक्सक्लूसिव पद्धति अपनाती है और उसने बकाया एक्साइज ड्यूटी को कभी अपने लाभ-हानि खाते में खर्च के रूप में दर्ज नहीं किया।
कंपनी का यह भी कहना था कि संबंधित माल बॉन्डेड गोदामों में रखा था और एक्साइज ड्यूटी का भुगतान करने की देनदारी माल को फैक्ट्री या बॉन्डेड गोदाम से बाहर निकालने पर उत्पन्न होती है।
हालांकि, आकलन अधिकारी ने यह स्पष्टीकरण अस्वीकार कर दिया और धारा 43B तथा धारा 145A के तहत 69,91,983 रुपये कंपनी की आय में जोड़ दिए।
CIT (अपील) और ट्रिब्यूनल ने कंपनी को दी थी राहत
आयकर आयुक्त (अपील) ने यह कहते हुए अतिरिक्त आय जोड़ने का आदेश रद्द कर दिया कि कंपनी ने संबंधित राशि को खर्च के रूप में दावा ही नहीं किया था। धारा 145A के तहत शुद्ध लाभ पर भी इसका प्रभाव शून्य था।
आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) की दिल्ली बेंच ने इस निष्कर्ष को बरकरार रखा।
लेकिन हाईकोर्ट ने राजस्व विभाग की अपील स्वीकार कर ली। हाईकोर्ट ने माना कि संबंधित माल गोदाम से बाहर निकाला जा चुका था, इसलिए एक्साइज ड्यूटी का भुगतान देय था।
सुप्रीम कोर्ट में पक्षों की दलीलें
कंपनी की ओर से अधिवक्ता मेमून ज़ेहरा ने कहा कि अप्रत्यक्ष करों का लेखांकन बैलेंस शीट के माध्यम से किया गया था और उन्हें लाभ-हानि खाते में खर्च के रूप में दर्ज नहीं किया गया था। इसलिए कंपनी ने किसी कटौती का दावा नहीं किया।
उन्होंने दलील दी कि हाईकोर्ट ने गलत आधार पर यह मान लिया कि अंतिम स्टॉक बाहर निकाला जा चुका था, जबकि माल फैक्ट्री परिसर या बॉन्डेड गोदाम में ही मौजूद था।
उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट के CIT-III v. Loknete Balasaheb Desai S.S.K. Ltd., (2011) 339 ITR 288 के फैसले पर भी भरोसा किया।
राजस्व विभाग की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस. द्वारकानाथ ने कहा कि आकलन अधिकारी ने टैक्स ऑडिटर की रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई की थी, जिसमें संबंधित राशि देय दिखाई गई थी।
उन्होंने तर्क दिया कि CIT (अपील) और ट्रिब्यूनल ने तथ्यों की उदार व्याख्या की थी तथा हाईकोर्ट का हस्तक्षेप उचित था।
बिना दावा की गई कटौती को अस्वीकार करना कानून के खिलाफ
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि CIT (अपील) और ट्रिब्यूनल, दोनों ने यह निष्कर्ष दर्ज किया था कि संबंधित स्टॉक कंपनी के बॉन्डेड गोदाम में ही मौजूद था।
बेंच ने कहा:
“हाईकोर्ट ने जिस आधार पर एक्साइज ड्यूटी की देयता निर्धारित की, वह रिकॉर्ड के विपरीत है, टिकाऊ नहीं है और उसे रद्द किया जाना चाहिए।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पाया कि टैक्स ऑडिट रिपोर्ट में दर्ज टिप्पणी के अलावा राशि को अस्वीकार करने का कोई अन्य आधार नहीं था। संबंधित राशि का न तो भुगतान हुआ था और न ही खातों में उसे देय माना गया था।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा:
“करदाता ने जिस राशि को कटौती के रूप में माना ही नहीं है, उसे अस्वीकार करना आयकर अधिनियम, 1961 के तहत स्वीकार्य नहीं है।”
बेंच ने कहा कि राजस्व विभाग यह नहीं दिखा सका कि कंपनी ने अपने खातों में संबंधित राशि की कटौती का दावा कहां और किस प्रकार किया था।
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, आकलन अधिकारी का आदेश गैरकानूनी था और CIT (अपील) तथा ट्रिब्यूनल ने सही तरीके से उसमें हस्तक्षेप किया था।
कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के ITA नंबर 4297/2009 के फैसले को भी मौजूदा मामले पर पूरी तरह लागू पाया। उस फैसले में आयकर अधिनियम की धारा 43B और 145A के परस्पर प्रभाव पर विचार किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का विवादित आदेश रद्द करते हुए लक्ष्मी शुगर मिल्स की अपील स्वीकार कर ली।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिस बकाया एक्साइज ड्यूटी की कटौती करदाता ने अपने लाभ-हानि खाते में दावा ही नहीं की थी, उसे धारा 43B के तहत अस्वीकार कर कर योग्य आय में नहीं जोड़ा जा सकता।
केस डिटेल्स
केस का नाम: M/s. Lakshmi Sugar Mills Co. Ltd. v. Commissioner of Income Tax, Delhi-II
केस नंबर: Civil Appeal No. 8932 of 2013
पीठ: जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया
फैसले की तारीख: 27 अक्टूबर 2026
