सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि एक ही ट्रायल में अलग-अलग अपराधों के लिए सुनाई गई उम्रकैद की सजाओं को एक के बाद एक भुगतने का आदेश नहीं दिया जा सकता। ऐसी सजाएं एक-दूसरे पर अध्यारोपित (Superimposed) होंगी।
जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की बेंच ने 12 वर्षीय बच्ची से रेप और हत्या के मामले में दोषी राजू शांताराम कोली की अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए उसकी दो उम्रकैद की सजाएं लगातार चलाने का निर्देश रद्द कर दिया। कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के 2016 के फैसले में भी इस निर्देश को बरकरार रखने वाले हिस्से को रद्द कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
राजू शांताराम कोली को 29 अप्रैल 2010 को 12 वर्षीय बच्ची से रेप और हत्या के आरोप में 30 अप्रैल 2010 को गिरफ्तार किया गया था। उसके खिलाफ ठाणे के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की अदालत में मुकदमा चला।
ट्रायल कोर्ट ने 27 सितंबर 2013 को उसे IPC की धारा 302 के तहत हत्या का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद और 5,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। IPC की धारा 376 सहपठित धारा 342 के तहत भी उसे उम्रकैद और 5,000 रुपये जुर्माने की सजा दी गई।
ट्रायल कोर्ट ने दोनों मूल कारावास की सजाएं एक के बाद एक चलाने का आदेश दिया।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने 10 जून 2016 को दोषसिद्धि और सजाओं को बरकरार रखते हुए लगातार उम्रकैद भुगतने के निर्देश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
इसके बाद दोषी ने दोनों सजाएं एक साथ चलाने की मांग करते हुए रिट याचिका दाखिल की। हाईकोर्ट ने 13 जनवरी 2025 को यह कहते हुए याचिका का निपटारा कर दिया कि रिट कोर्ट समान स्तर की दूसरी पीठ के फैसले की समीक्षा नहीं कर सकती।
दोषी ने 2016 के फैसले और 2025 के रिट आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उसकी ओर से अधिवक्ता एम.वाई. देशमुख और महाराष्ट्र सरकार की ओर से अधिवक्ता भरत बागला पेश हुए।
एक व्यक्ति को दो बार उम्रकैद भुगतने का निर्देश अतार्किक
सुप्रीम कोर्ट ने Muthuramalingam and Others v. State Represented by Inspector of Police, (2016) 8 SCC 313 में संविधान पीठ के फैसले पर भरोसा किया।
उस फैसले में संविधान पीठ ने कहा था:
“ऐसा कोई भी निर्देश, जिसके तहत अपराधी को दो बार आजीवन कारावास भुगतना पड़े, असंगत और अतार्किक होगा, क्योंकि यह इस तथ्य की अनदेखी करेगा कि अन्य सभी जीवित प्राणियों की तरह मनुष्य के पास भी जीने के लिए केवल एक ही जीवन होता है।”
इस कानूनी सिद्धांत को लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“एक ही ट्रायल में कई अपराधों के लिए सुनाई गई उम्रकैद की सजाओं को एक के बाद एक चलाने का निर्देश नहीं दिया जा सकता।”
बेंच ने स्पष्ट किया कि ऐसी सजाएं एक-दूसरे पर अध्यारोपित होंगी। हालांकि, किसी एक सजा में सक्षम प्राधिकारी द्वारा छूट (Remission) या सजा में परिवर्तन (Commutation) दिए जाने से दूसरी सजा में स्वतः छूट नहीं मिलेगी।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का दोनों उम्रकैद की सजाएं लगातार चलाने वाला निर्देश रद्द कर दिया। साथ ही बॉम्बे हाईकोर्ट के 10 जून 2016 के फैसले को भी इसी सीमा तक रद्द किया।
कोर्ट ने आदेश दिया कि IPC की धारा 302 और धारा 376 सहपठित धारा 342 के तहत सुनाई गई उम्रकैद की सजाएं एक-दूसरे पर अध्यारोपित होंगी।
हालांकि, ट्रायल कोर्ट के आदेश के अन्य हिस्से, जिनमें जुर्माना, जुर्माना नहीं भरने पर निर्धारित सजा और CrPC की धारा 428 के तहत पहले से हिरासत में बिताई गई अवधि का समायोजन शामिल है, बरकरार रखे गए।
सुप्रीम कोर्ट ने 2016 के फैसले के खिलाफ अपील दाखिल करने में हुई देरी माफ कर उसे सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया था। इसलिए बेंच ने यह तय करना आवश्यक नहीं समझा कि रिट कोर्ट सजाओं को एक साथ चलाने का आदेश दे सकती थी या नहीं।
वर्ष 2025 के रिट आदेश के खिलाफ अपील को निष्फल मानते हुए उसका निपटारा कर दिया गया।
केस डिटेल्स
केस का नाम: Raju Shantaram Koli v. The State of Maharashtra
केस नंबर: Criminal Appeal No. 5072 of 2026 और Criminal Appeal No. 5073 of 2026
पीठ: जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली
फैसले की तारीख: 27 अक्टूबर 2026
