बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने कहा है कि हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 (HAMA) की धारा 20(3) के तहत भरण-पोषण मांगने का वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध होने मात्र से अविवाहित बालिग बेटी को दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण मांगने से नहीं रोका जा सकता।
जस्टिस मेहरोज के. पठान ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पिता को अपनी बेटी और बेटे के लिए प्रतिमाह ₹7,000-₹7,000 भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने पिता की पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि कार्यवाही लंबित रहने के दौरान बेटे के बालिग होने का मुद्दा उचित फोरम के समक्ष CrPC की धारा 127 के तहत उठाया जा सकता है।
क्या था मामला?
पिता ने नागपुर फैमिली कोर्ट के 7 दिसंबर 2019 के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। फैमिली कोर्ट ने दोनों बच्चों को फैसले की तारीख से प्रतिमाह ₹7,000-₹7,000 भरण-पोषण देने का आदेश दिया था।
फैमिली कोर्ट ने पत्नी को भरण-पोषण देने से इनकार कर दिया था, क्योंकि वह शिक्षिका थी और प्रतिमाह ₹40,000 कमाती थी। हालांकि, पति की मासिक आय ₹71,000 होने को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने बच्चों को भरण-पोषण देने का आदेश दिया।
पिता ने क्या दलील दी?
पिता की ओर से अधिवक्ता सिद्धार्थ एम. लोढ़ा ने कहा कि पत्नी नगर परिषद के स्कूल में शिक्षिका है, लेकिन इसके बावजूद वह बच्चों का खर्च नहीं उठा रही है। उन्होंने बताया कि पिता भी शिक्षक है और उसे अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करनी पड़ती है।
उन्होंने दलील दी कि दोनों बच्चे बालिग हो चुके हैं। बेटी फैमिली कोर्ट का आदेश पारित होने से पहले ही बालिग हो गई थी, जबकि बेटा हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका लंबित रहने के दौरान बालिग हुआ।
पिता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के अभिलाषा बनाम प्रकाश एवं अन्य, 2021(13) SCC 99 फैसले का हवाला दिया गया। दलील दी गई कि अविवाहित बालिग हिंदू बेटी HAMA की धारा 20(3) के तहत पिता से भरण-पोषण मांग सकती है, लेकिन इसके लिए उसे यह दावा करना और साबित करना होगा कि वह अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है।
पिता का तर्क था कि जब बेटी के पास HAMA के तहत वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध है, तो CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण देना गैरकानूनी है। उन्होंने यह भी कहा कि धारा 125 के तहत केवल नाबालिग बच्चे ही भरण-पोषण पाने के हकदार हैं।
दूसरी ओर, पत्नी और बच्चों की ओर से अधिवक्ता एस.ए. साहू ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि अभिलाषा मामले के फैसले पर पिता की निर्भरता गलत है।
उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट के मुरलीधर कृष्णराव विरुलकर बनाम कुमारी नेहा, 2024 SCC OnLine Bom 3706 फैसले का उल्लेख किया, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि लगभग नौ साल बाद बेटी को HAMA की धारा 20(3) के तहत नई अर्जी दाखिल करने के लिए कहना कठोर होगा।
उन्होंने यह भी बताया कि फैमिली कोर्ट के फैसले के समय बेटा नाबालिग था और अब बालिग होने के बावजूद अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है।
अविवाहित बालिग बेटी के अधिकार पर हाईकोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट का फैसला आने के समय बेटा नाबालिग था। इसलिए बाद में उसके बालिग हो जाने के आधार पर फैमिली कोर्ट के आदेश को गलत नहीं ठहराया जा सकता।
बेटी के भरण-पोषण के अधिकार पर कोर्ट ने कहा,
“केवल इस तरह का वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होना CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण मांगने में बाधा नहीं बन सकता, विशेष रूप से तब, जब आवेदक यह दिखाने में विफल रहा है कि विपक्षी संख्या 2 यानी बेटी अपना भरण-पोषण करने में सक्षम है।”
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के जगदीश जुगतावत बनाम मंजू लता एवं अन्य, 2002(5) SCC 422 फैसले का भी उल्लेख किया।
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था,
“नाबालिग लड़की के बालिग होने के बाद से उसके विवाह तक माता-पिता से भरण-पोषण प्राप्त करने के अधिकार को हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम की धारा 20(3) में मान्यता दी गई है।”
इस सिद्धांत को लागू करते हुए जस्टिस पठान ने कहा,
“अविवाहित बालिग बेटी को भी भरण-पोषण देने का आदेश पारित करने में फैमिली कोर्ट की ओर से कोई त्रुटि होती नहीं दिखाई देती।”
बेटे के बालिग होने पर क्या कहा?
बेटे के बालिग होने के सवाल पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस संबंध में पिता अपनी शिकायत उचित फोरम के समक्ष CrPC की धारा 127 के तहत आवेदन दाखिल करके उठा सकता है।
कोर्ट ने कहा,
“इस शिकायत को उचित फोरम के समक्ष CrPC की धारा 127 के तहत दाखिल किए जाने वाले आवेदन में उठाया जा सकता है।”
हाईकोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उर्वशी अग्रवाल एवं अन्य बनाम इंदरपाल अग्रवाल फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था,
“यह नहीं कहा जा सकता कि बेटे के 18 वर्ष की आयु पूरी करते ही पिता का दायित्व समाप्त हो जाएगा और उसकी शिक्षा तथा अन्य खर्चों का पूरा बोझ केवल मां पर आ जाएगा।”
हाईकोर्ट ने पिता की याचिका खारिज की
सभी तथ्यों और कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि दोनों बच्चों को प्रतिमाह ₹7,000-₹7,000 भरण-पोषण देने का आदेश गलत नहीं है।
कोर्ट ने कहा,
“बच्चों को ₹7,000-₹7,000 भरण-पोषण देने का आदेश त्रुटिपूर्ण प्रतीत नहीं होता।”
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने पिता की पुनरीक्षण याचिका को गुण-दोष के आधार पर निराधार पाते हुए खारिज कर दिया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: आनंद हरिश्चंद्र चौहान बनाम श्रीमती शैला एवं अन्य
केस नंबर: क्रिमिनल रिवीजन संख्या 53/2022
बेंच: जस्टिस मेहरोज के. पठान
फैसले की तारीख: 13 अक्टूबर 2026
