पॉक्सो केस में आरोपी का मोबाइल जब्त नहीं करने पर महिला जांच अधिकारी को शाम 4 बजे तक कोर्ट की हिरासत में रखा, ₹5,000 का जुर्माना: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पॉक्सो एक्ट से जुड़े एक मामले में आरोपी का मोबाइल फोन जब्त नहीं करने पर महिला जांच अधिकारी के खिलाफ सख्त रुख अपनाया। कोर्ट ने जांच अधिकारी को शाम 4 बजे तक कोर्ट की हिरासत में रहने का आदेश दिया और उन पर ₹5,000 का जुर्माना लगाया। पीड़िता ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने उसकी अश्लील फोटो और वीडियो एडिट कर सोशल मीडिया पर अपलोड किए थे, लेकिन जांच अधिकारी ने इस आरोप की जांच के लिए आरोपी का मोबाइल फोन जब्त नहीं किया था। इसी आदेश में हाईकोर्ट ने आरोपी को जमानत भी दे दी।

जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल ने राज रईन की जमानत अर्जी पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। आरोपी के खिलाफ कानपुर देहात के मूसा नगर थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 137(2), 70(2) और 351(3), पॉक्सो एक्ट, 2012 की धारा 5(G)/6 तथा उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 की धारा 3, 5(1) और 5(3) के तहत मामला दर्ज किया गया था।

पीड़िता के आरोप के बावजूद मोबाइल जब्त नहीं किया

मामले की 9 अक्टूबर 2026 को हुई सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि पीड़िता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 183 के तहत दर्ज अपने बयान में आरोप लगाया था कि आरोपी ने उसकी अश्लील फोटो और वीडियो एडिट करके सोशल मीडिया पर अपलोड किए थे। इसके बावजूद जांच अधिकारी ने आरोप की पुष्टि के लिए आरोपी का मोबाइल फोन बरामद नहीं किया।

इस पर कोर्ट ने जांच अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया।

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आदेश के अनुपालन में मूसा नगर थाने की जांच अधिकारी अनीता वर्मा कोर्ट में उपस्थित हुईं। उन्होंने स्वीकार किया कि गलती से आरोपी का मोबाइल फोन जब्त नहीं किया गया। उन्होंने बताया कि हाईकोर्ट के आदेश की प्रति मिलने के बाद से वह सह-आरोपी के खिलाफ लंबित जांच के दौरान मोबाइल फोन बरामद करने का प्रयास कर रही थीं।

हाईकोर्ट ने अपने पहले के फैसले पंकज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 2026 SCC OnLine All 37064 का उल्लेख किया। इस मामले में कोर्ट ने 17 जुलाई 2026 को उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया था कि जहां भी किसी अश्लील फोटो या वीडियो को बनाने या वायरल करने का आरोप हो, वहां आरोपी का मोबाइल फोन जब्त करना अनिवार्य करने के लिए सर्कुलर जारी किया जाए।

इस निर्देश के बाद पुलिस महानिदेशक ने 25 जुलाई 2026 को सभी पुलिस अधिकारियों के लिए सर्कुलर जारी किया था।

जांच अधिकारी की लापरवाही को कोर्ट ने अवमाननापूर्ण माना

हाईकोर्ट ने जांच में हुई चूक पर नाराजगी जताते हुए कहा,

“मामले के तथ्यों से न केवल जांच करने में जांच अधिकारी की लापरवाही सामने आती है, बल्कि आरोपी का मोबाइल फोन जब्त नहीं करना अवमाननापूर्ण भी है, क्योंकि BNSS की धारा 183 के तहत दर्ज पीड़िता के बयान को देखते हुए यह मोबाइल फोन एक प्रासंगिक साक्ष्य है।”

कोर्ट ने कहा कि महिला अधिकारी होने के कारण वह नरम रुख अपनाते हुए उनके खिलाफ कोई प्रतिकूल टिप्पणी करने से बच रहा है।

हाईकोर्ट ने कहा,

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“नरम रुख अपनाते हुए कोर्ट महिला अधिकारी होने के कारण उक्त जांच अधिकारी के खिलाफ कोई प्रतिकूल टिप्पणी करने से बच रहा है।”

हालांकि, कोर्ट ने जांच अधिकारी को भविष्य में सावधानी बरतने की चेतावनी देते हुए ₹5,000 आर्मी वेलफेयर फंड में जमा करने का निर्देश दिया।

इसके साथ ही कोर्ट ने आदेश दिया,

“जांच अधिकारी कोर्ट से बाहर नहीं जाएंगी और शाम 4 बजे तक कोर्ट की हिरासत में रहेंगी।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शाम 4 बजे के बाद उन्हें जाने की अनुमति दी जाएगी। जुर्माना जमा करने की रसीद संबंधित मजिस्ट्रेट के सामने पेश करनी होगी।

जमानत पर सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की दलीलें

आरोपी की ओर से अधिवक्ता वैभव श्रीवास्तव की तरफ से अधिवक्ता योगेश श्रीवास्तव ने दलील दी कि मामले में बलात्कार का आरोप नहीं है। आरोप केवल पीड़िता को गलत तरीके से छूकर यौन उत्पीड़न करने का है।

उन्होंने कहा कि पीड़िता ने फोटो और वीडियो एडिट करके सोशल मीडिया पर प्रसारित करने का आरोप जरूर लगाया, लेकिन पुलिस को जांच में ऐसा कोई फोटो या वीडियो नहीं मिला।

बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि आरोपी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। मामले में चार्जशीट दाखिल हो चुकी है और आरोपी 4 जुलाई 2026 से जेल में बंद है।

राज्य सरकार की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता (AGA) सुनील कुमार ने जमानत का कड़ा विरोध किया, लेकिन बचाव पक्ष की ओर से रखे गए इन तथ्यों का खंडन नहीं कर सके।

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हाईकोर्ट ने आरोपी को दी जमानत

हाईकोर्ट ने जमानत पर फैसला करते समय BNSS की धारा 180 और 183 के तहत दर्ज पीड़िता के बयानों में विरोधाभास, पीड़िता का मेडिकल परीक्षण कराने से इनकार, जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों की संख्या और ट्रायल कोर्ट में लंबित मामलों की बड़ी संख्या सहित कई पहलुओं पर विचार किया।

कोर्ट ने कपिल वधावन बनाम सीबीआई, 2025 SCC OnLine SC 3038 और माया तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 2024 SCC OnLine All 6765 का भी उल्लेख किया।

इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त किए बिना आरोपी की जमानत अर्जी मंजूर कर ली।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि आरोपी को व्यक्तिगत मुचलके और दो जमानतदारों की शर्त पर रिहा किया जाए। जमानत की शर्तों में साक्ष्यों से छेड़छाड़ नहीं करना, मुकदमे की सुनवाई में सहयोग करना और किसी आपराधिक गतिविधि में शामिल नहीं होना शामिल है।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को जमानत आदेश प्रबंधन प्रणाली (BOMS) के माध्यम से रिहाई का आदेश भेजने का भी निर्देश दिया।

केस डिटेल्स

केस टाइटल: राज रईन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं 3 अन्य
केस नंबर: क्रिमिनल मिसलेनियस बेल एप्लीकेशन संख्या 36210/2026
बेंच: जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल
फैसले की तारीख: 24 अक्टूबर 2026

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