ससुराल में पत्नी की अस्वाभाविक मौत पर पति को देना होगा स्पष्टीकरण, झूठा बचाव अभियोजन के पक्ष में अतिरिक्त सबूत: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वैवाहिक घर में पत्नी की अस्वाभाविक मृत्यु होने पर पति को उन परिस्थितियों का विश्वसनीय स्पष्टीकरण देना होगा, जिनमें उसकी मौत हुई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के तहत ऐसा स्पष्टीकरण देने में विफलता और झूठा बचाव पेश करना परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला को पूरा करने वाली अतिरिक्त कड़ी बन सकता है।

जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय की बेंच ने शादी के नौ महीने के भीतर पत्नी की गला दबाकर हत्या करने के मामले में पति रामकिशन दिगंबर जाधव की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी है। कोर्ट ने पति और उसके भाई वेंकट की अपीलें खारिज करते हुए IPC की धारा 498-A और 304-B के साथ धारा 34 के तहत क्रूरता और दहेज हत्या के अपराधों में उनकी दोषसिद्धि भी कायम रखी।

पत्नी की मौत पर पति का स्पष्टीकरण झूठा पाया गया

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि मृतका विमलबाई की मौत गला दबाने से हुई थी, जबकि पति ने दावा किया था कि शारीरिक संबंध बनाते समय अचानक मिर्गी का दौरा पड़ने से उसकी मृत्यु हुई।

पोस्टमार्टम करने वाले डॉ. श्याम नागापुरकर (PW-1) ने गले के भीतरी हिस्से में रक्तस्राव, थायरॉयड कार्टिलेज पर चोटों और हायॉइड हड्डी के बाएं हिस्से में फ्रैक्चर की पुष्टि की थी।

डॉक्टर ने मिर्गी के दौरे से मृत्यु होने की संभावना खारिज की। उन्होंने बताया कि मृतका के जबड़े में अकड़न या जीभ की स्थिति में बदलाव नहीं था। गले की आंतरिक चोटें भी मिर्गी के दौरे से नहीं आ सकती थीं।

इन परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पत्नी की मृत्यु के संबंध में स्पष्टीकरण देने की जिम्मेदारी पति पर थी।

बेंच के अनुसार, पति के लिए आवश्यक था कि वह “उन परिस्थितियों के संबंध में ठोस, विश्वसनीय और संतोषजनक स्पष्टीकरण दे, जिनके परिणामस्वरूप उसकी मृत्यु हुई।”

साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

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सुप्रीम कोर्ट ने Trimukh Maroti Kirkan v. State of Maharashtra, (2006) 10 SCC 681 के फैसले का उल्लेख किया।

उस निर्णय में कहा गया था:

“घर में रहने वाले लोग केवल चुप रहकर और कोई स्पष्टीकरण न देकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते।”

वर्तमान मामले में बेंच ने पाया कि रामकिशन पत्नी की मृत्यु के संबंध में विश्वसनीय स्पष्टीकरण देने में विफल रहा।

कोर्ट ने कहा कि यह विफलता “झूठा बचाव प्रस्तुत किए जाने के साथ मिलकर एक अतिरिक्त दोषसूचक कड़ी प्रदान करती है, जो परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला को पूरा करती है।”

बेंच ने माना कि उपलब्ध परिस्थितिजन्य साक्ष्य हत्या के अपराध में पति की दोषसिद्धि स्थापित करते हैं।

शादी के बाद दहेज के लिए प्रताड़ित करने का आरोप

रामकिशन और विमलबाई का विवाह 12 मई 1995 को हुआ था।

अभियोजन के अनुसार, विवाह के बाद विमलबाई से टेलीविजन, टेप डेक, MIDC क्षेत्र में एक भूखंड और पति के रोजगार के लिए 50,000 रुपये नकद की मांग की जाने लगी।

इन मांगों को लेकर उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया।

विमलबाई ने मायके आने पर अपने भाई नारायण को बताया था कि उसके साथ मारपीट की जाती है और उसे भोजन नहीं दिया जाता।

एक घटना में उसे रस्सी से बांधकर कुएं में लटका दिया गया था और मांगें पूरी नहीं होने पर जान से मारने की धमकी दी गई थी।

रात में पत्नी की तबीयत बिगड़ने की सूचना दी थी

1 फरवरी 1996 को रात करीब एक बजे रामकिशन अपने साले नारायण के घर पहुंचा।

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उसने बताया कि विमलबाई को दौरे पड़ रहे हैं और उसे इलाज के लिए नायगांव ले जाया जा रहा है।

रास्ते में परिवार के सदस्यों को एक बैलगाड़ी मिली, जिसमें विमलबाई का शव रखा था। उसकी नाक और उंगलियों से खून निकल रहा था।

नायगांव अस्पताल में डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

उसी दिन सुबह आठ बजे रामकिशन ने नायगांव पुलिस स्टेशन में आवेदन देकर दावा किया कि शारीरिक संबंध बनाते समय उसकी पत्नी को चक्कर आए, जबड़ा अकड़ गया और उसकी मृत्यु हो गई।

हालांकि, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु का कारण गला दबाने से दम घुटना पाया गया।

हाईकोर्ट ने पति को हत्या का दोषी ठहराया था

बिलोली की ट्रायल कोर्ट ने रामकिशन, उसके पिता दिगंबर और भाई वेंकट को IPC की धारा 498-A और 304-B के तहत दोषी ठहराते हुए सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।

हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने सभी आरोपियों को हत्या के आरोप से बरी कर दिया था।

3 जुलाई 2013 को बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने दोषियों की अपील खारिज कर दी और राज्य सरकार की अपील आंशिक रूप से स्वीकार की।

हाईकोर्ट ने रामकिशन को हत्या का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद और 5,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।

सुप्रीम कोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान दिगंबर की मृत्यु हो गई, जिसके कारण उसकी अपील समाप्त हो गई।

दहेज हत्या के आरोप में भी दोषसिद्धि बरकरार

सुप्रीम कोर्ट में आरोपियों की ओर से दलील दी गई कि मामला पूरी तरह परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था और साक्ष्यों की श्रृंखला अधूरी थी।

रामकिशन की ओर से मिर्गी के दौरे से आकस्मिक मृत्यु का दावा दोहराया गया।

दिगंबर और वेंकट की ओर से कहा गया कि उन्हें केवल पति के रिश्तेदार होने के कारण मामले में शामिल किया गया था। तीन महिला रिश्तेदारों को बरी किए जाने के आधार पर समान राहत मांगी गई।

महाराष्ट्र सरकार की ओर से दलील दी गई कि विमलबाई की हत्या उस समय हुई, जब वह पति के साथ थी। इसलिए साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के तहत मृत्यु की परिस्थितियों का स्पष्टीकरण देने की जिम्मेदारी पति पर थी।

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राज्य ने साक्ष्य अधिनियम की धारा 113-B के तहत दहेज हत्या से संबंधित वैधानिक उपधारणा पर भी भरोसा किया।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि मृतका के भाई नारायण (PW-2) की गवाही की पुष्टि विवाह के मध्यस्थ, मृतका के पिता और दो स्वतंत्र पड़ोसियों की गवाही से होती थी।

बेंच ने कहा:

“आरोपी-अपीलकर्ता साक्ष्य अधिनियम की धारा 113-B के तहत वैधानिक उपधारणा का खंडन करने में विफल रहे और निचली अदालतों ने उन्हें सही रूप से दोषी ठहराया था।”

चार सप्ताह में सरेंडर करने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं पाया और अपीलें खारिज कर दीं।

बेंच ने अपीलकर्ताओं के जमानत बांड रद्द करते हुए उन्हें चार सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निर्धारित अवधि में आत्मसमर्पण नहीं करने पर ट्रायल कोर्ट उनकी गिरफ्तारी सुनिश्चित करने के लिए गैर-जमानती वारंट जारी करने सहित आवश्यक कदम उठाएगी।

केस डिटेल्स

केस टाइटल: Ramkishan Digambar Jadhav v. The State of Maharashtra

केस नंबर: Criminal Appeal No. 1849 of 2013 with Criminal Appeal No. 962 of 2014

पीठ: जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय

फैसले की तारीख: 2 नवंबर 2026

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