इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए सोशल मीडिया पर लगाई सख्त पाबंदियां, कोर्ट के वीडियो और राजनीतिक पोस्ट पर रोक

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों, अधिकारियों और कर्मचारियों की सोशल मीडिया गतिविधियों को लेकर नए प्रतिबंध लागू किए हैं। अब वे अदालत की कार्यवाही के वीडियो या तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा नहीं कर सकेंगे। इसके अलावा राजनीतिक पोस्ट करने, सोशल मीडिया अकाउंट से कमाई करने और आधिकारिक जानकारी को व्यक्तिगत डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रकाशित करने पर भी रोक लगा दी गई है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इन प्रतिबंधों का उल्लंघन करने वाले कर्मचारियों के खिलाफ तत्काल अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की जाएगी। परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों या अन्य व्यक्तियों के सोशल मीडिया अकाउंट के जरिए आधिकारिक सामग्री साझा करना भी नियमों का उल्लंघन माना जाएगा।

हाईकोर्ट के स्थापना अनुभाग ने 27 अक्टूबर 2026 को इस संबंध में कार्यालय ज्ञापन जारी किया है। यह आदेश मुख्य न्यायाधीश के 26 अक्टूबर 2026 के निर्देशों के आधार पर जारी किया गया है। नए नियम इलाहाबाद हाईकोर्ट, उसकी लखनऊ पीठ और प्रदेश की जिला न्यायपालिका के न्यायिक अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर लागू होंगे।

कोर्ट की कार्यवाही के वीडियो और तस्वीरें साझा करने पर प्रतिबंध

नए निर्देशों के अनुसार, कोई भी न्यायिक अधिकारी या कर्मचारी अदालत की कार्यवाही से संबंधित वीडियो, फोटो, ऑडियो रिकॉर्डिंग या छोटी क्लिप को अपने व्यक्तिगत डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रिकॉर्ड, अपलोड, प्रसारित या लाइव स्ट्रीम नहीं कर सकेगा।

यह प्रतिबंध केवल कोर्ट रूम तक सीमित नहीं है। इसके दायरे में अदालत के कार्यालय, गलियारे, न्यायाधीशों के चैंबर, आवासीय कार्यालय और आधिकारिक कार्यक्रम भी शामिल हैं।

इसका मतलब है कि न्यायिक अधिकारी और कर्मचारी इन स्थानों से संबंधित सामग्री को अपने व्यक्तिगत सोशल मीडिया अकाउंट पर प्रकाशित या प्रसारित नहीं कर सकेंगे।

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परिवार और रिश्तेदारों के अकाउंट से भी नहीं कर सकेंगे पोस्ट

हाईकोर्ट ने आधिकारिक जानकारी या सामग्री के प्रसार के लिए दूसरे व्यक्तियों के सोशल मीडिया अकाउंट इस्तेमाल करने पर भी रोक लगा दी है।

निर्देशों के अनुसार, न्यायिक अधिकारी और कर्मचारी अपने परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों, परिचितों या अन्य व्यक्तियों के नाम से संचालित अकाउंट के जरिए संस्थागत मामलों से जुड़ी सामग्री प्रकाशित नहीं कर सकेंगे।

यह प्रतिबंध ऐसी तस्वीरों और वीडियो पर भी लागू होगा, जिन्हें कर्मचारी ने अपनी आधिकारिक जिम्मेदारियों के दौरान प्राप्त किया हो या अदालत परिसर में रिकॉर्ड किया हो।

हाईकोर्ट ने कर्मचारियों को निर्देश दिया है कि वे अपने परिवार के सदस्यों को भी पद से जुड़े विशेषाधिकारों या सुविधाओं का सोशल मीडिया पर प्रदर्शन करने से रोकें।

यदि कोई कर्मचारी दूसरे व्यक्ति के अकाउंट के जरिए प्रतिबंधित सामग्री प्रकाशित कराता है, तो इसे संबंधित कर्मचारी की ओर से गोपनीयता और आचरण नियमों का व्यक्तिगत उल्लंघन माना जाएगा।

राजनीतिक पोस्ट, लाइक और शेयर करने पर भी रोक

हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों, अधिकारियों और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की डिजिटल राजनीतिक गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया है।

उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण नियमावली, 1956 के नियम 5 का हवाला देते हुए निर्देश दिया गया है कि कर्मचारी अपने व्यक्तिगत या दूसरे व्यक्तियों के सोशल मीडिया अकाउंट से किसी राजनीतिक दल, उम्मीदवार या राजनीतिक एजेंडे का प्रचार नहीं कर सकेंगे।

इसके अलावा ऑनलाइन राजनीतिक अभियानों में हिस्सा लेना, राजनीतिक हैशटैग का इस्तेमाल करना और सरकार की नीतियों, विधायी फैसलों या चुनावी बहस से जुड़े सार्वजनिक विवादों में भाग लेना भी प्रतिबंधित होगा।

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हाईकोर्ट ने राजनीतिक रूप से विवादास्पद सामग्री को लाइक करने, दोबारा पोस्ट करने, शेयर करने या उस पर टिप्पणी करने को भी प्रतिबंधित गतिविधियों में शामिल किया है।

YouTube और Instagram से कमाई करने पर प्रतिबंध

हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों और कर्मचारियों के सोशल मीडिया अकाउंट के व्यावसायिक इस्तेमाल पर भी सख्त प्रतिबंध लगाए हैं।

निर्देशों के अनुसार, कर्मचारी सोशल मीडिया अकाउंट पर मोनेटाइजेशन सुविधा सक्रिय नहीं कर सकेंगे। उन्हें कॉरपोरेट स्पॉन्सरशिप लेने, विज्ञापन से कमाई करने या डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए अन्य आर्थिक लाभ प्राप्त करने की भी अनुमति नहीं होगी।

कार्यालय ज्ञापन में विशेष रूप से व्यक्तिगत YouTube चैनल, सार्वजनिक ब्लॉग और Instagram प्रोफाइल का उल्लेख किया गया है।

यदि कोई कर्मचारी अपने आधिकारिक कार्यों से प्राप्त सामग्री या अदालत परिसर में रिकॉर्ड किए गए वीडियो और तस्वीरों का इस्तेमाल करके विज्ञापन या ब्रांड प्रमोशन से कमाई करता है, तो इसे प्रतिबंधित निजी व्यापार या रोजगार माना जाएगा।

हाईकोर्ट ने इस संबंध में उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण नियमावली, 1956 के नियम 15 का हवाला दिया है।

ऐसी गतिविधियों के जरिए कमाई करने पर संबंधित कर्मचारी के खिलाफ तत्काल अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी और बड़ी विभागीय सजा भी दी जा सकती है।

आधिकारिक जानकारी केवल अधिकृत माध्यम से होगी जारी

हाईकोर्ट ने अदालतों से संबंधित आधिकारिक सूचनाओं और संस्थागत जानकारी के प्रकाशन के लिए भी स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं।

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अब न्यायालय के संचालन से जुड़ी शैक्षणिक सामग्री, सार्वजनिक सूचनाएं और आधिकारिक जानकारी केवल अधिकृत मीडिया सेल, हाईकोर्ट या जिला न्यायालय के संबंधित अनुभाग अथवा अधिकृत कर्मचारियों के माध्यम से ही जारी की जा सकेगी।

कोई भी न्यायिक अधिकारी या कर्मचारी स्वतंत्र रूप से संस्थागत कार्यों से संबंधित सामग्री का प्रकाशन नहीं कर सकेगा।

हालांकि, सक्षम प्राधिकारी द्वारा सार्वजनिक प्रसार के लिए विशेष रूप से स्वीकृत दस्तावेजों, सूचनाओं और संस्थागत सामग्री पर यह प्रतिबंध लागू नहीं होगा।

नियमों के उल्लंघन पर तत्काल विभागीय कार्रवाई

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि नए निर्देशों के उल्लंघन की जानकारी मिलने या शिकायत प्राप्त होने पर संबंधित अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ तत्काल अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की जाएगी।

ऐसी कार्रवाई इलाहाबाद हाईकोर्ट अधिकारी एवं कर्मचारी (सेवा शर्तें और आचरण) नियमावली, 1976 या उत्तर प्रदेश राज्य जिला न्यायालय सेवा नियमावली, 2013 के साथ उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण नियमावली, 1956 के संबंधित प्रावधानों के तहत की जाएगी।

हाईकोर्ट ने सभी संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे इन नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करें।

स्थापना अनुभाग के रजिस्ट्रार द्वारा जारी कार्यालय ज्ञापन में संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को निर्देशों की जानकारी न्यायिक अधिकारियों और कर्मचारियों तक पहुंचाने के लिए कहा गया है। इसके अलावा आदेश को हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड करने के निर्देश भी दिए गए हैं।

हाईकोर्ट के ये प्रतिबंध तत्काल प्रभाव से लागू हो गए हैं।

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