इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी स्थायी पद पर नियुक्ति होने मात्र से कर्मचारी को स्थायी कर्मचारी का दर्जा नहीं मिल जाता। यदि नियुक्ति अस्थायी है और कर्मचारी की सेवाओं की औपचारिक पुष्टि नहीं हुई है, तो उसकी नियुक्ति अस्थायी ही मानी जाएगी। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने एक सरकारी स्कूल के क्लर्क की 1995 में की गई सेवा समाप्ति को वैध ठहराया है। हालांकि, कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को लगभग 31 वर्षों के दौरान कर्मचारी को दिए गए वेतन की वसूली करने से रोक दिया है।
न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता ने 24 अक्टूबर के आदेश में कर्मचारी की याचिका खारिज करते हुए कहा कि उसकी नियुक्ति कभी स्थायी नहीं हुई थी। इसलिए 29 सितंबर 1995 को उसकी सेवाएं समाप्त करने का आदेश कानून के अनुरूप था।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कर्मचारी की सेवा समाप्ति दंडात्मक कार्रवाई नहीं थी। ऐसे में संविधान के अनुच्छेद 311(2) के तहत विभागीय जांच या सुनवाई का अवसर देना आवश्यक नहीं था।
स्थायी पद पर नियुक्ति होने से कर्मचारी स्थायी नहीं हो जाता
मामला इटावा स्थित श्रवण एवं वाक् बाधित बच्चों के एक सरकारी स्कूल में जूनियर क्लर्क की नियुक्ति से जुड़ा था।
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश अस्थायी सरकारी सेवक (सेवा समाप्ति) नियमावली, 1975 और उत्तर प्रदेश राज्य सरकारी सेवक पुष्टिकरण नियमावली, 1991 के प्रावधानों की जांच की।
कोर्ट ने पाया कि 1975 की नियमावली के अनुसार स्थायी पद पर कार्यवाहक रूप से की गई नियुक्ति भी अस्थायी सेवा की श्रेणी में आती है। वहीं, 1991 की नियमावली के तहत किसी कर्मचारी की सेवा स्थायी करने के लिए औपचारिक पुष्टि आदेश आवश्यक है।
इस मामले में जूनियर क्लर्क का पद स्थायी था, लेकिन नियुक्ति पत्र में स्पष्ट रूप से कर्मचारी की सेवाओं को अस्थायी बताया गया था। उसकी सेवाओं की पुष्टि करने वाला कोई आदेश भी जारी नहीं हुआ था।
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल स्थायी पद पर काम करने के आधार पर किसी कर्मचारी की अस्थायी नियुक्ति को स्थायी नहीं माना जा सकता।
बिना सुनवाई सेवा समाप्त करने को चुनौती दी थी
कर्मचारी ने अपनी सेवा समाप्ति को चुनौती देते हुए दलील दी थी कि उसकी नियुक्ति निर्धारित चयन प्रक्रिया के अनुसार स्थायी पद पर हुई थी। इसलिए सरकार 1975 की नियमावली के तहत उसकी सेवाएं समाप्त नहीं कर सकती थी।
उसका यह भी तर्क था कि बिना सुनवाई का अवसर दिए सेवा समाप्त करना संविधान के अनुच्छेद 311(2) के तहत मिलने वाले संरक्षण का उल्लंघन है।
दूसरी ओर, राज्य सरकार ने बताया कि संबंधित स्कूल की स्थापना 1990 में हुई थी। संस्थान का संचालन शुरू करने के लिए नियमित भर्ती होने तक शुरुआती नियुक्तियां तदर्थ आधार पर की गई थीं।
सरकार ने कहा कि संबंधित कर्मचारी की सेवाओं की कभी औपचारिक पुष्टि नहीं हुई। इसलिए उसकी नियुक्ति अस्थायी बनी रही।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की दलील स्वीकार करते हुए पाया कि सेवा समाप्ति का आदेश किसी अनुशासनात्मक कार्रवाई या दंड के रूप में जारी नहीं किया गया था।
कोर्ट के अनुसार, यह लागू सेवा नियमों के तहत सामान्य सेवा समाप्ति का मामला था। इसलिए अनुच्छेद 311(2) के तहत विभागीय जांच या सुनवाई का अवसर देने की आवश्यकता नहीं थी।
1991 में हुई थी नियुक्ति, 1995 में सेवाएं समाप्त
कर्मचारी को 8 मई 1991 को जूनियर क्लर्क के पद पर नियुक्ति पत्र जारी किया गया था। उसका वेतनमान 950-20-1150-25-1500 रुपये निर्धारित था। उसने 8 जुलाई 1991 को कार्यभार संभाला था।
इसके बाद 29 सितंबर 1995 को उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं।
कर्मचारी ने इस फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने 1 नवंबर 1995 को अंतरिम आदेश जारी करते हुए अधिकारियों को उसका बकाया वेतन देने और आगे भी नियमित रूप से मासिक वेतन का भुगतान करने का निर्देश दिया।
हालांकि, उस समय कोर्ट ने याचिका का निस्तारण छह महीने के भीतर करने की बात कही थी, लेकिन मामला लगभग तीन दशकों तक लंबित रहा।
इस दौरान कर्मचारी हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के आधार पर सेवा में बना रहा और उसे वेतन मिलता रहा।
करीब 31 साल का वेतन वापस नहीं ले सकेगी सरकार
हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते समय लंबे समय तक चले मुकदमे और कर्मचारी की परिस्थितियों पर भी विचार किया।
कोर्ट ने उल्लेख किया कि याचिका दाखिल करते समय कर्मचारी की उम्र 28 वर्ष थी, जबकि मामले का अंतिम निस्तारण होने तक उसकी उम्र लगभग 59 वर्ष हो चुकी थी।
हाईकोर्ट ने 29 सितंबर 1995 से सेवा समाप्ति को वैध मानते हुए भी स्पष्ट किया कि 1 नवंबर 1995 के अंतरिम आदेश के आधार पर कर्मचारी को किए गए किसी भी भुगतान की वसूली नहीं की जाएगी।
इस प्रकार, कर्मचारी की सेवा समाप्ति को बरकरार रखने के बावजूद कोर्ट ने राज्य सरकार को लगभग 31 वर्षों के दौरान दिए गए वेतन की वसूली करने से रोक दिया।
फैसले में इस अवधि के दौरान भुगतान किए गए कुल वेतन या संभावित वसूली की रकम का उल्लेख नहीं किया गया है। कोर्ट ने कर्मचारी को कोई अतिरिक्त मुआवजा भी नहीं दिया।
अंततः हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और 29 सितंबर 1995 से सेवा समाप्ति को प्रभावी माना, लेकिन अंतरिम न्यायिक आदेश के तहत कर्मचारी को मिले वेतन और अन्य भुगतानों को वसूली से सुरक्षित रखा।
