बरेली हिंसा मामला: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मौलाना तौकीर रज़ा की जमानत अर्जी खारिज की, भड़काऊ नारेबाजी पर जताई कड़ी आपत्ति

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सितंबर 2025 के बरेली हिंसा मामले में इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल (आईएमसी) के प्रमुख मौलाना तौकीर रज़ा की जमानत याचिका खारिज कर दी है। सोमवार को फैसला सुनाते हुए जस्टिस आशुतोष श्रीवास्तव ने टिप्पणी की कि घटना के बाद अपने संबोधन में तौकीर रज़ा द्वारा की गई नारेबाजी कानून के इकबाल और देश की संप्रभुता व अखंडता को सीधी चुनौती थी। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि पुलिस द्वारा 21 दिसंबर 2025 को चार्जशीट दाखिल किए जाने के बावजूद मामले में अभी आरोप तय होना बाकी है, लिहाजा इस चरण पर आरोपी को राहत नहीं दी जा सकती। मौलाना तौकीर रज़ा 13 अक्टूबर 2025 से इस मामले में जेल में बंद हैं।

धार्मिक नारों और भड़काऊ बयानों में अंतर स्पष्ट

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने दलील दी कि हिंसा के बाद दिए गए भाषण में तौकीर रज़ा ने “गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सजा, सर तन से जुदा, सर तन से जुदा” का नारा बुलंद किया था, जो भारतीय संप्रभुता और विधिक सत्ता के सीधे खिलाफ है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के इस तर्क से सहमति जताते हुए कहा कि इस तरह के भड़काऊ नारे की तुलना “नारा-ए-तकबीर, अल्लाहू अकबर”, “जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल”, “जय श्री राम” या “हर हर महादेव” जैसे धार्मिक उद्घोषों से कतई नहीं की जा सकती। अदालत के अनुसार, ये पारंपरिक उद्घोष अपने आराध्य या गुरु के प्रति आस्था और आदर प्रकट करने वाले होते हैं।

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निजी राजनीतिक हितों के लिए भीड़ जुटाने पर फटकार

अदालत ने केस डायरी और रिकॉर्ड्स का हवाला देते हुए कहा कि आरोपी ने अपने निजी धार्मिक और राजनीतिक हितों को साधने के लिए जुमे की नमाज के मौके का इस्तेमाल किया। प्रशासन से कोई अनुमति लिए बिना ही मुस्लिम समुदाय के लोगों को इस्लामिया इंटर कॉलेज मैदान पर जुटने का आह्वान किया गया था। इसका मकसद समुदाय पर कथित सरकारी कार्रवाई का विरोध करना और बरेली के जिलाधिकारी के जरिए राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपना बताया गया था।

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बचाव पक्ष ने दलील दी थी कि स्थानीय प्रशासन द्वारा इजाजत न मिलने और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 लागू होने के बाद कार्यक्रम रद्द कर दिया गया था। अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि आह्वान वापस लेने के दावे के बावजूद बड़ी तादाद में लोग इस्लामिया मैदान की ओर बढ़े।

उपद्रव और पुलिसकर्मियों पर हमले की निंदा

पुलिस शिकायत के मुताबिक, 26 सितंबर 2025 को प्रशासन द्वारा ‘आई लव मोहम्मद’ अभियान के समर्थन में निकाली जाने वाली रैली की अनुमति नहीं दी गई थी। इसके विरोध में निषेधाज्ञा लागू होने के बाद भी मौलाना आजाद इंटर कॉलेज से श्यामगंज चौराहे की ओर एक बड़ा हुजूम तख्तियां लेकर भड़काऊ नारेबाजी करते हुए आगे बढ़ा। जब मौके पर तैनात पुलिसकर्मियों ने उन्हें कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए रोका, तो भीड़ ने उन पर हमला कर दिया। इस दौरान सार्वजनिक संपत्तियों में तोड़फोड़ और आगजनी हुई, जिसमें ड्यूटी पर तैनात कई पुलिसकर्मी घायल हो गए।

हाईकोर्ट ने तौकीर रज़ा के घटना के बाद के आचरण पर भी गंभीर आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि पुलिसकर्मियों पर हुए हमले और हिंसा की निंदा करने के बजाय मौलाना ने एक भाषण में बड़ी संख्या में जुटने के लिए भीड़ का आभार जताया और उनके कृत्यों की सराहना की। पीठ ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान और ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों पर हुए इस हिंसक हमले को किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहराया जा सकता।

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