नाबालिग को जेल भेजने पर आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट सख्त: रिमांड आदेश रद्द कर तुरंत रिहाई का निर्देश, थाना प्रभारी पर 10 हजार का जुर्माना

चोरी के एक मामले में 17 वर्षीय नाबालिग को जेल भेजे जाने पर कड़ा ऐतराज जताते हुए आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने न्यायिक रिमांड के आदेश को अवैध ठहराते हुए रद्द कर दिया है। अदालत ने किशोर को जेल से तत्काल रिहा करने का हुक्म दिया और उम्र के सत्यापन में लापरवाही बरतने के लिए संबंधित थाना प्रभारी (एसएचओ) पर 10,000 रुपये का व्यक्तिगत जुर्माना लगाया।

जस्टिस निनाला जयसूर्या और जस्टिस टीसीडी शेखर की खंडपीठ ने 31 अगस्त को नाबालिग के पिता की याचिका स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने राजमहेंद्रवरम सेंट्रल जेल के अधीक्षक को निर्देश दिया कि वे लड़के को तुरंत रिहा करने के लिए जरूरी कदम उठाएं। साथ ही, जिम्मेदार पुलिस अधिकारी को यह निर्देश दिया कि वह एक हफ्ते के भीतर 10,000 रुपये का जुर्माना अमरावती स्थित आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी में जमा करवाएं।

मजिस्ट्रेट का रिमांड आदेश क्षेत्राधिकार से बाहर

हाईकोर्ट ने 19 अगस्त के उस मजिस्ट्रेट आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया, जिसके जरिए नाबालिग को अन्य आरोपियों के साथ 1 सितंबर तक के लिए न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया था। खंडपीठ ने इस आदेश को गैरकानूनी, पोषणीयता से परे और न्यायिक अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया। अदालत ने रेखांकित किया कि कानून से संघर्षरत बालक होने के नाते इस मामले में कार्यवाही का अधिकार केवल किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत गठित किशोर न्याय बोर्ड के पास है।

अदालत ने साफ किया कि न्यायिक रिमांड रद्द होने के बावजूद जांच एजेंसियां कानून के मुताबिक किशोर न्याय अधिनियम के तहत लड़के के खिलाफ आगे की कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र हैं।

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आधार कार्ड में जन्मतिथि को लेकर विवाद

यह पूरा मामला लड़के के पिता की याचिका के बाद सामने आया। पिता ने बताया कि छह अज्ञात लोग उनके घर पहुंचे और बिना पहचान उजागर किए उनके बेटे को अपने साथ ले गए। इसके बाद पुलिस ने किशोर पर चोरी का केस दर्ज किया। पिता का आरोप था कि उन्होंने पुलिस को आधार कार्ड उपलब्ध कराया था, लेकिन जन्म के वर्ष वाले हिस्से को मिटाकर या छुपाकर मजिस्ट्रेट के सामने लड़के की उम्र 19 साल पेश कर दी गई।

इसके जवाब में पुलिस का पक्ष था कि हिरासत के वक्त न तो लड़के ने और न ही उसके पिता ने वास्तविक उम्र की जानकारी दी थी। पुलिस ने दावा किया कि उन्हें जो आधार कार्ड की प्रति मिली थी, वह धुंधली थी और जन्म के वर्ष का अंतिम अंक स्पष्ट नहीं था, जिसके चलते जांच अधिकारियों को लगा कि उसका जन्म वर्ष 2006 है।

उम्र सत्यापन में लापरवाही पर अदालत की फटकार

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सुनवाई के दौरान प्रतिवादी पक्ष के वकील ने स्वीकार किया कि दस्तावेजों के मुताबिक लड़के की सही जन्मतिथि 12 सितंबर 2008 है, जिससे यह सिद्ध हुआ कि वह बालिग नहीं बल्कि 17 वर्ष का नाबालिग है।

इस पर खंडपीठ ने पुलिस की जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। जजों ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर किसी भी आरोपी की सटीक जन्मतिथि की पड़ताल करना पुलिस अधिकारियों का कानूनी कर्तव्य है। अदालत ने टिप्पणी की कि यह समझ से परे है कि जो जन्मतिथि हाईकोर्ट के समक्ष पेश रिकॉर्ड में साफ नजर आ रही है, वह जांच अधिकारियों को धुंधली या अस्पष्ट कैसे लगी।

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