राँची: झारखंड हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि संभोग (सेक्सुअल इंटरकोर्स) की दिशा में किसी प्रत्यक्ष और आसन्न कृत्य के बिना किया गया अशोभनीय कृत्य दुष्कर्म के प्रयास का अपराध नहीं माना जा सकता। जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए अपीलकर्ता की भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376/511 के तहत सजा को बदलकर धारा 354 (महिला की लज्जा भंग करने के इरादे से उस पर हमला या आपराधिक बल प्रयोग) में तब्दील कर दिया। इसके साथ ही धारा 452 आईपीसी के तहत उसकी दोषसिद्धि बरकरार रखी गई। अदालत ने घटना को 26 साल से अधिक समय बीत जाने और अपीलकर्ता द्वारा पहले ही लगभग आठ महीने हिरासत में बिताए जाने को ध्यान में रखते हुए उसकी सजा को जेल में बिताई गई अवधि तक ही सीमित करने का निर्णय दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
अभियोजन पक्ष का मामला पीड़िता द्वारा दर्ज कराई गई एक लिखित शिकायत पर आधारित था। शिकायत के अनुसार, 27 दिसंबर 1999 की आधी रात को जब वह अपने घर में सो रही थी, तभी उसे दरवाजा जबरन खोलने की आवाज सुनाई दी। अपीलकर्ता उसके कमरे में दाखिल हुआ, उसके शरीर पर चढ़ा, अनुचित स्पर्श किया और उसके कपड़े उठाकर दुष्कर्म करने की कोशिश की। जब पीड़िता ने शोर मचाया और उसे धक्का देकर अलग किया, तो उसकी माँ दौड़कर कमरे में पहुँची। इसके बाद आरोपी वहाँ से भाग निकला। शोर सुनकर पड़ोसी भी मौके पर पहुँचे, जिन्हें पीड़िता ने पूरी आपबीती सुनाई। 30 दिसंबर 1999 को पीड़िता के भाई के घर लौटने के बाद, 31 दिसंबर 1999 को चाकुलिया थाने में आईपीसी की धारा 376/511 और 452 के तहत औपचारिक एफआईआर दर्ज कराई गई।
जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने आरोप-पत्र दाखिल किया और मामला सत्र न्यायालय, घाटशिला को सुपुर्द कर दिया गया। ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष ने 10 गवाह पेश किए, जबकि बचाव पक्ष ने कोई गवाह पेश नहीं किया और राजनीतिक रंजिश के कारण झूठा फंसाए जाने का तर्क दिया। अपर सत्र न्यायाधीश, घाटशिला ने 25 जुलाई 2006 को दोषसिद्धि और 28 जुलाई 2006 को सजा का आदेश पारित करते हुए आरोपी को धारा 376/511 आईपीसी के तहत चार साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। इस फैसले के खिलाफ अपीलकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
दोनों पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से पेश न्यायमित्र (एमिकस क्यूरी) एडवोकेट पार्थ जालान ने दलील दी कि जांच अधिकारी (आईओ) से पूछताछ न किए जाने से अपीलकर्ता के बचाव पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है और यह न्याय की विफलता है। उन्होंने अदालत को बताया कि पीड़िता की माँ (पीडब्ल्यू-6) ने अपनी जिरह में स्वीकार किया था कि घटना की रात पीड़िता के साथ उसी कमरे में रुदन सिंह भी सो रही थी। सीधे तौर पर सबसे महत्वपूर्ण प्रत्यक्षदर्शी होने के बावजूद अभियोजन पक्ष ने जानबूझकर उसकी गवाही दर्ज नहीं कराई। इसके अलावा स्थानीय पंचायत के बहाने एफआईआर दर्ज कराने में चार दिनों की अकारण देरी की गई और पीड़िता (पीडब्ल्यू-9) का बयान भी पूरी तरह विश्वसनीय नहीं है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यदि अभियोजन पक्ष की कहानी को पूरी तरह सच भी मान लिया जाए, तब भी धारा 376/511 आईपीसी के तहत दुष्कर्म के प्रयास के आवश्यक तत्व साबित नहीं होते हैं और यह मामला अधिक से अधिक धारा 354 आईपीसी के दायरे में आता है।
दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से पेश अपर लोक अभियोजक (एपीपी) जितेंद्र पांडेय ने निचली अदालत के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों का निष्पक्ष और सटीक विश्लेषण करके ही फैसला सुनाया है, इसलिए अपील में कोई दम नहीं है और इसे खारिज किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
गवाहों के बयानों की समीक्षा करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि घटनास्थल के आसपास पहुंचे गवाहों (पीडब्ल्यू-2 से पीडब्ल्यू-5, पीडब्ल्यू-7 और पीडब्ल्यू-8) ने कमरे के भीतर की वास्तविक घटना को अपनी आंखों से नहीं देखा था, बल्कि उन्होंने केवल आरोपी को भागते हुए देखा था और घटना की जानकारी पीड़िता ने ही उन्हें दी थी।
पीड़िता के बयान का विश्लेषण करते हुए अदालत ने रेखांकित किया कि दुष्कर्म के प्रयास को साबित करने वाले किसी ठोस और प्रत्यक्ष कृत्य का अभाव था:
“पीड़िता के साक्ष्य पर समग्र रूप से विचार करने पर अपीलकर्ता की ओर से किसी ऐसे विशिष्ट कृत्य का खुलासा नहीं होता जिसे उसके साथ दुष्कर्म करने की दिशा में उठाया गया कदम कहा जा सके, जिससे कि आईपीसी की धारा 376/511 के तहत दंडनीय अपराध के तत्व आकर्षित हों। अपीलकर्ता का आचरण केवल यह दर्शाता है कि उसने पीड़िता के साथ अशोभनीय हमले का कृत्य किया, जिससे उसकी लज्जा भंग होने की पूरी संभावना थी।”
घटना के स्वरूप और परिवार के सदस्यों को तत्काल दी गई जानकारी पर टिप्पणी करते हुए जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने कहा:
“अपीलकर्ता द्वारा संभोग करने के किसी प्रयास या दुष्कर्म के कृत्य के पर्याप्त निकट किसी कदम के संबंध में कोई विशिष्ट साक्ष्य मौजूद नहीं है। पीड़िता द्वारा अपने परिवार के सदस्यों को तुरंत बताई गई बातें भी दुष्कर्म के प्रयास के बजाय हमले और उसकी लज्जा भंग करने के कृत्य की ओर संकेत करती हैं।”
अदालत ने माना कि पीड़िता द्वारा दिए गए सुसंगत साक्ष्य से यह सिद्ध होता है कि अपीलकर्ता ने उसे पकड़ा था, जो यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि हमला पीड़िता की लज्जा भंग करने के इरादे से या इस जानकारी के साथ किया गया था कि इससे उसकी लज्जा भंग होगी। अतः अपीलकर्ता के खिलाफ धारा 354 आईपीसी का अपराध पूरी तरह बनता है।
अदालत का निर्णय
परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता की धारा 376/511 आईपीसी के तहत दोषसिद्धि को संशोधित करते हुए धारा 354 आईपीसी में बदल दिया, जबकि धारा 452 आईपीसी के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखा।
सजा के बिंदु पर हाईकोर्ट ने पाया कि यह अपीलकर्ता का पहला अपराध था और उसका कोई पूर्व आपराधिक इतिहास नहीं रहा है। इसके अतिरिक्त घटना को 26 साल से अधिक का लंबा समय बीत चुका है। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने माना कि न्याय के हित में अपीलकर्ता को ट्रायल और दोषसिद्धि के बाद पहले ही काटी जा चुकी लगभग 8 महीने की जेल अवधि की सजा देना पर्याप्त होगा। अदालत ने दोषसिद्धि और सजा में संशोधन के साथ अपील को गुण-दोष के आधार पर निस्तारित कर दिया। चूंकि अपीलकर्ता जमानत पर था, इसलिए उसे जमानत बंधपत्र और प्रतिभूतियों के दायित्व से मुक्त कर दिया गया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: कमलेंदु महतो उर्फ खोका बनाम झारखंड राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील (एसजे) संख्या 1332/2006
पीठ: जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव
निर्णय की तिथि: 31 अगस्त 2026

