शेयर बाजार निवेश धोखाधड़ी: गुजरात हाईकोर्ट से साइबर कानून विशेषज्ञ मीत रावल को मिली जमानत

गुजरात हाईकोर्ट ने शेयर बाजार में निवेश के नाम पर करोड़ों रुपये की ठगी से जुड़े एक मामले में साइबर कानून विशेषज्ञ मीत रावल को नियमित जमानत दे दी है। अदालत ने राहत देते हुए इस बात पर कड़ा संज्ञान लिया कि राज्य के अभियोजन पक्ष ने अलग-अलग अदालतों में आरोपी की भूमिका को लेकर परस्पर विरोधी और चुनिंदा दलीलें पेश की हैं।

जस्टिस हंसमुख डी. सुथार की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए यह रेखांकित किया कि अभियोजन पक्ष ने विभिन्न न्यायिक मंचों पर आरोपी की कथित संलिप्तता को लेकर अलग-अलग बयान दर्ज कराए हैं। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि राज्य सरकार ने इसी मामले में पहले कई सह-आरोपियों को मिली जमानत के आदेशों को आगे चुनौती नहीं दी थी।

मेहसाणा जिले की वडनगर पुलिस ने मीत रावल के खिलाफ धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश रचने की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था। वह जून 2025 से न्यायिक हिरासत में बंद थे। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि रावल ने अपने भाई के साथ मिलकर एक अवैध कॉल सेंटर चलाने में अपनी साइबर कानूनी विशेषज्ञता का इस्तेमाल किया। आरोप के अनुसार, यह गिरोह ‘मार्केट प्लस’ नामक मोबाइल एप्लिकेशन के जरिए खुदरा निवेशकों को अपने जाल में फंसाता था और ऑटोमेटेड फोन डायलर की मदद से शेयर बाजार की फर्जी सिफारिशें देकर भारी कमीशन व भारी-भरकम मुनाफे का झांसा देता था।

पुलिस जांच के अनुसार, मामले के सह-आरोपी मौलिक ने ‘हब ब्रोकरेज’ नाम की फर्म के बंधन बैंक, एक्सिस बैंक और कोटक महिंद्रा बैंक खातों में 5,49,30,330 रुपये ट्रांसफर किए थे। राज्य सरकार का दावा है कि इस पूरे गोरखधंधे में विभिन्न खातों के माध्यम से प्राथमिक स्तर पर 14.57 करोड़ रुपये का लेनदेन किया गया था।

राहत देने के अदालती आधार

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जमानत याचिका स्वीकार करते हुए जस्टिस सुथार ने कहा कि भले ही रावल का छह पुराने मामलों का आपराधिक रिकॉर्ड रहा हो, लेकिन कानून की नजर में वे दोष सिद्ध होने तक निर्दोष माने जाने के हकदार हैं। पीठ ने पाया कि पुलिस इस मामले में अपनी जांच पूरी कर विधिवत चार्जशीट पेश कर चुकी है, इसलिए अब आरोपी से किसी भी प्रकार के अतिरिक्त साक्ष्य या वसूली की आवश्यकता शेष नहीं रह गई है।

हाईकोर्ट ने इस तथ्य पर भी विचार किया कि जिन अपराधों के तहत आरोप तय किए गए हैं, वे मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा विचारणीय हैं। इसके अतिरिक्त मुकदमे की अदालती कार्यवाही पूरी होने और अंतिम फैसले तक पहुंचने में लंबा समय लगने की संभावना है।

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बचाव पक्ष ने विरोधाभास और समानता का दिया हवाला

मीत रावल की तरफ से पैरवी करते हुए वरिष्ठ वकील ए. एस. टिंबालिया ने दलील दी कि उनके मुवक्किल को इस मामले में झूठा फंसाया गया है। अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि इसी तरह के आरोपों पर दर्ज तीन अन्य एफआईआर में रावल को पहले ही जमानत मिल चुकी है।

बचाव पक्ष ने सत्र अदालत से पहले ही रिहा हो चुके अन्य सह-आरोपियों के साथ समानता के अधिकार का मुद्दा उठाया। टिंबालिया ने अदालत के समक्ष रखा कि कथित तौर पर 1.68 करोड़ रुपये पाने वाले अनिल ठाकोर और 1.46 करोड़ रुपये प्राप्त करने वाले दशरथ ठाकोर को सत्र अदालत जमानत दे चुकी है। वहीं 7 लाख रुपये की रकम से जुड़े एक अन्य आरोपी लवेश को भी रिहा किया जा चुका है।

बैंक खातों में लेनदेन के दावों पर बचाव पक्ष ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष ने सत्र अदालत को गुमराह करते हुए यह कहा था कि रावल के खाते में 1 करोड़ रुपये ट्रांसफर हुए हैं, जबकि वास्तविक रिकॉर्ड के मुताबिक उनके एक्सिस बैंक और बंधन बैंक खातों में केवल 7 लाख रुपये ही आए थे। उन्होंने यह भी जोड़ा कि ठगी के पैसों से सोना खरीदने का जो आरोप है, वह पूरी तरह से एक अलग एफआईआर का हिस्सा है और उसका इस मामले से कोई सीधा संबंध नहीं है।

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अभियोजन पक्ष का विरोध

जमानत याचिका का विरोध करते हुए अतिरिक्त लोक अभियोजक ने दलील दी कि रावल ने अपने भाई के साथ मिलकर इस सिंडिकेट को चलाने में बेहद अहम भूमिका निभाई है। अभियोजन का कहना था कि रावल ने अपनी साइबर विशेषज्ञता का इस्तेमाल निवेशकों को ठगने, कई बैंक खातों के जरिए काली कमाई को इधर-उधर घुमाने और यूपीआई तथा सीधे बैंक ट्रांसफर के जरिए उस रकम से सोना खरीदने में किया।

अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि रावल के व्यक्तिगत बैंक खातों से 1 करोड़ रुपये से अधिक की राशि का लेन-देन हुआ है और उनका अपराध उन सह-आरोपियों की तुलना में कहीं अधिक गंभीर है जिन्हें पहले जमानत मिली है। सरकारी वकील ने यह आशंका भी जताई कि जेल से बाहर आने पर रावल गवाहों व सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं अथवा दोबारा इस प्रकार के अपराध में लिप्त हो सकते हैं।

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