निर्धारित समय में चार्जशीट जारी हो चुकी हो तो 90 दिनों में विस्तार आदेश न होने पर भी निलंबन अपने आप खत्म नहीं होता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

सेवा विधि से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी को विभागीय चार्जशीट निर्धारित समय सीमा के भीतर तामील करा दी गई है, तो महज 90 दिनों के भीतर निलंबन अवधि बढ़ाने का आदेश पारित न होने के आधार पर निलंबन अपने आप अमान्य या प्रभावहीन नहीं हो जाता। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने सिंगल जज के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें कर्मचारी का निलंबन निरस्त कर उसे तत्काल सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया गया था। इसके साथ ही खंडपीठ ने राज्य सरकार की अपील स्वीकार करते हुए सक्षम प्राधिकारी को यह निर्देश दिया कि वह निलंबन जारी रखने की आवश्यकता पर नए सिरे से और निष्पक्ष रूप से विचार करे।

मामले की पृष्ठभूमि

संबंधित कर्मचारी कोरबा जिला कलेक्टर कार्यालय में सहायक ग्रेड-3 के पद पर पदस्थ था। भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 509(बी) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (आईटी एक्ट), 2000 की धारा 67(ए) के तहत दर्ज प्राथमिकी (एफआईआर संख्या 309/2022) के सिलसिले में 48 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में रहने के कारण, उसे 25 मार्च 2022 को एक आदेश जारी कर 23 मार्च 2022 से निलंबित कर दिया गया था।

इसके बाद, 20 अप्रैल 2022 को कर्मचारी को विभागीय चार्जशीट थमा दी गई। हालांकि, निलंबन की तारीख से 90 दिनों के भीतर उसकी निलंबन अवधि बढ़ाने का कोई आदेश पारित नहीं किया गया। लगभग डेढ़ वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद, सक्षम प्राधिकारी ने 28 अगस्त 2023 को आदेश जारी कर निलंबन की अवधि को आगे बढ़ा दिया।

कर्मचारी ने इस कार्रवाई को हाईकोर्ट के सिंगल जज के समक्ष रिट याचिका के माध्यम से चुनौती दी। 18 जनवरी 2024 को सिंगल जज ने सुप्रीम कोर्ट के अजय कुमार चौधरी बनाम भारत संघ (2015) 7 SCC 291 और हाईकोर्ट के किशोर कुमार बनाम छत्तीसगढ़ राज्य मामले में दिए गए निर्णयों के आधार पर 25 मार्च 2022 के मूल निलंबन आदेश और 28 अगस्त 2023 के विस्तार आदेश को निरस्त कर दिया तथा कर्मचारी को तत्काल सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया। सिंगल जज के इस फैसले के खिलाफ छत्तीसगढ़ राज्य और कलेक्टर कोरबा ने 100 दिनों की देरी माफी के आवेदन के साथ यह रिट अपील दायर की, जिसे डिवीजन बेंच ने स्वीकार कर लिया।

पक्षों की दलीलें

राज्य की ओर से उप महाधिवक्ता प्रसून कुमार भादुड़ी ने दलील दी कि सिंगल जज ने राज्य को अपना जवाब पेश करने का पर्याप्त अवसर दिए बिना ही याचिका का निपटारा कर गलती की। उन्होंने कहा कि अजय कुमार चौधरी के फैसले पर भरोसा करना इस मामले के तथ्यों के अनुरूप नहीं था, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला मुख्य रूप से उन मामलों पर लागू होता है जहां तीन महीने के भीतर आरोप पत्र तामील नहीं किया गया हो। इस मामले में छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1966 के नियम 9 के तहत तय समय के भीतर 20 अप्रैल 2022 को ही चार्जशीट दे दी गई थी।

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राज्य सरकार के वकील ने 1966 के नियमों के नियम 9(2-बी) और नियम 9(5-ए) का हवाला देते हुए बताया कि नियम 9(5-ए) के तहत निलंबन तब तक प्रभावी रहता है जब तक सक्षम प्राधिकारी द्वारा उसे संशोधित या रद्द न किया जाए। स्वतः निरस्तीकरण का प्रावधान केवल तभी लागू होता है जब निर्धारित समय में चार्जशीट जारी न की गई हो। उन्होंने यह भी कहा कि 28 अगस्त 2023 का विस्तार आदेश महिला सहकर्मियों के कार्यस्थल के माहौल और आरोपों की गंभीरता को ध्यान में रखकर लिया गया एक तर्कसंगत निर्णय था, तथा कर्मचारी ने नियम 23 के तहत उपलब्ध विभागीय अपील के वैधानिक रास्ते को छोड़ सीधे अदालत का रुख किया था।

दूसरी ओर, प्रतिवादी कर्मचारी के अधिवक्ता अनुपम दुबे ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि सिंगल जज का फैसला अजय कुमार चौधरी और किशोर कुमार के निर्णयों के पूरी तरह अनुरूप था। उन्होंने तर्क दिया कि महज चार्जशीट जारी कर देने से प्रशासन को बिना किसी आवधिक समीक्षा के किसी कर्मचारी को अनिश्चितकाल तक निलंबित रखने का असीमित अधिकार नहीं मिल जाता। उन्होंने कहा कि निलंबन एक अंतरिम उपाय है और इसे अनिश्चितकाल तक जारी रखकर सजा का रूप नहीं दिया जा सकता। डेढ़ साल के लंबे अंतराल के बाद पारित किया गया आदेश उस निलंबन को पिछली तारीख से जीवित नहीं कर सकता जो अपनी कानूनी वैधता खो चुका था।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

1966 के नियमों के नियम 9 के वैधानिक ढांचे और पूर्व उदाहरणों का विश्लेषण करते हुए डिवीजन बेंच ने पाया कि वर्तमान मामला उन प्रकरणों से पूरी तरह अलग है जहां चार्जशीट जारी ही नहीं की गई थी:

“स्वीकार्य रूप से, प्रतिवादी को 20.04.2022 को विभागीय चार्जशीट दी गई थी, जबकि निलंबन 23.03.2022 से प्रभावी हुआ था। इस प्रकार, चार्जशीट नियमों के तहत निर्धारित अवधि के भीतर तामील कर दी गई थी। नतीजतन, निर्धारित अवधि में आरोपों का ज्ञापन न सौंपे जाने के कारण होने वाले स्वतः निरस्तीकरण का वैधानिक परिणाम इस मामले में लागू नहीं होता।”

सुप्रीम कोर्ट के अजय कुमार चौधरी निर्णय के दायरे पर चर्चा करते हुए खंडपीठ ने कहा कि शीर्ष अदालत का जोर मुख्य रूप से ऐसे मामलों में लंबे समय तक निलंबन रोकने पर था जहां आरोप पत्र ही दाखिल न हुआ हो। बेंच ने स्पष्ट किया कि उस फैसले को लागू सेवा नियमों से अलग करके नहीं देखा जा सकता:

“उक्त निर्णय को इस रूप में नहीं समझा जा सकता कि लागू सेवा नियमों और इस तथ्य की अनदेखी करते हुए कि चार्जशीट निर्धारित समय में दी जा चुकी है, 90 दिन बीतते ही निलंबन आदेश अपने आप खत्म हो जाएगा जब तक कि उन्हीं 90 दिनों के भीतर विस्तार का अलग आदेश न पारित किया गया हो। हमारी सुविचारित राय में, ऐसा अर्थ निकालना वैधानिक नियमों में वह बात जोड़ने जैसा होगा जो वहां स्पष्ट रूप से नहीं लिखी गई है।”

खंडपीठ ने रेखांकित किया कि 1966 के नियम 9(5-ए) में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि चार्जशीट जारी होने के बाद भी हर हाल में 90 दिन के भीतर ही विस्तार आदेश पारित करना अनिवार्य हो। कर्मचारी द्वारा उद्धृत समन्वय पीठ के फैसले पर अदालत ने टिप्पणी की:

“जिस सीमा तक उस निर्णय को इस रूप में समझा गया है कि हर परिस्थिति में और लागू वैधानिक नियमों की भाषा की परवाह किए बिना 90 दिनों के भीतर निलंबन बढ़ाना अनिवार्य है, हमारा मानना है कि 1966 के नियमों के नियम 9 की वैधानिक योजना के आलोक में इस व्याख्या पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।”

अदालत ने कहा कि समय पर विस्तार आदेश न होने पर यह न्यायिक समीक्षा का विषय तो हो सकता है कि निलंबन मनमाना या दंडात्मक तो नहीं हो गया, लेकिन यह स्वतः ही मूल निलंबन को शून्य नहीं बना देता:

“इसलिए, हम विद्वान सिंगल जज के इस निष्कर्ष को स्वीकार करने में असमर्थ हैं कि 90 दिनों में विस्तार आदेश पारित न होने से मूल निलंबन आदेश अपने आप प्रभावहीन हो गया। यह धारणा कि 90 दिन की समाप्ति पर प्रत्येक निलंबन आदेश अनिवार्य रूप से समाप्त हो जाता है—भले ही नियमों द्वारा निर्धारित समय में चार्जशीट तामील की जा चुकी हो—कानून के पूर्ण सिद्धांत के रूप में स्वीकार नहीं की जा सकती। ऐसा अर्थ नियम 9(5-ए) के उस मूल प्रावधान को निष्प्रभावी बना देगा, जो सक्षम प्राधिकारी द्वारा संशोधन या निरस्तीकरण किए जाने तक निलंबन के जारी रहने की बात कहता है।”

इसके साथ ही बेंच ने यह भी रेखांकित किया कि प्रशासन के पास असीमित अधिकार नहीं हैं:

“लंबे समय तक निलंबन को दंडात्मक उपाय का विकल्प बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती, और न ही किसी सरकारी कर्मचारी को निरंतर आवश्यकता पर विचार किए बिना अनिश्चित काल तक काम से अलग रखा जा सकता है।”

कोर्ट का निर्णय

डिवीजन बेंच ने माना कि सिंगल जज ने रिकॉर्ड पर मौजूद कारणों और वैधानिक नियमों की गहराई से जांच किए बिना केवल 90 दिन की समय सीमा के आधार पर आदेशों को रद्द करने में कानूनी भूल की। इसलिए, खंडपीठ ने 18 जनवरी 2024 के सिंगल जज के आदेश को रद्द करते हुए रिट याचिका खारिज कर दी।

हालांकि, कर्मचारी के लंबे समय से निलंबित रहने के तथ्य को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया कि वह अजय कुमार चौधरी मामले में प्रतिपादित सिद्धांतों और लागू नियमों को ध्यान में रखकर निलंबन जारी रखने की आवश्यकता पर नए सिरे से, निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप से विचार करे। प्राधिकारी यह भी विचार कर सकता है कि क्या निलंबन वापस लेकर कर्मचारी को किसी गैर-संवेदनशील पद पर पदस्थ किया जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने कर्मचारी के खिलाफ लंबित आपराधिक मामले या विभागीय जांच के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: छत्तीसगढ़ राज्य व अन्य बनाम शिवम सहाय चौहान
वाद संख्या: रिट अपील संख्या 360/2024
पीठ: चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल
निर्णय की तिथि: 03.09.2026

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