बच्चे को अपराधी की तरह न देखा जाए: सुप्रीम कोर्ट ने सबूत मिटाने के 20 साल पुराने मामले में नाबालिग को किया बरी

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि किसी भी बच्चे को अपराधी की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। प्रक्रिया से जुड़ी तकनीकी बंदिशों और फैसलों की औपचारिकता का हवाला देकर किसी भी किशोर को उसके कानूनी अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने करीब दो दशक पुराने मामले में एक व्यक्ति को बरी कर दिया, जो कथित घटना के वक्त नाबालिग था।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने मंगलवार को महावीर उर्फ अवनीश की तीन साल की सजा को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि साक्ष्य मिटाने के आरोप में दी गई यह सजा न केवल प्रक्रियात्मक रूप से गलत थी, बल्कि कानून की कसौटी पर भी टिकने लायक नहीं थी। अदालत के अनुसार, राज्य की पहली जिम्मेदारी ऐसे किशोरों को समाज की मुख्यधारा में दोबारा जोड़ना है, न कि उन पर हमेशा के लिए किसी अपराध का ठप्पा लगाना।

किशोर न्याय कानून को लेकर जागरूकता में बड़ी कमी

जस्टिस श्री चंद्रशेखर द्वारा लिखे गए फैसले में व्यवस्था से जुड़ी गंभीर खामियों पर चिंता जताई गई। शीर्ष अदालत ने कहा कि नाबालिगों से जुड़े अधिकारों को लेकर जांच एजेंसियों और अदालतों में समझ का भारी अभाव दिखता है। इसी वजह से बड़ी संख्या में ऐसे मामले पहली बार सीधे सुप्रीम कोर्ट के सामने आ रहे हैं, जहां नाबालिग होने की बात उठाई जा रही है।

अदालत ने रेखांकित किया कि जांच अधिकारी अक्सर सिर्फ किसी भी तरह मुजरिम साबित करने की धुन में लगे रहते हैं, जबकि संबंधित अदालतें आरोपी की उम्र के आकलन पर गंभीरता से ध्यान नहीं देतीं। इस लापरवाही के चलते किशोर न्याय कानून के अनिवार्य प्रावधान पीछे छूट जाते हैं और कानून के दायरे में आया बच्चा अंततः व्यवस्था का शिकार बन जाता है।

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सामाजिक परिस्थितियां भी बनती हैं अपराध की वजह

सामाजिक पृष्ठभूमि पर टिप्पणी करते हुए बेंच ने कहा कि औद्योगीकरण, शहरीकरण और पलायन के दौर ने आम जनजीवन को पूरी तरह बदल दिया है। गांवों से शहरों की ओर बढ़ती आबादी के बीच गरीबी, असमानता, निरक्षरता और भेदभावपूर्ण माहौल किसी भी बच्चे में भटकाव पैदा कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में बच्चा खुद परिस्थितियों का शिकार होता है।

कोर्ट ने दोहराया कि बच्चे किसी भी देश की सबसे बड़ी पूंजी हैं। उन्हें मानसिक रूप से सतर्क, शारीरिक रूप से स्वस्थ और नैतिक रूप से मजबूत नागरिक के रूप में विकसित किया जाना जरूरी है, ताकि वे समाज की प्रगति में योगदान दे सकें। बच्चों पर किया गया निवेश एक मजबूत मानव संसाधन के रूप में देश को आगे ले जाता है। इसके लिए मौजूदा जांच प्रणाली की सख्त निगरानी और कानूनी प्रावधानों को सख्ती से लागू करने की आवश्यकता है।

2004 का मुरैना मामला और कानूनी प्रक्रिया

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यह पूरा मामला सितंबर 2004 का है, जब मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में रेलवे पटरी पर भूरी नाम की एक महिला और उसकी मासूम बच्ची के शव मिले थे। पुलिस ने महावीर और उसके परिवार के अन्य सदस्यों पर हत्या, दहेज हत्या और आईपीसी की धारा 201 के तहत सबूत नष्ट करने का मुकदमा दर्ज किया था।

साल 2005 में ट्रायल कोर्ट ने हत्या और दहेज हत्या के आरोपों से परिवार को बरी कर दिया, क्योंकि अभियोजन पक्ष के गवाह मुकर गए थे। हालांकि, अदालत ने महावीर को सबूत मिटाने का दोषी ठहराते हुए तीन साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।

उम्र के निर्धारण पर हाईकोर्ट का रुख अनुचित

बाद में महावीर ने घटना के वक्त खुद के नाबालिग होने की दलील पेश की। किशोर न्याय बोर्ड की जांच में पुष्टि हुई कि उसकी जन्मतिथि 1 जुलाई 1987 थी, यानी सितंबर 2004 में वह महज 17 वर्ष का था। इसके बावजूद मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था। हाईकोर्ट का तर्क था कि मामला पहले सुप्रीम कोर्ट जा चुका है, इसलिए पुराने फैसले को दोबारा नहीं खोला जा सकता।

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सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस रुख को अत्यधिक सतर्कता और रिकॉर्ड की तथ्यात्मक गलती करार दिया। बेंच ने स्पष्ट किया कि महावीर ने अपनी पूर्व याचिका सिर्फ इसलिए वापस ली थी ताकि वह नाबालिग होने का दावा विधिवत पेश कर सके। कानून की धारा 7ए के तहत किसी भी स्तर पर, यहां तक कि अंतिम फैसले के बाद भी, नाबालिग होने की दलील किसी भी अदालत के समक्ष उठाई जा सकती है। कोर्ट ने कहा कि बच्चों के सर्वोत्तम हित की रक्षा करना अदालतों और प्रशासन दोनों का दायित्व है।

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