तमिलनाडु में पर्स सीन जाल से मछली पकड़ने वाले मछुआरों को केंद्र के विशेष आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) में जाने के लिए जरूरी एक्सेस पास न दिए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार की इस देरी को एक तरह का “अघोषित प्रतिबंध” करार देते हुए कहा कि यह कानूनन अस्वीकार्य है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केंद्र और राज्य दोनों को सहकारी संघवाद के सिद्धांत का पालन करना चाहिए ताकि नागरिक संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ग) के तहत अपने आजीविका और व्यापार के बुनियादी अधिकार का इस्तेमाल कर सकें।
जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने मछुआरों और ‘फिशरमैन केयर’ नामक गैर-सरकारी संगठन की याचिकाओं का निपटारा करते हुए यह फैसला सुनाया। पीठ ने तमिलनाडु सरकार को निर्देश दिया कि वह अपने नियमों के तहत विशेष समुद्री गलियारा तय करे, ताकि मछुआरों की नौकाएं राज्य के क्षेत्रीय जलक्षेत्र से होकर केंद्र के अधिकार क्षेत्र वाले ईईजेड तक आसानी से आ-जा सकें।
आवेदन लंबित रखने पर अदालत की कड़ी फटकार
अदालत ने ‘रियलक्राफ्ट’ (ReALCRaft) पोर्टल पर 3 अगस्त 2026 तक दर्ज आंकड़ों का हवाला देते हुए स्थिति को चिंताजनक बताया। पीठ ने कहा कि केंद्र सरकार के पास जारी करने वाले प्राधिकरण और राज्य के सत्यापन अधिकारियों के बीच तालमेल की भारी कमी दिख रही है।
आंकड़ों के मुताबिक, मछुआरों की ओर से आए कुल 257 आवेदनों में से 226 आवेदन अकेले तमिलनाडु सरकार के पास सत्यापन के स्तर पर अटके हुए हैं, जबकि अब तक सिर्फ छह एक्सेस पास जारी किए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि सभी तटीय राज्यों की तुलना में यह दर सबसे कम है। अदालत ने निर्देश दिया कि राज्य सरकार प्रासंगिक नियमों के तहत तय समयसीमा में इन आवेदनों का प्रभावी और पारदर्शी निपटारा सुनिश्चित करे।
सहकारी संघवाद और नए नियमों का पालन जरूरी
पीठ ने कहा कि अब संबंधित कानूनी प्रावधान, ईईजेड रूल्स 2025 और तमिलनाडु मरीन फिशिंग रेगुलेशन रूल्स 2020 लागू हो चुके हैं और दोनों पक्षों के अधिकार व दायित्व इन्हीं से तय होंगे। अदालत ने कहा कि केंद्र और राज्य दोनों अपने-अपने विधायी दायरे में समान और स्वायत्त हैं। ऐसे में नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए दोनों प्रशासनों को मिलकर काम करना होगा।
अदालत ने तमिलनाडु सरकार से कहा कि वह मरीन फिशिंग रेगुलेशन रूल्स 2020 के नियम 15(5) और 15(6) के तहत एक स्पष्ट गलियारा अधिसूचित करे। इसके जरिए पर्स सीन जाल वाली नौकाएं राज्य के अधिकार क्षेत्र से होते हुए ईईजेड तक बिना किसी बाधा के पारगमन कर सकेंगी। अदालत ने कहा कि यह व्यवस्था बनाते समय विशेषज्ञों की समिति की सिफारिशों का ध्यान रखा जाए।
राज्य की आशंकाएं और सुरक्षा के कड़े उपाय
तमिलनाडु सरकार ने दलील दी थी कि ईईजेड जाने की आड़ में मछुआरे राज्य की सीमा यानी 12 समुद्री मील के भीतर ही पर्स सीन जाल डाल सकते हैं। इस जाल में एक ऊर्ध्वाधर जाली को नौका से बांधकर खुले पानी में मछलियों के पूरे झुंड को एक साथ घेर लिया जाता है।
इस पर पीठ ने कहा कि राज्य के समुद्री जलक्षेत्र में उसका पूरा अधिकार है। यदि कोई मछुआरा राज्य की 12 समुद्री मील की सीमा में नियमों का उल्लंघन करते हुए पर्स सीन जाल का उपयोग करता पाया जाता है, तो राज्य प्रशासन उसे तुरंत गिरफ्तार करने और कानूनी कार्रवाई करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। इसके साथ ही अनुमति केवल उन्हीं नावों को दी जाएगी जिनमें अनुमोदित वेसल ट्रैकिंग सिस्टम (वीटीएस) लगा होगा और जो समुद्र में संचालन के दौरान लगातार चालू रहेगा।
विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट और मामले की पृष्ठभूमि
सुप्रीम कोर्ट ने याद दिलाया कि उसकी गठित विशेषज्ञ समिति ने माना था कि पर्स सीन जाल से समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और मछलियों की कुल आबादी को कोई बड़ा पर्यावरणीय नुकसान नहीं पहुंचता है। समिति ने इस तकनीक पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय उचित नियमन और निगरानी योजना के साथ इसे जारी रखने का सुझाव दिया था।
इससे पहले 24 जनवरी 2023 को भी शीर्ष अदालत ने मछुआरों को राहत देते हुए राज्य के क्षेत्रीय जलक्षेत्र से बाहर केंद्र के ईईजेड में शर्तों के साथ इस प्रकार की मछली पकड़ने की अनुमति दी थी। अदालत ने यह भी संज्ञान में लिया था कि गुजरात, केरल, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, कर्नाटक, गोवा और पश्चिम बंगाल जैसे कई तटीय राज्यों ने अपने जलक्षेत्र में इस तकनीक पर कोई पाबंदी नहीं लगाई है। 4 अगस्त को फैसला सुरक्षित रखते हुए भी अदालत ने दोहराया था कि मछुआरों को तय अनुमतियों के साथ ईईजेड में जाने से नहीं रोका जाना चाहिए।
यह रिपोर्ट पूरी तरह मूल तथ्यों, आंकड़ों और अदालती टिप्पणियों के आधार पर प्राकृतिक हिंदी पत्रकारिता शैली में तैयार की गई है। यदि आप किसी खास सेक्शन या हेडिंग में कोई बदलाव चाहते हैं, तो बताएं।

