कोडीन कफ सिरप तस्करी: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 19 मुख्य आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कीं, ड्राइवरों और हेल्परों को राहत

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कोडीन युक्त कफ सिरप के अवैध भंडारण, परिवहन और बिक्री से जुड़े मामले में 19 मुख्य आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं। अदालत ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि यदि जीवनरक्षक या औषधीय इस्तेमाल के लिए बनी दवाओं को नशे के उद्देश्य से बाजार में उतारा जाता है, तो यह कृत्य सीधे तौर पर स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ (एनडीपीएस) कानून के दायरे में आएगा।

जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने कुल 78 संबंधित जमानत याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। मुख्य साजिशकर्ताओं को जेल में रखने का आदेश देते हुए अदालत ने उन ट्रक ड्राइवरों, खलासियों और छोटे खुदरा दुकानदारों को जमानत दे दी, जिनकी इस तस्करी में कोई आपराधिक मंशा साबित नहीं हुई।

चिकित्सीय उपयोग और नशे के व्यापार में अंतर स्पष्ट

अदालत ने सुनवाई के दौरान कफ सिरप के कानूनी और गैर-कानूनी इस्तेमाल की सीमा तय की। पीठ ने कहा कि चिकित्सीय और चिकित्सकीय परामर्श के तहत निर्धारित सीमा यानी 0.2 प्रतिशत तक कोडीन युक्त कफ सिरप की बिक्री या परिवहन एनडीपीएस एक्ट के दायरे में नहीं आता। वैध लाइसेंस धारक यदि नियमों के तहत इसका व्यापार कर रहे हैं, तो उन पर नारकोटिक्स कानून के कड़े प्रावधान लागू नहीं होंगे।

हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि यदि लाइसेंस की आड़ में या बिना लाइसेंस के कफ सिरप को नशे के लिए जमा किया जाए, डायवर्ट किया जाए या बेचा जाए, तो इसे गंभीर अपराध माना जाएगा। यदि दवा के नाम पर बनी खेप को फर्जी दस्तावेजों, बोगस फर्मों और जाली इनवॉइस के जरिए नशे के अवैध बाजार में खपाया जाता है, तो पूरी खेप को मादक पदार्थ मानते हुए एनडीपीएस कानून की धारा 21 के तहत कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।

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फर्जी फर्मों और ई-वे बिल से करोड़ों की हेराफेरी

मामले की जांच में सामने आया कि मुख्य आरोपियों ने सुनियोजित तरीके से कई फर्जी फर्में खड़ी की थीं। इन मुखौटा कंपनियों के नाम पर करोड़ों रुपये के फर्जी ई-वे बिल जारी किए गए और लाखों की संख्या में कफ सिरप की बोतलें खुले बाजार में डायवर्ट कर दी गईं। यह दवाएं केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि अन्य राज्यों और पड़ोसी देशों में भी नशे के रूप में इस्तेमाल के लिए भेजी जा रही थीं।

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हाईकोर्ट ने जिन मुख्य आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कीं, उनमें शैली ट्रेडर्स के भोला प्रसाद, डीएसए फार्मा के दिवेश जायसवाल और महाकाल मेडिकल के अंकुश सिंह शामिल हैं। इनके अलावा अभिनव कुमार यादव, बादल आर्य और हर्ष अग्रवाल की अर्जियां भी अदालत ने नामंजूर कर दीं।

अज्ञानता में पार्सल ले जाने वाले कामगारों को राहत

मुख्य सिंडिकेट के विपरीत, अदालत ने इस धंधे में अनजाने में शामिल हुए निचले स्तर के कर्मियों को राहत प्रदान की। पीठ ने टिप्पणी की कि जो ट्रक चालक, हेल्पर और छोटे दुकानदार केवल सीलबंद पार्सल पहुंचा रहे थे या जिन्हें इस बात की जानकारी ही नहीं थी कि कार्टन के अंदर कफ सिरप छिपाकर ले जाया जा रहा है, उन्हें मुख्य साजिशकर्ताओं के बराबर जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने इन कामगारों को जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया।

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