कर्नाटक हाईकोर्ट ने बेंगलुरु शहरी जिले के अनेकल तालुक में एक आवासीय परियोजना के लिए शुरू की गई भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि हाथियों के आवागमन के गलियारे (एलीफेंट कॉरिडोर) केवल आने-जाने का रास्ता नहीं हैं, बल्कि यह उनके प्राकृतिक आवास और अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा हैं। अदालत ने कहा कि हाथियों को बिना अधिकारों वाला ऐसा निवासी नहीं माना जा सकता, जिन्हें कभी भी अपनी मर्जी से बेदखल कर दिया जाए।
जस्टिस डी के सिंह और जस्टिस एच शांति भूषण की खंडपीठ ने 29 अगस्त के अपने आदेश में कहा कि शहरीकरण और विकास को बढ़ावा देना जितना जरूरी है, उतना ही आवश्यक पर्यावरण और वन्यजीवों के हितों में संतुलन साधना भी है। पीठ ने जोर देकर कहा कि भूमि अधिग्रहण का उद्देश्य भले ही व्यापक जनहित हो सकता है, लेकिन कोई भी सार्वजनिक हित पर्यावरण और पारिस्थितिकी के संरक्षण से बड़ा नहीं हो सकता।
मानव जीवन के लिए आवास जितना ही जरूरी है पर्यावरण
अदालत ने इस आवासीय परियोजना को गलत सोच पर आधारित बताया और चेतावनी दी कि इससे वन्यजीवों व पर्यावरण को ऐसा नुकसान पहुंचेगा जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकेगी। यह परियोजना बनेरघट्टा राष्ट्रीय उद्यान के इको-सेंसिटिव जोन में स्थित थी। पीठ ने टिप्पणी की कि मानव जीवन के लिए केवल मकान ही एकमात्र जरूरत नहीं है, बल्कि इंसानी वजूद के लिए पर्यावरण, वन्यजीव, जंगल और जल स्रोत भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
अदालत ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। पीठ ने कहा कि भूमि अधिग्रहण की पूरी कवायद बिना किसी वैज्ञानिक अध्ययन, पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) और सामाजिक-पारिस्थितिकीय पहलुओं की समीक्षा किए बिना ही आगे बढ़ा दी गई।
हाथियों के अहम कॉरिडोर और जैव विविधता पर खतरा
अदालत के अनुसार, प्रस्तावित आवासीय परियोजना सीधे तौर पर करडिक्कल-मादेश्वरा एलीफेंट कॉरिडोर के दायरे में आ रही थी। यह इलाका मैसूर एलीफेंट रिजर्व का हिस्सा होने के कारण हाथियों के प्राकृतिक आवास और उनकी आवाजाही के लिए बेहद संवेदनशील माना जाता है। कर्नाटक वन विभाग ने पहले ही चेतावनी दी थी कि इस रिहायशी योजना से इलाके में इंसान और वन्यजीवों के बीच टकराव बढ़ेगा। इसके बावजूद इन चिंताओं को नजरअंदाज करते हुए परियोजना को मंजूरी दे दी गई थी।
फैसले में बनेरघट्टा राष्ट्रीय उद्यान की समृद्ध जैव विविधता का उल्लेख करते हुए बताया गया कि यह क्षेत्र एशियाई हाथी, तेंदुआ, गौर, सांभर, चीतल, भालू, ढोल (जंगली कुत्ता), जंगली सूअर, भौंकने वाले हिरण, मूस डियर, लकड़बग्घा, जंगली बिल्ली, पैंगोलिन, स्लेंडर लोरिस और साही जैसे कई जीवों का घर है। इसके अलावा मोर, जंगली मुर्गी, शिकारी पक्षी, कठफोड़वा, तोता, कोयल और ओरिओल जैसे कई पक्षी भी यहां पाए जाते हैं। अदालत ने कहा कि इन कॉरिडोर की रक्षा करना सिर्फ एक प्रजाति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जंगलों के आपसी जुड़ाव और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की मजबूती के लिए अनिवार्य है।
मामले की कानूनी पृष्ठभूमि
यह विवाद तब शुरू हुआ जब अनेकल तालुक के किसानों ने अपनी कृषि और बागवानी भूमि के अधिग्रहण के खिलाफ हाईकोर्ट का रुख किया। किसानों का कहना था कि यह जमीन उनकी आजीविका का एकमात्र साधन है।
शुरुआती सुनवाई के दौरान बनेरघट्टा राष्ट्रीय उद्यान के उप वन संरक्षक (डीसीएफ) ने पत्र लिखकर स्पष्ट किया था कि राष्ट्रीय उद्यान की सीमा से 10 किलोमीटर का दायरा इको-सेंसिटिव जोन में आता है, जिसके आधार पर हाईकोर्ट ने शुरुआत में अधिग्रहण पर रोक लगा दी थी।
इसके बाद 13 जनवरी को हाईकोर्ट ने गैर-कृषि उपयोग के लिए परिवर्तित जमीनों का अधिग्रहण रद्द कर दिया था, लेकिन कृषि भूमि के अधिग्रहण की अनुमति दे दी थी, क्योंकि बोर्ड ने जरूरी पर्यावरण मंजूरी मिलने के बाद ही काम आगे बढ़ाने का हलफनामा दिया था। इस आदेश के खिलाफ किसानों और कर्नाटक हाउसिंग बोर्ड दोनों ने अपील दायर की। बाद में हाउसिंग बोर्ड को कृषि भूमि के लिए पर्यावरण मंजूरी भी मिल गई, लेकिन खंडपीठ ने अंतिम सुनवाई में समूची अधिग्रहण प्रक्रिया को सिरे से खारिज कर दिया।

