किशोर न्याय और अदालतों के अंतर्निहित अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट को अपने ही किसी आदेश या फैसले को वापस (रिकॉल) लेने का पूरा अधिकार है, यदि अदालत की किसी गलती के कारण किसी पक्षकार के साथ गंभीर अन्याय हुआ हो। घटना की तारीख पर नाबालिग साबित हुए एक अपीलकर्ता की सजा और दोषसिद्धि को रद्द करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि धारा 362 CrPC के तहत फैसलों की समीक्षा या बदलाव पर लगी वैधानिक रोक ऐसे मामलों में लागू नहीं होती, जहां किसी आरोपी को जुवेनाइल जस्टिस कानूनों के तहत मिलने वाले वैधानिक लाभों से गलत तरीके से वंचित कर दिया गया हो।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 13 सितंबर 2004 का है, जब मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के सिकरौदा गांव के पास रेलवे ट्रैक पर एक महिला और उसकी मासूम बच्ची के शव मिले थे। घटना के चार दिन बाद, 17 सितंबर 2004 को संबंधित थाने में दहेज हत्या, हत्या और साक्ष्य मिटाने के आरोप में भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 302, 304B और 201 के साथ धारा 34 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि मृतका के ससुराल वालों ने रेलवे ट्रैक से जबरन शवों को उठाया और पुलिस या मृतका के मायके वालों को सूचना दिए बिना उनका अंतिम संस्कार कर दिया, ताकि सबूत मिटाए जा सकें।
द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, मुरैना की अदालत में चले मुकदमे के दौरान अभियोजन ने 13 गवाह पेश किए। हालांकि, मृतका के भाई, मां और स्वतंत्र गवाह अपने बयानों से मुकर गए और उन्होंने अदालत में कहा कि कभी कोई दहेज की मांग या प्रताड़ना नहीं हुई थी। इसके चलते ट्रायल कोर्ट ने सभी आरोपियों को हत्या और दहेज हत्या (धारा 302 और 304B) के आरोपों से बरी कर दिया। हालांकि, रेलवे के एक गैंगमैन की गवाही के आधार पर, जिसने सबसे पहले ट्रैक पर शवों को देखा था, ट्रायल कोर्ट ने 21 दिसंबर 2005 को आरोपियों को सबूत मिटाने के आरोप में धारा 201 भाग II IPC के तहत दोषी करार दिया और तीन-तीन साल के कठोर कारावास तथा 1,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 17 मार्च 2017 को उनकी अपील खारिज कर दी। इसके बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की, जिसे 11 मई 2018 को वापस लेने के आधार पर खारिज कर दिया गया। उसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने उसके माता-पिता की याचिकाओं का निपटारा करते हुए उनकी सजा को उनके द्वारा पहले ही जेल में बिताई गई अवधि तक सीमित कर दिया था।
किशोर होने की दलील और हाईकोर्ट का इनकार
सुप्रीम कोर्ट से याचिका वापस लेने के बाद अपीलकर्ता ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर पीठ में धारा 482 सपठित धारा 362 CrPC के तहत याचिका दायर कर अपनी सजा की पुष्टि करने वाले अपीलीय फैसले को वापस लेने की मांग की। अपीलकर्ता का कहना था कि मुकदमे के दौरान उसे किशोर न्याय से जुड़े कानूनों की जानकारी नहीं थी। उसका जन्म 1 जुलाई 1987 को हुआ था, इस प्रकार घटना की तारीख (13 सितंबर 2004) को उसकी आयु 17 वर्ष, 2 महीने और 12 दिन थी और वह नाबालिग था।
हाईकोर्ट के निर्देश पर किशोर न्याय बोर्ड (JJ Board), मुरैना ने उम्र के निर्धारण की औपचारिक जांच की। प्राथमिक विद्यालय की अंकतालिकाओं, दाखिला रजिस्टर और ग्राम पंचायत द्वारा जारी जन्म प्रमाण पत्र के आधार पर बोर्ड ने 11 मई 2019 को अपनी रिपोर्ट दी, जिसमें यह निर्विवाद रूप से पुष्टि हुई कि घटना के समय अपीलकर्ता वास्तव में नाबालिग था।
इसके बावजूद हाईकोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने माना कि धारा 482 CrPC के तहत मिली अंतर्निहित शक्तियों का उपयोग उस दोषसिद्धि के फैसले को दोबारा खोलने या निरस्त करने के लिए नहीं किया जा सकता, जो सुप्रीम कोर्ट तक अंतिम रूप ले चुका हो। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि उसकी शक्तियां सुप्रीम कोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली पूर्ण शक्तियों जैसी नहीं हैं।
दोनों पक्षों की दलीलें
सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि बच्चों के कल्याण के लिए बनाए गए लाभकारी सामाजिक कानूनों में अदालतों के हस्तक्षेप का दायरा अत्यंत व्यापक है और इसे किसी तय सांचे में नहीं बांधा जा सकता। उन्होंने कहा कि आरोपी का किशोर होना सीधे अदालत के क्षेत्राधिकार (अधिकार क्षेत्र) से जुड़ा विषय है और यह मुद्दा किसी भी स्तर पर, यहां तक कि मामले के अंतिम निपटारे के बाद भी उठाया जा सकता है।
दूसरी ओर, राज्य सरकार के वकील ने तर्क दिया कि फर्जी दावों को रोकने के लिए तय कानूनी प्रक्रियाओं का पालन जरूरी है। उन्होंने कहा कि यदि किशोर होने का दावा देरी से किया जाता है, तो उसकी कड़ी जांच की जानी चाहिए और केवल मौखिक मांग पर किसी को किशोर घोषित नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण: अदालतों का अंतर्निहित अधिकार और ‘पैरेन्स पैट्रिए’ सिद्धांत
फैसला सुनाते हुए जस्टिस श्री चंद्रशेखर ने बाल अधिकारों से जुड़ी कानूनी व्यवस्था को 1924 के जिनेवा घोषणापत्र, 1959 के बाल अधिकारों के घोषणापत्र, 1985 के बीजिंग नियमों और 1989 के संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समझौते (UNCRC) के साथ-साथ भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(3), 39 और 45 के संदर्भ में रेखांकित किया। पीठ ने कहा कि राज्य ‘पैरेन्स पैट्रिए’ (माता-पिता समान संरक्षक) के सिद्धांत के तहत बच्चों के कल्याण की रक्षा करने और उन्हें भटकाव व जेल की सजा से बचाने के लिए कर्तव्यबद्ध है।
1986, 2000 और 2015 के किशोर न्याय अधिनियमों तथा पूर्व के प्रमुख निर्णयों का उल्लेख करते हुए अदालत ने दोहराया कि अपराध की तारीख ही उम्र तय करने की निर्णायक तारीख होती है। कानून यह स्पष्ट प्रावधान करता है कि किसी भी अदालत के समक्ष, किसी भी स्तर पर, यहां तक कि अंतिम फैसले के बाद भी किशोर होने की दलील दी जा सकती है।
हाईकोर्ट द्वारा मामले के अंतिम होने के आधार पर राहत देने से इनकार करने पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि हाईकोर्ट ने आवश्यकता से अधिक सतर्कता बरती और रिकॉर्ड को समझने में गलती की। अपीलकर्ता की पिछली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने मेरिट (गुण-दोष) पर फैसला नहीं दिया था, बल्कि वह किशोर होने की दलील उठाने के लिए ही वापस ली गई थी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि धारा 362 CrPC किसी अदालत को अपने फैसले की गुण-दोष के आधार पर समीक्षा करने से रोकती है, लेकिन यह प्रक्रियात्मक गलती सुधारने या उस आदेश को वापस लेने में बाधा नहीं बनती जो अधिकार क्षेत्र के अभाव में दिया गया हो या जिससे घोर अन्याय हुआ हो। प्रक्रियात्मक समीक्षा और वास्तविक समीक्षा के अंतर को स्पष्ट करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा:
“हाईकोर्ट के पास अपने ऐसे आदेश या फैसले को वापस लेने का असंदिग्ध अधिकार क्षेत्र है, जिसके परिणामस्वरूप न्याय की विफलता हुई हो।”
पीठ ने आगे टिप्पणी की:
“यदि किसी किशोर को वैधानिक लाभ से वंचित किया गया और इसके चलते उसके साथ गंभीर अन्याय हुआ, तो हाईकोर्ट के पास स्थिति को सुधारने और न्याय के उद्देश्यों को पूरा करने के सभी अधिकार मौजूद हैं।”
प्रक्रियात्मक नियमों और न्याय के सिद्धांतों पर जोर देते हुए पीठ ने कहा:
“अदालत की गलती के कारण किसी भी व्यक्ति को नुकसान नहीं होना चाहिए। प्रक्रिया की तकनीकी अनियमितताओं के कारण किसी के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए। नियम और प्रक्रियाएं न्याय की सेविकाएं हैं, न्याय की स्वामिनी नहीं। न्याय के दायित्व के तहत हमें उसे न्याय देना ही होगा। यदि किसी व्यक्ति के साथ गलत हुआ है, तो न्याय प्रशासन की मानवीय व्यवस्था के दायरे में जब तक संभव हो, उस गलत को सुधारा जाना चाहिए।”
दोषसिद्धि की वैधता पर विचार करते हुए शीर्ष अदालत ने माना कि जब अपीलकर्ता को मूल अपराध यानी हत्या और दहेज हत्या के आरोपों से बरी कर दिया गया था, तो साक्ष्य मिटाने के आरोप (धारा 201 IPC) में उसकी दोषसिद्धि टिक नहीं सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 201 के तहत अपराध तभी बनता है जब पहले यह साबित हो कि कोई अपराध हुआ था और फिर यह कि सबूतों को जानबूझकर नष्ट किया गया। जब मुख्य अपराध ही साबित नहीं हुआ, तो धारा 201 के तहत दी गई सजा गैरकानूनी थी।
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, मुरैना द्वारा 21 दिसंबर 2005 को पारित दोषसिद्धि और सजा के आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया। अपीलकर्ता, जो पहले से जमानत पर था, को उसके मुचलके के दायित्व से मुक्त कर दिया गया।
किशोर न्याय प्रशासन में जमीनी स्तर पर होने वाली चूकों पर चिंता जताते हुए शीर्ष अदालत ने जांच एजेंसियों और निचली अदालतों को अधिक संवेदनशील बनाने की जरूरत पर बल दिया। अदालत ने टिप्पणी की:
“एक बच्चे को अपराधी की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। वह परिस्थितियों का शिकार होता है।”
अदालत ने रेखांकित किया कि बच्चे देश की सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति हैं और न्याय व्यवस्था का प्राथमिक उद्देश्य उन्हें अपराधी का ठप्पा लगाना नहीं, बल्कि उनका सुधार और समाज में पुनर्वास करना है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: महावीर उर्फ अविनाश बनाम मध्य प्रदेश राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2026 (स्पेशल लीव पिटीशन (क्रिमिनल) संख्या 5654/2026 से उद्भूत)
पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर
निर्णय की तिथि: 02 सितंबर 2026

