तलाक के बाद भी पत्नी को गुजारा भत्ता देना पति का कानूनी दायित्व: हिमाचल हाईकोर्ट

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ते से जुड़े एक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि जब तक तलाकशुदा महिला दूसरा विवाह नहीं कर लेती, तब तक पूर्व पति से भरण-पोषण पाना उसका संपूर्ण अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि तलाक की डिक्री मिल जाने मात्र से कोई भी पति अपनी पूर्व पत्नी को गुजारा भत्ता देने की कानूनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।

जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस रंजन शर्मा की खंडपीठ ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ पति द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने पारिवारिक अदालत (फैमिली कोर्ट) के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें महिला को प्रति माह 4,000 रुपये गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया था। साथ ही अदालत ने पति को निर्देश दिया कि वह 23 जनवरी 2024 के आदेश के तहत निर्धारित बकाया राशि का भुगतान चार सप्ताह के भीतर करे। यदि तलाक या किसी अन्य कानूनी प्रक्रिया के दौरान महिला को किसी अन्य कानून के तहत कोई गुजारा भत्ता मिला है, तो उसे इस राशि में समायोजित किया जा सकेगा।

अदालत की अहम टिप्पणियां

10 अगस्त को आए फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 का मुख्य उद्देश्य पत्नी, बच्चों और माता-पिता को शीघ्र वित्तीय सहायता प्रदान कर सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना है। इसका मकसद यह देखना है कि महिला सम्मानपूर्वक जीवन जी सके और उसे बेसहारा या लाचार होने के लिए मजबूर न होना पड़े।

खंडपीठ ने रेखांकित किया कि जब तक कानून के तहत कोई स्पष्ट अयोग्यता साबित न हो, तब तक महिला के भरण-पोषण के पूर्ण अधिकार को छीना या कम नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि किसी शारीरिक अक्षमता या लाचारी का ठोस चिकित्सकीय प्रमाण दिए बिना पति की कोरी दलीलों को स्वीकार नहीं किया जा सकता। यदि पति स्वस्थ, सक्षम और कमाने की स्थिति में है, तो वह अपनी पत्नी के भरण-पोषण के दायित्व से पीछे नहीं हट सकता।

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विवाद की पृष्ठभूमि

मामले के अनुसार, दोनों का विवाह 21 दिसंबर 1997 को हुआ था और उनके तीन बच्चे हैं। महिला का आरोप था कि पति उसके साथ दुर्व्यवहार और मारपीट करता था तथा बुनियादी जरूरतों से वंचित रखता था, जिसके चलते उसे 2009 में ससुराल छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। बाद में 22 नवंबर 2021 को क्रूरता के आधार पर दोनों के विवाह को औपचारिक रूप से भंग कर दिया गया।

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इससे पहले, मई 2019 में महिला ने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ते की मांग करते हुए फैमिली कोर्ट का रुख किया था। महिला ने दावा किया था कि उसका अपना कोई आय का स्रोत नहीं है, जबकि उसका पति एक ठेकेदार है और हर महीने करीब 30,000 रुपये कमाता है। दूसरी ओर, पति ने खुद को दिहाड़ी मजदूर बताते हुए कहा था कि उसकी पूर्व पत्नी सिलाई का काम करती है और अपना खर्च खुद उठा सकती है।

फैमिली कोर्ट ने पति की मासिक आय 11,250 रुपये तय करते हुए महिला को 18 मई 2019 से प्रति माह 4,000 रुपये का गुजारा भत्ता देने का आदेश जारी किया था। पति ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें

हाईकोर्ट में पति के वकील आशीष पटियाल ने तर्क दिया कि तलाक होने के साथ ही पत्नी को भरण-पोषण देने की जिम्मेदारी समाप्त हो चुकी है। उन्होंने यह भी दलील दी कि महिला बिना किसी ठोस वजह के घर छोड़कर गई थी, वह स्वयं का खर्च उठाने में सक्षम है, तथा याचिकाकर्ता की उम्र और स्वास्थ्य की स्थिति को देखते हुए 4,000 रुपये की राशि अत्यधिक है।

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महिला की ओर से पेश वकील टिम सरन ने इन दलीलों का विरोध किया। उन्होंने कहा कि पुनर्विवाह न करने वाली तलाकशुदा महिला धारा 125 (4) के तहत किसी अयोग्यता के दायरे में नहीं आती, इसलिए वह गुजारा भत्ते की पूरी हकदार है। वकील ने दलील दी कि पति की क्रूरता की वजह से महिला को घर छोड़ना पड़ा था और पति ऐसा कोई सबूत पेश नहीं कर पाया जिससे साबित हो कि महिला के पास आजीविका का पर्याप्त साधन मौजूद है।

हाईकोर्ट ने महिला के पक्ष की दलीलों को स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को पूरी तरह सही ठहराया।

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